क्या अल्पसंख्यक समुदाय से मोह ही विपक्ष को डूबा रहा?

लोकसभा चुनाव 2024 में झटका खाने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीतियों में बड़ा बदलाव किया है. अब भाजपा का थ्री लेयर नेतृत्व है. एक संरक्षक मंडल का नेतृत्व है तो दूसरा नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिह वाला. तीसरा और प्रभावी नेतृत्व नितिन नबीन, जेपी नड्डा, देवेंद्र फणनवीस, हिमंत विस्व सरमा, सम्राट चौधरी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 14 मई 2026, 06:43 AM 7 मिनट read
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क्या अल्पसंख्यक समुदाय से मोह ही विपक्ष को डूबा रहा?
Photo: UB India News Archive
लोकसभा चुनाव 2024 में झटका खाने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीतियों में बड़ा बदलाव किया है. अब भाजपा का थ्री लेयर नेतृत्व है. एक संरक्षक मंडल का नेतृत्व है तो दूसरा नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिह वाला. तीसरा और प्रभावी नेतृत्व नितिन नबीन, जेपी नड्डा, देवेंद्र फणनवीस, हिमंत विस्व सरमा, सम्राट चौधरी और शुभेंदु अधकारी का बन या है. यह दूसरे दलों से भाजपा को अलग करता है. भाजपा में बदलाव की पूरी जानकारी तो सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन लगातार राज्यों में भाजपा की जीत यह संकेत करती है कि पैटर्न बदलने के सकारात्मक नतीजों से भाजपा उत्साहित है. हरियाणा, दिल्ली, बिहार, असम और बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा बड़ी ताकत बन कर उभरी है. उसकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बंगाल में 15 साल का ममता राज छीना तो महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी अपना सीएम बनाने में आखिरकार सफलता पा ली. विपक्षी दलों का महागठबंधन बनाए राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव की उम्मीदों पर तो ऐसा पानी फिरा कि राजनीति से उनका मन ही उचट गया लगता है. ऐसा क्यों है कि भाजपा लगातार बढ़ती जा रही है और विपक्षी पार्टियां अपना अस्त्तित्व बचाने के लिए जूझ रही हैं.
भाजपा की बहुसंख्यक राजनीति
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत न मिलने के बावजूद उसके बाद के राज्य चुनावों में पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और उल्लेखनीय सफलता हासिल की. हरियाणा, दिल्ली, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा या एनडीए की जीत ने यह संकेत दिया कि विपक्षी दलों की कुछ पुरानी रणनीतियां अब कम प्रभावी हो रही हैं. बंगाल में 15 वर्षीय ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस शासन को समाप्त कर भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि बिहार में महागठबंधन की उम्मीदों पर पानी फिर गया. राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव को भी व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका लगा, जिससे विपक्षी खेमे में निराशा छाई हुई है. यह सब इसलिए हुआ कि भाजपा ने बहुसंख्यक की राजनीति करने का जहां दृढ़ निश्चय किया है, वहीं विपक्ष अब भी अल्पसंख्यकों के जरिए सफलता की उम्मीद पाले हुए है.
विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियां, लंबे समय से मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर रही हैं. 2024 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर इंडिया गठबंधन का साथ दिया, जिससे कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों की सीटें बढ़ीं. हालांकि, विपक्ष ने मुस्लिम समुदाय को आश्वासन देने की रणनीति पर अत्यधिक जोर दिया, जिससे बहुसंख्यक समुदाय से दूरी बढ़ी. राज्यों के हालिया चुनावों में विपक्ष का यह पैटर्न जारी रहा. बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में विपक्ष ने अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाओं को प्राथमिकता दी. लेकिन भाजपा ने विकास, सुरक्षा, सांस्कृतिक जैसे फौरी और स्थानीय मुद्दों के अलावा हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद पर फोकस किया. परिणामस्वरूप विपक्ष को लगातार झटके लगे. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में मजबूत रही, लेकिन दक्षिण बंगाल और अन्य हिस्सों में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में गया. इसी तरह बिहार में तेजस्वी यादव के महागठबंधन को 2025 विधानसभा चुनावों में भारी हार का सामना करना पड़ा, जहां एनडीए ने भारी बहुमत हासिल किया. विपक्ष का यह मुस्लिम मोह ऐतिहासिक है. कई मौकों पर अल्पसंख्यक अपील ने उन्हें बहुसंख्यक वर्ग से अलग-थलग कर दिया. नतीजा यह कि मुस्लिम वोटों पर निर्भरता बढ़ने के बावजूद चुनावी प्रदर्शन कमजोर रहा.
