श्रीराम जन्मभूमि मंदिर चढ़ावा चोरी-गंभीर अपराध के एक भी दोषी को बचाया-छिपाया नहीं जाना चाहिए…………….

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की जांच में 150 संदिग्धों के नाम सामने आए हैं। इनमें से 25 लोगों पर कार्रवाई के आसार हैं। जिन लोगों से SIT पूछताछ कर चुकी है, उन्हें अगले आदेश तक कहीं बाहर न जाने की चेतावनी दी गई है। शनिवार को छठे दिन […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 20 जून 2026, 08:07 AM 13 मिनट read
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श्रीराम जन्मभूमि मंदिर चढ़ावा चोरी-गंभीर अपराध के एक भी दोषी को बचाया-छिपाया नहीं जाना चाहिए…………….
Photo: UB India News Archive

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की जांच में 150 संदिग्धों के नाम सामने आए हैं। इनमें से 25 लोगों पर कार्रवाई के आसार हैं। जिन लोगों से SIT पूछताछ कर चुकी है, उन्हें अगले आदेश तक कहीं बाहर न जाने की चेतावनी दी गई है। शनिवार को छठे दिन SIT जांच के लिए मंदिर पहुंच गई है। जांच पूरी कर SIT आज ही लखनऊ लौटेगी। माना जा रहा है कि सोमवार को सीएम योगी को जांच रिपोर्ट सौंपी जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा पर कार्रवाई लगभग तय मानी जा रही है। दोनों को पद से हटाया जा सकता है।इसके अलावा, मंदिर के निर्माण प्रभारी गोपाल राव को भी पद से हटाया जा सकता है। शुक्रवार को SIT ने मंदिर परिसर में करीब 6 घंटे तक जांच की। टीम ने चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव से अलग-अलग पूछताछ की। साथ ही SBI बैंक के मैनेजर और कैशियर से भी सवाल किए।SIT गोपाल राव के भतीजे और राम मंदिर कर्मचारी सोमेश आनंद से भी पूछताछ करना चाहती थी, लेकिन वे नहीं मिले। सूत्रों के अनुसार, उनका फोन स्विच ऑफ बता रहा है।

अब तक 2 करोड़ की बरामदगी

चढ़ावा चोरी मामले में 5 लोगों लवकुश, अवनीश, अनुकल्प, करुणे और रामशंकर उर्फ टिन्नू की निशानदेही पर अब तक 2 करोड़ रुपए की रिकवरी की गई है। ये सभी मंदिर में दान राशि की गिनती की ड्यूटी से जुड़े थे। मंदिर ट्रस्ट के कर्मचारी टिन्नू के घर से 13 जून को सोना मिला था। हालांकि, सोना कितना है, यह अभी कन्फर्म नहीं है।

सपा प्रमुख और पूर्व मंत्री ने चोरी का मुद्दा उठाया था

  • सपा सरकार में मंत्री रह चुके पवन पांडेय ने 7 जून को दावा किया था कि राम मंदिर से 5 से साढ़े 7 करोड़ रुपए तक की चोरी की गई। अखिलेश ने भी कहा था कि मामले पर सरकार की चुप्पी संदिग्ध है। कोर्ट को मामला देखना चाहिए।
  • चंपत राय ने सफाई दी थी कि अभी तक ऐसी कोई भी बात सामने नहीं आई है। विवाद बढ़ा तो भाजपा नेता डॉ. रजनीश सिंह ने 9 जून को प्रधानमंत्री को लेटर लिखकर CBI जांच की मांग की। अगले दिन यानी 10 जून को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने मंदिर ट्रस्ट से मामले की रिपोर्ट मांग ली थी।

करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के धन में चोरी, घोटाला और गबन का मामला अब किसी से छिपा नहीं है। अब यह प्रश्न ही नहीं है कि चोरी हुई या नहीं। प्रश्न यह है कि कितने की चोरी हुई और इसमें कौन-कौन शामिल हैं? प्रश्न यह भी है कि क्या इस चोरी की ठीक से जांच होगी‌? क्या चोरी का माल बरामद किया जाएगा?

