आखिर अपने ही बयान पर अब मोहन भागवत खामोश क्यों

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के 18 महीने पहले दिए एक बयान ‘हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों ढूंढना’ ने देश में काफी चर्चा पैदा की है. यह बयान ज्ञानवापी मस्जिद विवाद के दौरान आया था, जब मस्जिद परिसर में शिवलिंग होने के दावे किए गए थे. भागवत ने इस बयान के माध्यम […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 7 दिसंबर 2024, 05:28 AM 17 मिनट read
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आखिर अपने ही बयान पर अब मोहन भागवत खामोश क्यों
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के 18 महीने पहले दिए एक बयान ‘हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों ढूंढना’ ने देश में काफी चर्चा पैदा की है. यह बयान ज्ञानवापी मस्जिद विवाद के दौरान आया था, जब मस्जिद परिसर में शिवलिंग होने के दावे किए गए थे. भागवत ने इस बयान के माध्यम से संदेश देने की कोशिश की थी कि हमें धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद नहीं बढ़ाना चाहिए और सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए.

आज संभल की शाही मस्जिद से लेकर बदायूं की जामा मस्जिद शम्सी,  अजमेर की अजमेर शरीफ दरगाह, मध्य प्रदेश की कमल मौला मस्जिद तक तमाम मस्जिदों पर विवाद हो रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अपने ही बयान पर अब खामोश क्यों हैं?

पहले जानिए क्या था मोहन भागवत का पूरा बयान
2 जून 2022 को नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष के समापन समारोह में मोहन भागवत ने कहा था, “ज्ञानवापी का मुद्दा एक इतिहास है. इतिहास को हम बदल नहीं सकते हैं. ये इतिहास हमने नहीं बनाया. न आज के हिंदुओं ने बनाया, न ही आज के मुसलमानों ने बनाया. ये पहले की बात है. इस्लाम बाहर से आया, आक्रमकों के हाथ आया. उन्होंने भारत की स्वतंत्रता चाहने वाले लोगों का मनोबल खत्म करने के लिए देवस्थान तोड़े. ऐसे हजारों स्थान हैं, जिनपर आज हिंदुओं की श्रद्धा है. ऐसा नहीं है कि आज हिंदू मुसलमानों के विरुद्ध सोचता है. आज के मुसलमानों के पूर्वज उस समय भी हिंदू थे. उन सबको स्वतंत्रता से वंचित रखने के लिए, उनका मनोधैर्य दबाने के लिए देवस्थान नष्ट किए गए. अब हिंदुओं को लगता है उन स्थानों को पुनर्उत्थान होना चाहिए.”

“हम किसी एतिहासिक कारणवश उस समय की परिस्थिति के अनुसार राम मंदिर के आंदोलन में सम्मिलित हुए और उस काम को पूरा किया. अब हमें कोई आंदोलन करना नहीं है. लेकिन, अगर मन में कोई बात है, तो वह उठती है. ये किसी के खिलाफ नहीं है और खिलाफ मानना भी नहीं चाहिए. मुसलमानों को ऐसा नहीं मानना चाहिए, न ही हिंदुओं को ऐसा सोचना चाहिए. अच्छा ये है कि आपस में बैठकर सहमति से कोई रास्ता निकाल लो. लेकिन हर बार रास्ता नहीं निकल सकता. इसलिए, अदालत में जाते हैं. लेकिन फिर अदालत जो भी फैसला देगा उसे मानना चाहिए. अदालत के फैसले पर सवाल नहीं उठाना चाहिए.

मोहन भागवत ने आगे कहा था, ‘ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि रोज एक नया मुद्दा उठा दिया जाए. हमें झगड़ा क्यों बढ़ाना है. ज्ञानवापी पर हमारी कुछ श्रद्धाएं हैं, कुछ परंपराएं चलती आ रही हैं, परंतु हर मस्जिद में शिवलिंग को क्यों देखना. वह भी एक तरह से पूजा ही करते हैं. भले ही तरीका बाहर से आया है, लेकिन जिन्होंने अपनाया है वो मुसलमान बाहर से संबंध नहीं रखते हैं. ये बात उन्हें भी समझना चाहिए.’

किन-किन मस्जिदों पर क्या है विवाद
ताजा विवाद उत्तर प्रदेश के संभल में स्थित एक पुरानी ‘शाही जामा मस्जिद’ से जुड़ा है. यह मस्जिद लगभग 500 साल पुरानी है और सरकार इसे एक महत्वपूर्ण इमारत मानती है. कुछ लोग कह रहे हैं कि यह मस्जिद पहले ‘हरि हर मंदिर’ था, जिसे तोड़कर मस्जिद बनाया गया था. ऐसा ही दावा वाराणसी, मथुरा और धार में भी किया गया है. कोर्ट ने इस मस्जिद का सर्वे कराने का आदेश दिया था.

पहला सर्वे 19 नवंबर को हुआ. इसके बाद जब 24 नवंबर को दूसरी बार सर्वे के लिए एएसआई की टीम पहुंची, तो वहां हिंसा भड़क गई. इस हिंसा में 5 लोग मर गए, जिनमें 2 बच्चे भी शामिल थे. इस घटना से पूरे इलाके में तनाव बढ़ गया है. लोगों को डर है कि यह विवाद और बड़ा हो सकता है.

बदायूं में मस्जिद-मंदिर विवाद
उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक मस्जिद है जिसका नाम ‘जामा मस्जिद शम्सी’ है. कुछ लोग कहते हैं कि यह मस्जिद पहले ‘नीलकंठ महादेव मंदिर’ था. इसको लेकर कोर्ट में मामला चल रहा है. इस मामले की सुनवाई 3 दिसंबर को होनी थी, लेकिन मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी नहीं होने के कारण इसे 10 दिसंबर तक टाल दिया गया है.

हिंदू पक्ष कह रहा है कि मस्जिद पहले शिव मंदिर था, जबकि मुस्लिम पक्ष कह रहा है कि यह मस्जिद हमेशा से मस्जिद ही थी. अब कोर्ट यह तय करेगा कि इस मामले में सुनवाई होनी चाहिए या नहीं. मुस्लिम पक्ष अपनी बात रख चुका है, अब हिंदू पक्ष की बारी है. पुरातत्व विभाग ने इस जगह पर अपना दावा किया है. सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए हैं.

अजमेर शरीफ पर भी विवाद
राजस्थान के अजमेर में ‘ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती’ की दरगाह है, जिसे अजमेर शरीफ कहा जाता है. यह एक बहुत ही पवित्र जगह है जहां हर धर्म के लोग आते हैं. याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता का कहना है कि जहां आज अजमेर शरीफ है, वहां पहले एक शिव मंदिर था. उनका कहना है कि दरगाह को हटाकर वहां फिर से मंदिर बनाया जाना चाहिए. उन्होंने ASI से इस जगह का सर्वे करने की मांग की है. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा है कि दरगाह का जो सरकारी रजिस्ट्रेशन है, उसे रद्द कर दिया जाए.

कोर्ट ने 27 नवंबर को दरगाह कमेटी, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नोटिस भेजा है. कोर्ट ने इन सभी से इस मामले में जवाब मांगा है. इस विवाद की वजह से पूरे देश में काफी चर्चा हो रही है. कुछ लोग इस दावे का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं.

धार में मस्जिद और मंदिर का विवाद
मध्य प्रदेश के धार में एक जगह है जहां एक मस्जिद भी है और एक प्राचीन इमारत भी है जिसे भोजशाला कहते हैं. इस जगह को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद है. हिंदू मानते हैं कि यह 11वीं सदी में बना एक मंदिर है जो देवी सरस्वती को समर्पित था. मुसलमानों का कहना है कि यह 14वीं सदी में खिलजी शासकों द्वारा बनाई गई एक मस्जिद है.

2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस नाम के एक संगठन ने कोर्ट में अर्जी दी थी. इसके बाद, कोर्ट ने ASI को इस जगह का सर्वे करने का आदेश दिया. ASI को यह पता लगाना था कि यह इमारत कितनी पुरानी है और इसके नीचे क्या है. अभी यह जगह एएसआई के कंट्रोल में है. हिंदुओं को यहां मंगलवार और बसंत पंचमी पर पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति है. कभी-कभी बसंत पंचमी शुक्रवार को ही पड़ जाती है. ऐसे में हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को उसी दिन इस जगह पर जाने की अनुमति होती है. इससे धार और आसपास के इलाकों में तनाव बढ़ जाता है.

एएसआई ने 15 जुलाई 2024 को 149 पेजों की सर्वे रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जमा की. रिपोर्ट में बताया गया कि उन्हें एक मंदिर के अवशेष मिले और हिंदू धर्म से जुड़े लेख भी मिले. कहा कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है. यह भी पता चला कि यह जगह पहले पढ़ाई-लिखाई के लिए एक बड़ा सेंटर प्वाइंट था. हालांकि धार के काजी वकार सादिक ने सर्वे के नतीजों पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि जिस कमरे में हिंदू मूर्तियां मिली हैं, वह कमरा 1997 में मुस्लिम पक्ष ने ASI को दे दिया था. यहां पहले ASI का कार्यालय था और वहां पूरे जिले से पुरानी चीजें रखी जाती थीं.

कुतुब मीनार: एक और विवाद
दिल्ली में स्थित कुतुब मीनार है, जो बहुत ही सुंदर और मशहूर इमारत है. पूरी दुनिया से लोग इसे देखने आते हैं. कुछ हिंदू समूहों का दावा है कि यह विश्व धरोहर स्थल हिंदू और जैन मंदिरों को नष्ट करने के बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा बनाया गया था. हालांकि, ASI ने कोर्ट में कहा है कि यह दावा गलत है और कुतुब मीनार सरकार की संपत्ति है. कोर्ट ने भी इस दावे को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि यह दावा बिना किसी तर्क या कानून के किया गया है.

9 जून 2022 को कुंवर महेंद्र ध्वज प्रताप सिंह नाम के एक व्यक्ति ने कोर्ट में अर्जी दी और कहा कि कुतुब मीनार उनकी है. उनका कहना था कि वे आगरा और आसपास के इलाकों के मालिक हैं. कुतुब मीनार भी उन्हीं के इलाके में आता है. मगर, एएसआई ने ने कोर्ट में कहा कि यह दावा गलत है. इस व्यक्ति ने 1947 के बाद से कभी भी किसी कोर्ट में यह दावा नहीं किया था.

ASI ने यह भी कहा कि इस तरह के दावे करने की एक समय सीमा होती है और वह समय सीमा बहुत पहले ही खत्म हो चुकी है. 1913 में जब कुतुब मीनार को एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था, तब भी किसी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की थी.

ताजमहल को लेकर क्या विवाद हुआ?
ताजमहल दुनिया के सबसे खूबसूरत और मशहूर इमारतों में से एक है. इसे ‘दुनिया का अजूबा’ भी कहा जाता है. इसे मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी प्यारी बेगम मुमताज महल की याद में साल 1632 से 1648 के बीच बनवाया था. मुमताज महल की कब्र इसी इमारत में है. बाद में शाहजहां को भी यहीं दफनाया गया था. मगर, समय-समय पर अक्सर हिंदू नेता यहां शिव मंदिर होने का दावा करते रहे हैं.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 12 मई 2022 को बीजेपी नेता रजनीश सिंह की ओर से दाखिल एक अर्जी खारिज कर दी थी. वह चाहते थे कि एक कमेटी बनाई जाए जो यह पता लगाए कि ताजमहल का असली इतिहास क्या है. ताजमहल में 20 से ज्यादा कमरे बंद हैं. रजनीश सिंह चाहते थे कि इन कमरों को खोला जाए और देखा जाए कि कहीं वहां हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां तो नहीं हैं.

इससे एक दिन पहले बीजेपी सांसद दिया कुमारी ने कहा था कि ताजमहल जिस जमीन पर बना है, वह उनके पूर्वजों की थी. उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोर्ट कहेगा तो वे  इसके कागजात भी दिखा सकती हैं. इससे पहले, 2017 में बीजेपी नेता विनय कटियार ने कहा था कि ताजमहल असल में ‘तेजो महालय’ नाम का एक शिव मंदिर है, जिसे एक हिंदू राजा ने बनवाया था. यह दावा सबसे पहले ‘पी.एन. ओक’ नाम के एक इतिहासकार ने 1989 में अपनी किताब में किया था. उन्होंने अपनी बात को सही साबित करने की बहुत कोशिश की और सुप्रीम कोर्ट में भी अर्जी दी. लेकिन कोर्ट ने उनकी बात नहीं मानी.

क्या अपने स्टेटमेंट पर आज भी कायम है आरएसएस?
इस पर एबीपी न्यूज ने बीजेपी नेता आतिफ रशीद से बाचचीत की. उन्होंने कहा, “मोहन भागवत ने जो स्टेटमेंट एक बार दे दिया, वो हमेशा के लिए अटल हो गया. इससे ये साबित होता है कि आरएसएस का मानना है कि हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढने की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने अपना स्टेटमेंट वापस नहीं लिया है. समय के जरूरत के अनुसार वह सही बात कहते हैं. इसके बावजूद भी कुछ लोग न्याय प्रक्रिया के तहत अदालत में जाते हैं तो उस पर न्यायापालिका संज्ञान लेगा. अदालत ने ऐसे मामलों पर बहुत सख्ती से संज्ञान लिया है. कुछ लोग सुर्खियों में आने के लिए भी ