रावण वध करने गए बिहार के सीएम नीतीश कुमार न सिर्फ निशाने से चूके, बल्कि उनके हाथ से तीर-धनुष भी छूट गया. नीतीश के हाव भाव से साफ लगा कि वे बेमन से महज रस्म अदायगी के लिए ही वहां पहुंचे थे. ऐसी स्थिति उनके स्वास्थ्य कारणों से हो सकती है या फिर अरुचि के कारण. दोनों सच हो सकते हैं या इनमें कोई एक बात तो पक्का ही सच हो सकती है. दोनों ही स्थितियां भाजपा और जेडीयू के लिए अच्छी नहीं हैं. फिर भी भाजपा नीतीश के बरक्स कोई चेहरा डेवलप नहीं कर रही. जेडीयू में भी नेतृत्व का संकट जल्दी ही खड़ा हो जाए तो आश्चर्य नहीं.
नीतीश के हाव भाव और भाषण में दोहराव
नीतीश कुमार की अस्वस्थता की बात समय-समय पर सामने आती रही है. तब, जब वे हेल्थ चेकअप के लिए दिल्ली जाते हैं. पर, यह सार्वजनिक नहीं होता. उनकी बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य की समझ लोगों को तब होती है, जब उनके भाषण में एक ही बात का दोहराव दिखता है. बार-बार हाथ मटकाना या झटकना, पेट पर हाथ फेरना और चिड़चिड़ापन से लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि 2020 के पहले नीतीश कुमार ऐसे तो नहीं थे! पीएम मोदी के चरण स्पर्श की नीतीश कई बार कोशिश कर चुके हैं. अफसरों के साथ भी एक-दो मौकों पर उनका यही अंदाज दिखा. मीडिया के सामने भी वे एक बार इसी अंदाज में दिखे थे. उनकी जुबान फिसलने (स्लिप आफ टंग) की कई घटनाएं इस साल लोकसभा चुनाव के दौरान हुईं. नरेंद्र मोदी के चार सौ पार नारे को वे चार हजार पार कहते रहे.
वर्ष 2020 से नीतीश में दिख रहा है बदलाव
वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार चुनाव प्रचार के लिए जब जाते थे तो जन आक्रोश पर गुस्से में आ जाते थे. सीमांचल की एक सभा में जब कुछ लोगों ने हंगामा मचाया तो नीतीश बिफर पड़े. उन्होंने कहा कि जिन्हें वोट नहीं देना है, वे वहां से चले जाएं. इसी दौरान नीतीश ने तेजस्वी यादव पर भी तल्ख तेवर में हमला बोला था. तेजस्वी ने महागठबंधन की सरकार बनने पर 10 लाख लोगों को रोजगार देने का वादा किया था. नीतीश ने कहा कि पैसा कहां से लाएंगे. क्या सजायाफ्ता अपने पिता से पैसा मांगेंगे.
विधानमंडल में भी तिलमिलाते रहे हैं नीतीश
नीतीश कुमार का चिड़चिड़ापन सिर्फ चुनाव के दौरान ही नहीं दिखा. सरकार बनने पर वे विधानमंडल में भी गुस्से का इजहार कर चुके हैं. भाजपा नेता और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा पर वे विधानसभा में ही अपराध के एक सवाल पर भड़क गए थे. तेजस्वी यादव को भी उन्होंने सदन में खूब सुना दिया था. चिड़चिड़ा कर ही उन्होंने भाजपा से 2022 में रिश्ता भी तोड़ लिया था. तिलमिला कर ही इंडिया ब्लाक से बाहर हो गए थे.
नीतीश कुमार के लंबे समय तक सीएम पद पर रहने से जनता के एक वर्ग में उबाऊपन तो है ही. उन्हें सबसे बड़ा सेटबैक 2020 के विधानसभा चुनाव में लगा. जेडीयू 43 सीटों पर सिमट कर विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. 2020 की यह टीस आज भी उनके दिमाग में बैठी हुई है. विधानसभा का मिड टर्म पोल कराने के लिए वे इसी वजह से बेचैन दिखते रहे हैं. वे 43 विधायकों वाली पार्टी का नेता बन कर अपनी फजीहत भी महसूस करते रहे हैं. पहले भाजपा के तानों से ऊब कर एनडीए से अलग हुए तो महागठबंधन में शामिल होकर भी वे अपनी फजीहत से नहीं बच सके. उनकी तिलमिलाहट अपनी ही स्थिति को लेकर है.
जेडीयू नेता भी बदलाव को महसूस कर रहे
ऐसा नहीं कि जेडीयू के नेता नीतीश कुमार में आए इस बदलाव को महसूस नहीं कर रहे. जेडीयू नेताओं ने ही उनमें आए बदलाव को देख कर अब मीडिया से बातचीत बंद करा दी है. मीडिया वालों के सामने वे एक बार ऐसा नतमस्तक होने लगे कि उसके बाद उनकी मीडिया से बातचीत ही बंद करा दी गई. वे समीक्षा बैठकें करते हैं. बिहार के कई हिस्सों में उद्घाटन-शिलान्यास या मुआयना के लिए भी नीतीश जाते हैं, लेकिन मीडिया से दूर ही रहते हैं. दरअसल उनकी ऐसी हरकतों को मीडिया चटखारे लेकर परोसता रहा है.
BJP को भी भान है नीतीश की अवस्था का
भाजपा भी नीतीश की इस अवस्था को जानती है. इसके बावजूद कोई उनकी आलोचना नहीं करता. उल्टे लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने उनके ही नेतृत्व में विधानसभा का अगला चुनाव लड़ने का राग अलापना शुरू कर दिया है. भाजपा अपने किसी नेता को नीतीश कुमार के बरक्स प्रमोट करने की कोशिश नहीं कर रही. इसकी वजह है. भाजपा को लगता है कि अपने बूते वह बिहार में कोई कमाल नहीं कर सकती. नीतीश आज भी बिहार में ब्रांड हैं. उनके ब्रांड वैल्यू को देख कर ही भाजपा खामोश है.
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और जन सुराज के प्रशांत किशोर को यकीन है कि नीतीश कुमार की यह आखिरी पारी है. प्रशांत किशोर तो यह भी अंदेशा जताने लगे हैं कि 2025 तक जेडीयू का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. उनका आकलन है कि जेडीयू को अगली बार बमुश्किल 20 सीटें आ जाएं बहुत होंगी. तेजस्वी भी कहने लगे हैं कि नीतीश अब थक गए हैं. बुढ़ापा और बीमारी के कारण वे बिहार को संभाल नहीं पा रहे. 2020 में महागठबंधन को ऊंचाई तक ले जाने वाले तेजस्वी अगर 2025 में सीएम बनने का सपना देख रहे हैं तो महागठबंधन की ताकत के अलावा नीतीश कुमार की अवस्था भी एक कारण है.








