2025 : निफ्टी-सेंसेक्स रिकॉर्ड की असली कहानी

अगर कोई सिर्फ निफ्टी या सेंसेक्स का लेवल देखे तो उसे लगेगा कि शेयर बाजार शानदार दौर में है. लेकिन जब गौर से देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. रिकॉर्ड के करीब पहुंचा निफ्टी दरअसल कुछ चुनिंदा बड़े शेयरों के सहारे खड़ा है, जबकि बाजार के ज्यादातर शेयर अब भी गहरे नुकसान (Deep […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 23 दिसंबर 2025, 08:19 AM 6 मिनट read
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2025 : निफ्टी-सेंसेक्स रिकॉर्ड की असली कहानी
Photo: UB India News Archive
अगर कोई सिर्फ निफ्टी या सेंसेक्स का लेवल देखे तो उसे लगेगा कि शेयर बाजार शानदार दौर में है. लेकिन जब गौर से देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. रिकॉर्ड के करीब पहुंचा निफ्टी दरअसल कुछ चुनिंदा बड़े शेयरों के सहारे खड़ा है, जबकि बाजार के ज्यादातर शेयर अब भी गहरे नुकसान (Deep Loss) में हैं. यही विरोधाभास साल 2025 के शेयर बाजार की सबसे बड़ी कहानी बनकर उभरा है.
शेयर बाजार की तेजी बेहद सीमित दायरे में सिमटी रही. सरकार की ओर से इनकम टैक्स और जीएसटी दरों में कटौती जैसी राहतों और घरेलू निवेशकों से मजबूत पैसा आने के बावजूद व्यापक बाजार दबाव में रहा. कुल लिस्टेड शेयरों में से करीब 90 प्रतिशत शेयर अपने 52 हफ्तों के उच्च स्तर से काफी नीचे कारोबार करते रहे. यानी सूचकांक ऊपर दिख रहा था, लेकिन ज्यादातर निवेशकों का पोर्टफोलियो लाल रंग से सना हुआ था.

शेयरों में कितनी गिरावट, आंकड़ों से समझिए

हमारी सहयोगी वेबसाइट मनीकंट्रोल ने कुछ आंकड़े पेश किए हैं, जो शेयरों की कमजोरी को और साफ करते हैं. कुल 2,667 लिस्टेड कंपनियों में से लगभग 90 प्रतिशत शेयर अपने 52 हफ्तों के उच्च स्तर से 20 प्रतिशत से ज्यादा टूटे हुए थे. करीब 413 शेयर 10 से 20 प्रतिशत नीचे थे, जबकि सबसे बड़ा ग्रुप, लगभग 1,532 कंपनियों का, अपने एक साल के उच्च स्तर से 20 से 50 प्रतिशत नीचे ट्रेड कर रहा था. इससे भी ज्यादा चिंताजनक तस्वीर उन शेयरों की थी, जिनमें गिरावट बहुत गहरी रही.
करीब 397 शेयर ऐसे थे, जो अपने 12 महीने के उच्च स्तर से 50 से 75 प्रतिशत तक टूट चुके थे. वहीं लगभग 30 कंपनियों के शेयर तो अपने 52 हफ्तों के उच्च स्तर से करीब 75 प्रतिशत नीचे पहुंच गए थे. पूरे बाजार में सिर्फ करीब 10 प्रतिशत शेयर ही ऐसे रहे, जो साल की गिरावट से उबरकर फिर से अपने उच्च स्तर के आसपास पहुंच पाए.

शेयर बाजार पर कई तरफ से दबाव

पूरे साल शेयर बाजार पर कई तरह का दबाव बना रहा. हाई वैल्यूएशन, कमाई के अनुमानों में कटौती और वित्त वर्ष 2026 के लिए कमजोर इनकम ग्रोथ की आशंकाओं ने माहौल बिगाड़ा. विदेशी निवेशकों की सुस्त भागीदारी ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर किया, क्योंकि वे दूसरे बाजारों में बेहतर मौके तलाशते नजर आए. इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे थीम से भारतीय बाजार का सीमित जुड़ाव भी नुकसानदेह साबित हुआ, जबकि इसी थीम ने 2025 की दूसरी छमाही में कई वैश्विक बाजारों को सहारा दिया.

