जगन्नाथ रथ यात्रा : आस्था, समरसता और गतिशील जीवन का महापर्व…………

पुरी में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की वार्षिक रथ यात्रा गुरुवार से शुरू हो रही है। तीनों भव्य रथ पूरी तरह तैयार हैं और श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए ग्रैंड रोड पर स्थापित किए गए हैं। सुबह 6 बजे मंगला आरती के बाद अब पाहांडी (श्रृंगार और शोभा यात्रा के रूप में […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 16 जुलाई 2026, 04:27 AM 12 मिनट read
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जगन्नाथ रथ यात्रा : आस्था, समरसता और गतिशील जीवन का महापर्व…………
Photo: UB India News Archive

पुरी में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की वार्षिक रथ यात्रा गुरुवार से शुरू हो रही है। तीनों भव्य रथ पूरी तरह तैयार हैं और श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए ग्रैंड रोड पर स्थापित किए गए हैं। सुबह 6 बजे मंगला आरती के बाद अब पाहांडी (श्रृंगार और शोभा यात्रा के रूप में भगवान का रथों तक पहुंचने) की तैयारी की जा रही है।

ओडिशा के पुरी में आज महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा की पावन रथ यात्रा का शुभ दिन है। महाप्रभु मंदिर से बाहर निकलेंगे और पारंपरिक पाहंडी अनुष्ठान के बीच रथ पर विराजमान होंगे। यह पवित्र अवसर स्वयं महाप्रभु ने अपने भक्तों और आम जन को दर्शन देने के लिए निर्धारित किया है।

गर्भगृह से बाहर निकले भगवान जगन्नाथ

पारंपरिक पाहंडी अनुष्ठान के तहत सबसे पहले भगवान सुदर्शन, फिर भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ को गर्भगृह से बाहर लाकर उनके भव्य रथों नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन तक पहुंचाया जा रहा है। रथों पर विराजमान होने से पहले तीनों देवता नए रथों की परिक्रमा करेंगे और रथ बीजे अनुष्ठान के बाद उन्हें सिंहासन पर स्थापित किया जाएगा। इसके बाद गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती विशेष पूजा-अर्चना करेंगे, जबकि पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव पारंपरिक छेरा पहंरा अनुष्ठान के तहत स्वर्ण जड़ित झाड़ू से तीनों रथों की सफाई कर सुगंधित पवित्र जल का छिड़काव करेंगे। सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे होने और रथों में लकड़ी के घोड़े जोड़े जाने के बाद दोपहर करीब 2 बजे श्रद्धालु रथों को खींचना शुरू करेंगे। परंपरा के अनुसार सबसे पहले भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ, फिर देवी सुभद्रा का दर्पदलन और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ गुंडिचा मंदिर की ओर रवाना होगा।
 मौसम विभाग ने जारी किया भारी बारिश का अलर्ट
ओडिशा के पुरी में लगातार हो रही भारी बारिश के बावजूद करीब दो लाख श्रद्धालु पहले पहुंच चुके हैं। मौसम विभाग ने गुरुवार के लिए भी भारी बारिश और गरज-चमक की चेतावनी जारी की है। रथ यात्रा की पूर्व संध्या पर पुरी में 143.8 मिमी बारिश दर्ज की गई, जिसके चलते प्रशासन ने ग्रैंड रोड पर जलभराव से निपटने के लिए विशेष इंतजाम किए हैं ताकि 12वीं शताब्दी के श्री जगन्नाथ मंदिर से लगभग 2.6 किलोमीटर दूर श्री गुंडिचा मंदिर तक रथों की यात्रा सुचारु रूप से संपन्न हो सके।
जगन्नाथ रथ यात्रा : आस्था, समरसता और गतिशील जीवन का महापर्व

जो समाज अपनी परंपराओं को केवल उत्सव मानता है, वह उनके संदेश को खो देता है; और जो समाज उनमें निहित संदेश को समझ लेता है, वही भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है।”

