घनी आबादी वाले इलाकों में कुकुरमुत्तों की तरह फैले अस्पताल…….

दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड से देश गमजदा था. तभी बिहार में मुजफ्फरपुर के प्रसाद हॉस्पिटल अग्निकांड ने और झकझोर दिया. मुजफ्फरपुर के प्रसाद हॉस्पिटल में भोर के वक्त आग लगी. मरीजों को सभलने तक का मौका न मिला. फायर विभाग की गाड़ी जब तक पहुंचती, तब तक कईयों की दुनिया लुट चुकी थी. प्रसाद […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 6 जून 2026, 07:12 AM 5 मिनट read
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घनी आबादी वाले इलाकों में कुकुरमुत्तों की तरह फैले अस्पताल…….
Photo: UB India News Archive
दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड से देश गमजदा था. तभी बिहार में मुजफ्फरपुर के प्रसाद हॉस्पिटल अग्निकांड ने और झकझोर दिया. मुजफ्फरपुर के प्रसाद हॉस्पिटल में भोर के वक्त आग लगी. मरीजों को सभलने तक का मौका न मिला. फायर विभाग की गाड़ी जब तक पहुंचती, तब तक कईयों की दुनिया लुट चुकी थी. प्रसाद हॉस्पिटल में आग लगने से 6 मरीजों की मौत हो गई. कई गंभीर रूप से घायल हुए. अस्पताल में सीढ़ी से लेकर रास्ता सब कॉम्प्रोमाइज्ड था. तभी तो दमकल विभाग की गाड़ी सड़क से ही आग बुझाती दिखी. बहरहाल, प्रसाद हॉस्पिटल अग्निकांड के बाद प्रशासन एक्शन में है. आग लगने की घटना के बाद प्रशासन ने अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया है. पहली नजर में यह कार्रवाई सख्त और जरूरी लगती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक अस्पताल पर कार्रवाई कर देने से शहर के मरीज सुरक्षित हो जाएंगे? क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रुक जाएंगी? इसका जवाब होगा- शायद नहीं.
दरअसल, असल समस्या किसी एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे हेल्थ सिस्टम की है. मुजफ्फरपुर में पिछले कुछ सालों में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की संख्या तेजी से बढ़ी है. मुजफ्फरपुर तो नॉर्थ बिहार के मरीजों का गढ़ बन गया है. जो पटना नहीं जा पाते, उनके लिए आखिरी उम्मीद मुजफ्फरपुर के प्राइवेट अस्पताल और नर्सिंग होम्स ही होते हैं. मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा, जूरन छपरा, भगवानपुर से लेकर बैरिया और कई अन्य इलाकों में छोटे-बड़े नर्सिंग होम कुकुरमुत्तों की तरह फैल गए हैं. इनमें से ज्यादातर अस्पपताल ऐसे हैं, जहां बुनियादी सुरक्षा मानकों का भी पालन नहीं किया जाता.
कुकुरमुत्तों की तरह फैले अस्पताल
शहर के कई अस्पताल और नर्सिंग होम घनी आबादी वाले इलाकों में बने हुए हैं. घरों के बीच में घुसकर अस्पताल खड़े हैं. अस्पतालों या नर्सिंग होम्स के आसपास खुला स्थान नहीं है. कई जगहों पर इतनी संकरी गलियां हैं कि अग्निशमन विभाग की बड़ी गाड़ियां समय पर पहुंच ही नहीं सकतीं. अगर किसी अस्पताल में आग लग जाए या कोई दूसरी आपदा आ जाए तो मरीजों और उनके परिजनों के पास बचने का रास्ता भी नहीं होता. यह स्थिति पूरे मुजफ्फरपुर में है. अगर आपको यकीन न हो तो जरा ब्रह्मपुरा से जूरन छपरा तक पैदल मार्च कर लीजिए. आपको पता चल जाएगा कि कैसे कुकुरमुत्तों की तरह अस्पताल और नर्सिंग होम एक दीवार से दूसरे दीवार तक चिपके हैं.
अपनी कमी भी देखे प्रशासन
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे अस्पतालों को लाइसेंस कैसे मिला? क्या निर्माण के समय सुरक्षा मानकों की जांच की गई थी? क्या फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास, पार्किंग और खुली जगह जैसे नियमों का पालन हुआ था? अगर नहीं हुआ था तो संबंधित विभागों ने आंखें क्यों मूंद लीं? यह भी सच है कि कई अस्पतालों और नर्सिंग होम में मरीजों की संख्या उनकी क्षमता से कहीं अधिक होती है. लेकिन सुरक्षा इंतजाम बेहद कमजोर रहते हैं. आग बुझाने वाले उपकरण या तो होते नहीं हैं या फिर काम करने की स्थिति में नहीं होते. कई जगहों पर कर्मचारियों को आपदा की स्थिति में बचाव कार्य की ट्रेनिंग तक नहीं दी जाती.
एक्शन जरूरी मगर सब पर…
प्रसाद हॉस्पिटल पर कार्रवाई जरूरी थी और प्रशासन के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन अगर कार्रवाई सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित रह गई तो इसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा. जरूरत इस बात की है कि पूरे शहर में अस्पतालों और नर्सिंग होम का व्यापक ऑडिट कराया जाए. यह जांच हो कि कौन-कौन से अस्पताल सुरक्षा मानकों का पालन कर रहे हैं और कौन नहीं. जो अस्पताल नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, उन्हें सुधार के लिए समय दिया जाए और गंभीर लापरवाही पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाए. साथ ही उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए जिनकी निगरानी में ऐसे संस्थान वर्षों से संचालित होते रहे.
हेल्थ सर्विस मतलब केवल इलाजा नहीं
हेल्थ सर्विस का मतलब सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा भी है. कोई व्यक्ति अस्पताल इसलिए जाता है कि उसकी जान बच सके, न कि वह किसी नई दुर्घटना का शिकार बन जाए. इसलिए प्रशासन को केवल घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से रोकथाम की व्यवस्था मजबूत करनी होगी. मुजफ्फरपुर में मरीजों की सुरक्षा तब सुनिश्चित होगी, जब नियमों को कागजों से निकालकर जमीन पर लागू किया जाएगा. केवल एक-दो अस्पतालों पर कार्रवाई से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को दुरुस्त करने से ही मरीजों की जान बचाई जा सकती. यही इस अग्निकांड का सबसे बड़ा सबक होगा.
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