बिग मनी का फोकस टॉप 300 शेयरों पर

इंडिपेंडेंट एनालिस्ट अंबरीश बलिगा ने इस स्थिति पर कहा, “इन शेयरों में गिरावट की वजह यह नहीं है कि कंपनियों के नतीजे बहुत खराब रहे हैं. हालिया नतीजे ज्यादातर मामलों में उम्मीद के मुताबिक या उससे बेहतर ही रहे.” उनके मुताबिक असली समस्या नई लिक्विडिटी की कमी रही. रिटेल निवेशक, एचएनआई और पीएमएस प्लेयर्स की ओर से नई खरीदारी नहीं आई और सारा फोकस टॉप 300 शेयरों तक सीमित रहा. विदेशी निवेशकों की बिकवाली और म्यूचुअल फंड्स का बड़े और ज्यादा लिक्विड शेयरों पर ध्यान केंद्रित करना, इस दायरे से बाहर के शेयरों पर लगातार दबाव की बड़ी वजह बना.
सूचकांकों की बात करें, तो बड़े शेयरों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया. सेंसेक्स और निफ्टी अब तक करीब 10 प्रतिशत की बढ़त दिखा चुके हैं, जो व्यापक बाजार की कमजोरी के बीच उनकी मजबूती को दर्शाता है. इसके उलट बीएसई मिडकैप इंडेक्स की बढ़त सिर्फ लगभग 1 प्रतिशत रही, जबकि बीएसई स्मॉलकैप इंडेक्स में करीब 8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. इससे साफ होता है कि असली टेंशन बाजार के निचले हिस्से में ज्यादा है.

क्या ये मार्केट क्रैश का संकेत है?

एसएमसी ग्लोबल सिक्योरिटीज में फंडामेंटल रिसर्च के प्रमुख सौरभ जैन का मानना है कि मौजूदा दौर किसी बाजार क्रैश का संकेत नहीं देता. उन्होंने कहा, “यह चरण इस बात का संकेत है कि अच्छी क्वालिटी वाले कारोबार अब निचले स्तर के करीब पहुंच रहे हैं, जो मार्केट साइकल में अक्सर देखने को मिलता है.” यानी यह समय डरने से ज्यादा समझदारी से सोचने का हो सकता है.
विश्लेषकों के मुताबिक, बड़ी संख्या में शेयरों में आई तेज गिरावट के बाद मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में बना अतिरिक्त उत्साह फिलहाल काफी हद तक निकल चुका है. हालांकि, विशेषज्ञ निवेशकों को सिर्फ दाम गिरने के आधार पर जल्दबाजी में खरीदारी से बचने की सलाह दे रहे हैं. कई मामलों में गिरावट के पीछे कंपनियों की कारोबारी या वित्तीय चुनौतियां भी हैं. इसलिए चरणबद्ध निवेश, धैर्य और अच्छी कंपनियों के सावधानीपूर्वक चयन पर जोर दिया जा रहा है.

2026 कैसा रहेगा?

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने अपनी ताजा रिपोर्ट में 2026 कैलेंडर वर्ष के लिए कुछ बेहतर तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के अनुसार, बाजार की कुल कमाई में स्ट्रांग सुधार से आने वाला साल सहारा दे सकता है. ज्यादातर सेक्टरों में व्यापक स्तर पर आय में उछाल को लेकर भरोसा बढ़ा है, हालांकि ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर स्टेपल्स जैसे क्षेत्रों में मार्जिन पर दबाव का जोखिम बना रह सकता है. जीएसटी और इनकम टैक्स में कटौती, साथ ही कम ब्याज दरों से घरेलू खपत में सुधार की उम्मीद भी इस अनुमान को मजबूती देती है.
इसके अलावा, भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही ट्रेड डील टॉक्स के बाद संभावित समझौते से मैक्रो आर्थिक माहौल और अनुकूल हो सकता है. इससे रुपये में भी सुधार की संभावना जताई गई है. हाल के समय में भारत के व्यापार संतुलन में अचानक आई गिरावट के कारण रुपये पर दबाव बना, जबकि बुनियादी आर्थिक स्थिति अब भी ठीक मानी जा रही है. अगर ये पॉजिटिव कारण एक साथ आते हैं, तो दबाव में पड़े बाजार को धीरे-धीरे राहत मिल सकती है.
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