भाजपा का बड़ा हथियार राष्ट्रवाद
भाजपा ने राष्ट्रवाद को अपना प्रमुख हथियार बनाया. 2024 के बाद पार्टी ने संगठनात्मक बदलाव किए, उम्मीदवार चयन को सख्त बनाया और विकास के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ा. असम, बंगाल और अन्य राज्यों में भाजपा ने अवैध घुसपैठ, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता जैसे मुद्दों पर जोर दिया. असम में हिमंता बिस्वा सरमा की नेतृत्व वाली सरकार ने सीमा सुरक्षा और स्थानीय हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी. बंगाल में भाजपा ने ममता शासन में मुस्लिम तुष्टीकरण और गुंडागर्दी के खिलाफ अभियान चलाया. हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा की जीत का आधार बना. दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसी जीतों ने भी दिखाया कि भाजपा का राष्ट्रवादी एजेंडा– विकास, सुरक्षा और गर्व– व्यापक समर्थन हासिल कर रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में झटके के बाद पार्टी ने पैटर्न बदला. अधिक लोकल मुद्दों पर फोकस, बेहतर गठबंधन और ग्रासरूट संगठन के परिणाम सकारात्मक रहे.
राष्ट्रवाद ने भाजपा को क्षेत्रीय बाधाओं को पार करने में मदद की. बंगाल में पहली बार सत्ता हासिल कर पार्टी ने अपना विस्तार साबित किया. जान-समझ कर कांग्रेस या यों कहें कि पूरे विपक्ष ने राह नहीं बदली. कांग्रेस बार-बार अपनी रणनीति पर सवाल उठने के बावजूद मुस्लिम अपील वाली छवि से मुक्त नहीं हो पाई. 2014 की हार के बाद एके. एंटोनी समिति ने रिपोर्ट दी थी कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की छवि ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया. फिर भी, कांग्रेस ने राह नहीं बदली. 2024 में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं, मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों के सहारे. लेकिन समग्र राष्ट्रीय प्रभाव सीमित रहा. राज्य चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा. बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में गठबंधन सहयोगी मुख्य भूमिका में थे, लेकिन कांग्रेस की स्वतंत्र पहचान अल्पसंख्यक-केंद्रित बनी रही. आलोचक कहते हैं कि जान-बूझकर यह रणनीति अपनाई जा रही है, जो लंबे समय में पार्टी को बहुसंख्यक वर्ग से दूर कर रही है.
शाहबानो मामले में कांग्रेस का रुख
1985 का शाहबानो मामला कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति का क्लासिक उदाहरण माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाहबानो को गुजारा भत्ता देने का फैसला दिया, लेकिन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 लाकर फैसले को पलट दिया. इससे महिला अधिकारों पर सवाल उठे और पार्टी पर अल्पसंख्यक वोट बैंक बचाने का आरोप लगा. यह घटना आज भी कांग्रेस की आलोचना का विषय है. भाजपा इसे बार-बार उठाती है कि कांग्रेस ने संवैधानिक मूल्यों से ऊपर वोट बैंक को रखा. ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर भी कांग्रेस का रुख इसी पैटर्न का हिस्सा रहा. इसने पार्टी की सेकुलर छवि को तुष्टीकरण के रूप में स्थापित किया. इसका असर चुनावी राजनीति पर पड़ा.
एंटनी ने हार की असल वजह बताई
2014 की भारी हार के बाद कांग्रेस की जांच समिति के प्रमुख एके एंटनी ने स्वीकार किया कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की छवि ने बहुसंख्यक समुदाय से पार्टी को अलग कर दिया. उन्होंने सलाह दी कि कांग्रेस को हिंदू और अल्पसंख्यक दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए. फिर भी पार्टी ने इस सलाह पर ध्यान नहीं दिया. 2022-23 में भी एंटोनी ने यही बात दोहराई कि फासीवाद के विरोध के नाम पर बहुसंख्यक समुदाय को साथ लेना जरूरी है. कांग्रेस की निरंतर हार या सीमित सफलता का एक कारण यही माना जाता है कि वह बहुसंख्यक भारत की आकांक्षाओं को पूरी तरह समझने और प्रतिबिंबित करने में असफल रही. यही वजह रही कि 2024 के बाद भाजपा की राज्य स्तर पर सफलताएं अधिक दिख रही हैं. बंगाल में ममता का अंत और बिहार में तेजस्वी को झटका यह दर्शाती हैं कि मतदाता अब विकास, राष्ट्रवाद और समावेशी अपील को प्राथमिकता दे रहे हैं. विपक्ष अगर मुस्लिम मोह से ऊपर नहीं उठा तो आगे भी चुनौतियां न सिर्फ बनी रहेंगी, बल्कि इनके और गंभीर होने का खतरा बढ़ेगा.
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