जिस प्रकार और जिस गति से इस संदर्भ में जांच की जा रही है, उसे देखते हुए नहीं लगता कि यह जांच ठीक से हो पाएगी। ऐसा लगता है, राज्य सरकार द्वारा एसआईटी का गठन चोरों को बेनकाब करने के लिए नहीं, बल्कि मामले को रफा-दफा करने के लिए किया गया है। क्या आपने चोरी का कोई दूसरा मामला ऐसा देखा-सुना है, जिसमें पर्याप्त सुबूत के बाद भी एफआईआर और गिरफ्तारी के बजाय जांच का नाटक किया गया हो?

राम मंदिर के धन में हुए गबन के मामले की जिस तरह एक के बाद एक परतें उघड़ती जा रही हैं, उसे देखते हुए लगता है कि पांच लाख रुपये की चोरी की चर्चा से शुरू हुआ यह मामला 2,000 करोड़ रुपये की डकैती तक पहुंचेगा। मामला मंदिर और ट्रस्ट के अंदर से ही खुला है। जून के पहले सप्ताह में अयोध्या की गलियों में यह चर्चा शुरू हुई कि मंदिर की सेवा में नियुक्त कर्मचारी चढ़ावे में चोरी कर रहे हैं। फिर खबरें आईं कि इस चोरी में ट्रस्ट के कुछ बड़े लोग भी शामिल हैं और यह सुनियोजित चोरी लंबे अरसे से चल रही है।

हालांकि, देश के आम लोगों में यह चर्चा का विषय बना 7 जून को, जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर पोस्ट करके इस मामले को रखा। शुरू में तो उत्तर प्रदेश सरकार, भारतीय जनता पार्टी व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के लोगों ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया और इसे ट्रस्ट को बदनाम करने की साजिश बताया। जब भाजपा के लोगों ने भी सवाल उठाने शुरू किए और ट्रस्ट के अंदर से गवाह सामने आने लगे, तब राज्य सरकार को इसकी जांच के लिए एसआईटी का गठन करना पड़ा।

अब सवाल उठ रहा है कि एसआईटी का गठन मामले की जांच के लिए किया गया है या इसे रफा-दफा करने के लिए? उत्तर प्रदेश सरकार अपराध पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दंभ भरती हैं। इसकी पुलिस बात-बात पर एफआईआर दर्ज करने, बुलडोजर चलाने, संपत्ति जब्त करने और ऑपरेशन लंगड़ा के लिए बदनाम है, फिर इस मामले में किसी सीधी कार्रवाई से क्यों बच रही है? विपक्ष के नेताओं को बिना जांच, बगैर सुबूत के जेल भेजते समय राज्य सरकार यह तर्क देती है कि बाहर रहने पर वे जांच को प्रभावित कर सकते हैं, सुबूत मिटा सकते हैं, फिर इस मामले में उल्टा तर्क क्यों दे रही है कि पहले जांच करके सुबूत जुटाएंगे, उसके बाद एफआईआर होगी?

समाजवादी पार्टी ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में स्वत: संज्ञान लेकर अपनी देख-रेख में सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराए। ऐसा हुआ, तभी पूरे मामले का सही से खुलासा हो पाएगा और असली चोर न्याय के कठघरे में खड़े किए जा सकेंगे। कई जानकारों का कहना है कि इस मंदिर से जुड़े धन की चोरी 1990 के दशक से ही चल रही थी और करीब 2,000 करोड़ रुपये का गबन हुआ है।

मंदिर के दान पात्रों में आई रकम की गिनती की प्रक्रिया से जुड़े पूर्व लेखा प्रभारी महीपाल सिंह ने कहा है कि उन्हें 2021 में ही अंदेशा हुआ था कि गिनती में लगे कुछ कर्मचारी चंदे की रकम में हेराफेरी कर रहे हैं। उन लोगों को नोटों की गड्डियों के बंडल बनाने का काम दिया गया था, लेकिन वे बंडल में दस की जगह बारह या तेरह गड्डी रख देते थे। इस तरह, रोजाना लाखों रुपये पार कर दिए जाते थे। महीपाल सिंह ने यह भी बताया है कि दानपेटियों से सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात के जो जेवर निकलते थे, उन्हें ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का ड्राइवर टिन्नू ले जाता था। इन जेवरों का कोई हिसाब नहीं रखा जाता था। जब उन्होंने इन दोनों बातों की शिकायत ट्रस्ट के पदाधिकारियों से की, तो कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही नौकरी से हटा दिया गया। इतना ही नहीं, टिन्नू ने आठ महीने की सीसीटीवी फुटेज भी डिलीट कर दी।