भारत की सांस्कृतिक चेतना में यदि कोई ऐसा पर्व है जो धर्म, दर्शन, समाज, समानता और गति—इन सभी मूल्यों को एक साथ समाहित करता है, तो वह है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा। यह केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की नगर-यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस विराट दर्शन का प्रतीक है जिसमें ईश्वर स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। यही कारण है कि ओडिशा के पुरी से प्रारंभ हुई यह परंपरा आज पूरे भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।

रथ यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जीवन का सार गति में है। जहाँ गति रुकती है, वहाँ जड़ता जन्म लेती है। इसलिए भगवान स्वयं रथ पर आरूढ़ होकर यह संदेश देते हैं कि धर्म, समाज और मानवता को निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

पौराणिक आधार : श्रीकृष्ण से भगवान जगन्नाथ तक

भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण तथा अनेक वैष्णव ग्रंथों में उनकी महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

मान्यता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात जब श्रीकृष्ण ने देह त्यागी, तब उनका दिव्य हृदय अग्नि में भी नहीं जला। वह समुद्र के माध्यम से नीलांचल (वर्तमान पुरी) पहुँचा। राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान ने आदेश दिया कि उस दिव्य काष्ठ से उनकी मूर्ति बनाई जाए।

विश्वकर्मा स्वयं वृद्ध शिल्पी के रूप में आए और एक शर्त रखी कि मूर्ति निर्माण के दौरान कोई भी द्वार नहीं खोलेगा। किंतु कई दिनों तक कोई आवाज न आने पर रानी गुंडिचा ने चिंता में द्वार खुलवा दिया। विश्वकर्मा तत्काल अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी अवस्था में रह गईं। भगवान ने उसी रूप में प्रतिष्ठित होने की इच्छा व्यक्त की। इसीलिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ आज भी हाथ-पैर पूर्ण विकसित रूप में नहीं दिखाई देतीं।

यही अधूरापन वास्तव में पूर्णता का दर्शन है। यह संदेश देता है कि ईश्वर किसी बाहरी सौंदर्य में नहीं, बल्कि भाव में निवास करते हैं।

रथ यात्रा की ऐतिहासिक परंपरा

पुरी की रथ यात्रा का इतिहास एक हजार वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है। गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा निर्मित वर्तमान जगन्नाथ मंदिर के बाद इस परंपरा को व्यापक स्वरूप मिला।

हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। नौ दिनों के प्रवास के बाद पुनः “बहुदा यात्रा” के माध्यम से मंदिर लौटते हैं।

तीनों रथों के नाम भी अत्यंत अर्थपूर्ण हैं—

  • नंदीघोष – भगवान जगन्नाथ का रथ (16 पहिए)
  • तालध्वज – बलभद्र का रथ (14 पहिए)
  • दर्पदलन (देवदलन) – देवी सुभद्रा का रथ (12 पहिए)

इन रथों का निर्माण प्रत्येक वर्ष नए पवित्र वृक्षों की लकड़ी से किया जाता है। यह भारतीय संस्कृति के पुनर्निर्माण और नवसृजन की भावना का प्रतीक है।

रथ क्यों?

यदि भगवान सर्वशक्तिमान हैं तो उन्हें रथ पर बैठकर नगर भ्रमण करने की आवश्यकता क्यों?

यहीं इस पर्व का सबसे बड़ा दर्शन छिपा है।

रथ भारतीय दर्शन में शरीर का प्रतीक है। कठोपनिषद् कहता है—

“आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु।”

अर्थात् आत्मा रथी है और शरीर उसका रथ।

यदि रथ के पहिए संतुलित हों, सारथी जागरूक हो और दिशा सही हो, तभी यात्रा सफल होती है।

आज का समाज भी यही संदेश चाहता है। विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास तभी सार्थक हैं जब उनका सारथी नैतिकता हो।

गति का दर्शन

रथ यात्रा का मूल संदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवनदर्शन है।

