1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर हमला किया. उसने मंदिर लूटा, तोड़ा और लाखों श्रद्धालुओं की हत्या की. लेकिन यह पहला हमला नहीं था और आखिरी भी नहीं. अलाउद्दीन खिलजी, औरंगजेब समेत कई आक्रमणकारियों ने मंदिर को निशाना बनाया. इतिहासकार बताते हैं कि मंदिर को 16-17 बार तोड़ा गया. हर बार तोड़ने के बाद भारतीयों ने उसे फिर से खड़ा किया. आक्रांताओं ने मंदिर की दीवारें तो ढहाईं, लेकिन वे लोगों के हृदय में बसे महादेव को नहीं निकाल सके. दरअसल, यह सिर्फ ईंट-पत्थर का खेल नहीं था. यह सनातन की अटूट इच्छाशक्ति का प्रमाण था.
स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ का आधुनिक पुनरुद्धार आधुनिक भारत के निर्माण की सबसे बड़ी सांस्कृतिक घटना के रूप में वर्णित है. जूनागढ़ की आजादी के बाद, जब लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रभास पाटन की धरती पर पैर रखा तो उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया. उन्होंने निर्णय किया कि सोमनाथ मंदिर को फिर से भव्य रूप में खड़ा किया जाएगा. उनके इस निर्णय में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का भी संपूर्ण समर्थन था. स्पष्ट है कि यह स्वतंत्र भारत के उस स्वाभिमान की पुनर्स्थापना थी, जिसे विदेशी शासन ने कुचलने की कोशिश की थी.
सोमनाथ मंदिर के शिखर को निहारते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण
11 मई 1951 को जब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की तो उन्होंने इसे ‘अतीत के अपमान पर भविष्य के गौरव की जीत’ बताया था. यह दिन भारतीय इतिहास में स्मरणीय है. स्वतंत्र भारत ने अपने प्राचीन गौरव को वापस पाने का संकल्प लिया था. आज सोमनाथ सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं रहा. यहां आधुनिक सुविधाएं भी विकसित हो रही हैं. लेकिन मूल भावना वही है- श्रद्धा, स्वाभिमान और गर्व. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि विरासत और विकास साथ-साथ चल सकते हैं.
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व और आज का संदेश
वर्ष 2026 में महमूद गजनवी के पहले आक्रमण को 1000 साल पूरे हो गए हैं. इस अवसर पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री ने इसे भारत की अदम्य सभ्यता का प्रतीक बताया है. सोमनाथ आज हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति कितनी मजबूत है. विदेशी आक्रमण आए, लूटे गए, मंदिर टूटे, लेकिन हमारी आस्था हर बार नई शक्ति के साथ खड़ी हुई. यह सनातन का सार है- नष्ट होने पर भी पुनर्जीवित होना. सोमनाथ का विध्वंस और अनेकों बार इस ‘अभिमान’ का पुनर्निर्माण यह दर्शाता है कि भारत की सांस्कृतिक स्वाभिमान की जड़ें कितनी गहरी हैं.
स्थापत्य कला में झलकता मान-अभिमान
वर्तमान सोमनाथ मंदिर चालुक्य शैली (कैलाश महामेरु प्रासाद) में निर्मित है. इसकी भव्यता और समुद्र तट पर इसकी स्थिति इसे दिव्य बनाती है. मंदिर के शिखर पर लहराती ध्वजा और त्रिशूल दूर से ही भारत के मान-मर्यादा का उद्घोष करते हैं. मंदिर के प्रांगण में बना ‘बाण स्तंभ’ यह बताता है कि हमारे पूर्वज विज्ञान और भूगोल में कितने निपुण थे. यह स्तंभ दर्शाता है कि सोमनाथ और दक्षिणी ध्रुव (Antarctica) के बीच पृथ्वी का कोई भू-भाग नहीं है. स्पष्ट है कि यह हमारे प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत संगम है.
नया भारत और सोमनाथ मंदिर का विस्तार
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ मंदिर परिसर का कायाकल्प हो रहा है. इसे केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया है. ‘प्रसाद योजना’ के तहत बने नए कॉरिडोर, सुंदर समुद्र दर्शन पथ और डिजिटल संग्रहालय आने वाली पीढ़ी को हमारे गौरवशाली इतिहास से जोड़ रहे हैं. आज का सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना सीख रहा है.
आज जब भारत विश्व पटल पर अपनी पहचान नये सिरे से स्थापित कर रहा है, तब सोमनाथ मंदिर हमें प्रेरणा देता है – अपनी जड़ों को कभी मत भूलिए, अपनी विरासत पर गर्व करिए और हर चुनौती का सामना करिए.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक हमारा सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर भारतीय राजनीति और समाज में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का सबसे बड़ा स्तंभ है. यह मंदिर हमें बताता है कि विकास केवल पुलों और सड़कों से नहीं होता, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और उसकी पहचान को संजोने से होता है. जब भक्त सोमनाथ की चौखट पर माथा टेकता है, तो वह केवल एक भक्त नहीं होता, वह उस गौरवशाली परंपरा का उत्तराधिकारी होता है जिसने हजार साल के अंधेरे को चीरकर उजाले की राह चुनी है.
स्वाभिमान है सोमनाथ, शाश्वत है सोमनाथ
सोमनाथ हमारा स्वाभिमान है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे खड़ा हुआ जाता है और कैसे अपने स्वाभिमान की रक्षा की जाती है. सोमनाथ की जय-जयकार वास्तव में भारत की विजय का नाद है. सोमनाथ का इतिहास हमें सिखाता है कि सत्य को दबाया तो जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता. ऐसे में प्रत्येक भारतीय को एक बार सोमनाथ अवश्य पहुंचना चाहिए. वहां खड़े होकर जब ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं तो लगता है कि हजारों साल की आस्था हमें घेर लेती है. हम अनुभव करते हैं कि हम सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि एक महान सभ्यता की संतान हैं.