राम मंदिर आंदोलन में कारसेवक रहे संतोष दुबे ने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, सदस्य अनिल मिश्रा, गोपाल राव और टिन्नू यादव के खिलाफ श्रीराम जन्मभूमि थाने में तहरीर दी है। दुबे का आरोप है कि इन चारों ने मिलकर मंदिर के धन में चोरी की है। वह यह भी कहते हैं कि राम मंदिर में चोरी दशकों से लगातार चल रही थी। शिला पूजन के समय सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात और अन्य कीमती धातुओं की करीब 1,250 शिलाएं दान में प्राप्त हुई थीं। वे सारी शिलाएं गायब हैं। इतना ही नहीं, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ-साथ राम मंदिर आंदोलन से जुड़े अनेक संतों और विद्वत जनों ने भी इस मसले पर ट्रस्ट के जिम्मेदार लोगों को कठघरे में खड़ा किया है। इनमें से कई तो भाजपा और संघ से जुड़े रहे हैं।

प्रश्न यह है कि इतने लोगों की आवाज उठाने, चोरी के ढेरों सुबूत मिलने, चोरों की पहचान होने और कई जगह से माल की बरामदगी होने के बावजूद सरकार एसआईटी के नाम पर मामले को ठंडा करने की कोशिश में क्यों लगी है? क्या सरकार नहीं चाहती कि प्रभु श्रीराम के भक्तों की आस्था पर डाका डालने वाले लोग बेनकाब हों? क्या सरकार नहीं चाहती कि राम मंदिर में चढ़ावे और दान की प्रक्रिया पारदर्शी हो? क्या सरकार नहीं चाहती कि मंदिर की संपत्ति की चोरी रुके? क्या यह सरकार नहीं चाहती कि मंदिर प्रबंधन के प्रति पैदा हुई अविश्वास की भावना खत्म हो और श्रद्धालुओं का विश्वास बहाल हो? यदि हां, तो सरकार को पूरे मामले की ऐसी जांच करानी चाहिए, जिस पर सबको विश्वास हो।

इस गंभीर अपराध के एक भी दोषी को बचाया-छिपाया नहीं जाना चाहिए और आगे के लिए व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद और पारदर्शी होनी चाहिए कि किसी भी श्रद्धालु में संदेह की गुंजाइश ही न रहे।

श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान भक्ति का प्रतीक

भारतीय सभ्यता में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं रहे हैं, वे राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और सामूहिक स्वाभिमान के भी प्रतीक रहे हैं। भारत का इतिहास साक्षी है कि जब-जब देश की सांस्कृतिक पहचान पर संकट आया, तब-तब मंदिरों ने समाज को संगठित करने, सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रखने और राष्ट्रीय आत्मविश्वास को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सोमनाथ मंदिर इसका सर्वाधिक चर्चित उदाहरण है, जो भारतीय आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर उभरा। अयोध्या में भगवान श्रीराम का मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक स्मृति, राष्ट्रीय भाव-बोध और सांस्कृतिक एकात्मता का भी प्रतिनिधित्व करता है।

सनातन धर्म की परंपरा में मंदिरों का महत्व सदैव बहुआयामी रहा है। देश के अनेक मंदिर और धार्मिक संस्थान शिक्षा, स्वास्थ्य, गौ-संरक्षण, आपदा राहत, गरीबों के भोजन, छात्रवृत्ति और समाजोत्थान कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। इस दृष्टि से मंदिर भारतीय समाज के धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान के भी महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं।

हाल में अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से जुड़े दान व वित्तीय प्रबंधन की अनियमितताओं के आरोपों व चर्चाओं ने लोगों को क्षुब्ध और आहत किया है। ऐसे समाचारों से श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचती है तथा उन जनाकांक्षाओं पर भी आघात होता है। यदि किसी धार्मिक संस्था में दानराशि के दुरुपयोग अथवा वित्तीय अनियमितता की आशंका उत्पन्न होती है, तो यह दुखद और निंदनीय है। श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान विश्वास और भक्ति का प्रतीक होता है, अतः उसके उपयोग में पूर्ण पारदर्शिता अपेक्षित है। अच्छी बात है कि यह विषय समय रहते सार्वजनिक संज्ञान में आया है और इसकी जांच की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। इससे यह अपेक्षा बलवती होती है कि यदि कहीं कोई कमी है, तो उसका उचित निराकरण कर व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाया जाएगा।

किसी भी धार्मिक संस्था में वित्तीय अनियमितता या प्रबंधन संबंधी कमी की आशंका उत्पन्न होती है, तो उसका समाधान पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच, उत्तरदायित्व निर्धारण और संस्थागत सुधार के माध्यम से किया जाना चाहिए। यही स्वस्थ व्यवस्था का आधार है। दोष यदि किसी व्यक्ति या समूह का है, तो उत्तरदायित्व भी उसी स्तर पर निर्धारित होना चाहिए। हालांकि, किसी एक घटना या कुछ व्यक्तियों के संदिग्ध आचरण के आधार पर संपूर्ण मंदिर व्यवस्था, मठ परंपरा अथवा सनातन धर्म की सेवा-परंपरा का मूल्यांकन करना न तो न्यायसंगत है और न ही तथ्यपरक। कुछ लोग आज यही कर रहे हैं। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण में देश के विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं, जातियों और सामाजिक वर्गों के लोगों ने स्वेच्छा से योगदान दिया। इस दृष्टि से यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सहभागिता और सांस्कृतिक एकात्मता का भी प्रतीक है।

आज उत्तर प्रदेश की बागडोर एक निष्काम सेवाभावी संत योगी आदित्यनाथ के हाथों में है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, धर्म व समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की दीर्घ यात्रा में भी उनका योगदान किसी से छिपा नहीं है। अयोध्या और राम मंदिर के प्रति उनकी श्रद्धा केवल प्रशासनिक दायित्व का विषय नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आस्था व जीवन-साधना का भी विषय रही है। उनके नेतृत्व में अयोध्या का अभूतपूर्व कायाकल्प हुआ है। ऐसे में, यह सहज विश्वास किया जा सकता है कि वह राष्ट्रीय आस्था व सनातन स्वाभिमान के इस केंद्र के साथ किसी प्रकार का अपयश जुड़ने नहीं देंगे। लोगों को विश्वास है कि दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

रामराज्य की परिकल्पना केवल भव्य मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं है, यह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनविश्वास की रक्षा में भी निहित है। इसलिए जनता को यह विश्वास है कि श्रीराम मंदिर की गरिमा, श्रद्धालुओं की भावनाओं तथा दानदाताओं के विश्वास की रक्षा के लिए जरूरी कदम सरकार उठाएगी। हमें स्मरण रखना होगा कि बड़े आंदोलनों और व्यापक सामाजिक अभियानों में कभी-कभी कुछ ऐसे लोग भी जुड़ जाते हैं, जिनकी निष्ठा उस आदर्श के अनुरूप नहीं होती अथवा जिन पर आवश्यकता से अधिक विश्वास कर लिया जाता है। ऐसी परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली क्षति को समय रहते पहचानकर दूर करना आवश्यक है। अपेक्षा है कि मंदिर ट्रस्ट और उससे जुड़ी व्यवस्थाएं निरंतर अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और चाक-चौबंद बनाई जाएं, ताकि श्रद्धालुओं के मन में निहित श्रद्धा, समर्पण व विश्वास और अधिक सशक्त होकर आगे बढ़ सके।

किसी एक स्थान पर घटित अथवा किसी एक संस्था से संबंधित अनियमितता के आरोपों के आधार पर देश की संपूर्ण मंदिर व मठ परंपरा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश में अनेक ऐसे सेवा कार्य हैं, जो मंदिरों, मठों व धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से संचालित हो रहे हैं और जिनका लाभ बड़ी संख्या में नागरिकों को प्राप्त होता है।

हां, इस प्रकरण ने यह अवश्य पुष्ट किया है कि धार्मिक संस्थाओं की व्यवस्थाएं अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जनविश्वास के अनुरूप हों। ट्रस्टों और प्रबंधन तंत्र में समयानुकूल सुधार, नियमित लेखा परीक्षण, प्रभावी निगरानी तथा सहभागितापूर्ण व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे भविष्य में ऐसी अनियमितता की संभावना न्यूनतम हो सके। जहां सुधार की आवश्यकता है, वहां सुधार होना चाहिए, किंतु साथ ही मंदिरों और मठों की उस महान सेवा-परंपरा का भी समुचित सम्मान होना चाहिए, जिसने सदियों से भारतीय समाज को आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आधार प्रदान किया है। यही दृष्टि सनातन परंपरा, लोकमंगल और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के अनुरूप है।

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