प्रकृति का प्रत्येक तत्व गतिशील है—

सूर्य गतिमान है।

चंद्रमा गतिमान है।

पृथ्वी घूम रही है।

नदियाँ बह रही हैं।

समय निरंतर आगे बढ़ रहा है।

यदि प्रकृति रुक जाए तो जीवन समाप्त हो जाएगा।

इसीलिए भगवान जगन्नाथ स्वयं रथ पर बैठकर बताते हैं कि समाज भी परिवर्तन और प्रगति की ओर निरंतर अग्रसर रहे।

जहाँ विचार रुक जाते हैं, वहाँ कट्टरता जन्म लेती है।

जहाँ समाज रुक जाता है, वहाँ पिछड़ापन आता है।

जहाँ राष्ट्र रुक जाता है, वहाँ विकास समाप्त हो जाता है।

इसलिए रथ यात्रा वास्तव में गतिशील भारत का उत्सव है।

समरसता का महापर्व

भारत के अधिकांश मंदिरों में भगवान के दर्शन के लिए भक्त मंदिर के भीतर जाते हैं।

किन्तु जगन्नाथ रथ यात्रा में भगवान स्वयं बाहर आते हैं।

यह संदेश अत्यंत क्रांतिकारी है।

ईश्वर केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं।

वे प्रत्येक व्यक्ति के हैं।

जाति, वर्ग, भाषा, प्रदेश, आर्थिक स्थिति—इन सभी सीमाओं को तोड़कर भगवान स्वयं सबके द्वार तक पहुँचते हैं।

रथ की रस्सी खींचने में कोई ऊँच-नीच नहीं होती।

राजा भी उसी रस्सी को पकड़ता है जिसे सामान्य नागरिक पकड़ता है।

यही भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति का आध्यात्मिक स्वरूप है।

गजपति राजा की छेरा पहाड़ा परंपरा

रथ यात्रा का सबसे प्रेरणादायक दृश्य तब होता है जब पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू लेकर भगवान के रथ की सफाई करते हैं। इसे छेरा पहाड़ा कहा जाता है।

राजा स्वयं सेवक बन जाता है।

यह परंपरा बताती है कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य सेवा है, प्रभुत्व नहीं।

आज जब राजनीति में अहंकार और पद की होड़ दिखाई देती है, तब यह परंपरा विनम्रता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।

अधूरी मूर्तियाँ : पूर्ण दर्शन

भगवान जगन्नाथ की मूर्तियाँ सामान्य प्रतिमाओं से भिन्न हैं।

न हाथ पूर्ण हैं।

न पैर।

न शरीर की पारंपरिक बनावट।

फिर भी करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र हैं।

इसका संदेश है—

ईश्वर बाहरी रूप से नहीं, बल्कि अंतःकरण से पहचाने जाते हैं।

यह दिव्य रूप समाज को यह भी सिखाता है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके भीतर के भाव, चरित्र और कर्म से होता है।

पूरे देश में रथ यात्रा

आज जगन्नाथ रथ यात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं रही।

दिल्ली, पटना, अहमदाबाद, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, रायपुर, भोपाल, लखनऊ, वाराणसी, जयपुर सहित देश के लगभग सभी बड़े नगरों में रथ यात्राएँ निकाली जाती हैं।

ग्रामीण भारत में भी मंदिर समितियाँ भगवान का रथ निकालती हैं।

इस्कॉन ने इस परंपरा को विश्व के अनेक देशों तक पहुँचाया है। लंदन, न्यूयॉर्क, मॉस्को, सिडनी, मेलबर्न, जोहान्सबर्ग और टोरंटो जैसे महानगरों में भी रथ यात्रा लाखों लोगों को भारतीय संस्कृति से जोड़ती है।

यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) का भी सशक्त माध्यम बन चुकी है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

रथ यात्रा धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था की भी धुरी है।

हजारों कारीगर पूरे वर्ष रथ निर्माण, लकड़ी, वस्त्र, चित्रकला, हस्तशिल्प, प्रसाद, पर्यटन और धार्मिक सेवाओं से जुड़े रहते हैं।

पुरी की अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग इस आयोजन से प्रभावित होता है।

देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालु होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय बाजार और लघु उद्योगों को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।

इस प्रकार रथ यात्रा आध्यात्मिकता और अर्थव्यवस्था का भी सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है।

पर्यावरण का संदेश

रथ पूरी तरह प्राकृतिक लकड़ी से बनाए जाते हैं।

हर वर्ष नए रथ बनते हैं, किंतु इसके साथ वन संरक्षण की पारंपरिक व्यवस्था भी जुड़ी रही है।

आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब रथ यात्रा हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का संदेश देती है।

धार्मिक आयोजनों में प्लास्टिक-मुक्त व्यवस्था, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को अपनाकर इस पर्व को और भी सार्थक बनाया जा सकता है।

वर्तमान समय में प्रासंगिकता

आज का समाज अनेक चुनौतियों से घिरा है—

सामाजिक विभाजन,

धार्मिक कट्टरता,

अत्यधिक भौतिकवाद,

मानसिक तनाव,

पारिवारिक विघटन,

और नैतिक मूल्यों का क्षरण।

ऐसे समय में रथ यात्रा केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी पर्व है।

यह हमें सिखाती है कि—

गति हो, पर दिशा भी हो।

विकास हो, पर संस्कार भी हों।

समृद्धि हो, पर संवेदना भी हो।

विज्ञान हो, पर आध्यात्म भी साथ चले।

रथ यात्रा को केवल धार्मिक आयोजन मानना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना होगा। यह भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है जिसमें धर्म लोककल्याण से जुड़ता है, सत्ता सेवा से जुड़ती है, आस्था समानता से जुड़ती है और परंपरा प्रगति से जुड़ती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम रथ यात्रा के बाहरी उत्सव से आगे बढ़कर उसके भीतर छिपे संदेश को समझें।यदि भगवान स्वयं अपने सिंहासन से उतरकर जनता के बीच आ सकते हैं, तो जनप्रतिनिधियों, प्रशासकों और समाज के नेतृत्वकर्ताओं को भी जनता के बीच जाना चाहिए।

यदि राजा स्वर्ण झाड़ू लेकर सेवा कर सकता है, तो सत्ता में बैठे लोगों को भी सेवा को सर्वोच्च मानना चाहिए।

यदि लाखों लोग एक ही रस्सी पकड़कर रथ खींच सकते हैं, तो समाज भी जाति, भाषा और राजनीतिक विभाजनों से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण की दिशा में एकजुट हो सकता है।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत की सनातन संस्कृति का ऐसा विराट पर्व है जो हमें यह सिखाता है कि जीवन रुकने का नहीं, निरंतर आगे बढ़ने का नाम है। रथ के पहिए हमें याद दिलाते हैं कि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है और प्रगति उसी की होती है जो गति बनाए रखता है। भगवान का मंदिर से निकलकर जन-जन तक पहुँचना हमें समावेश, समानता और सेवा का संदेश देता है, जबकि गजपति राजा का स्वर्ण झाड़ू लेकर रथ की सफाई करना यह सिद्ध करता है कि नेतृत्व का सर्वोच्च धर्म विनम्र सेवा है।

आज जब समाज अनेक प्रकार की वैचारिक, सामाजिक और नैतिक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब रथ यात्रा केवल आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र के पुनर्निर्माण का भी अवसर है। यदि हम इसके मूल संदेश—गति, समरसता, सेवा, विनम्रता और लोककल्याण—को अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उतार सकें, तभी यह महापर्व अपनी वास्तविक सार्थकता प्राप्त करेगा।

भगवान जगन्नाथ का रथ हर वर्ष आगे बढ़ता है। प्रश्न यह है कि क्या हमारा समाज, हमारी सोच और हमारा राष्ट्र भी उसी गति, उसी समरसता और उसी लोकमंगल की भावना के साथ आगे बढ़ रहा है? यही प्रश्न इस रथ यात्रा का सबसे बड़ा संपादकीय संदेश है।

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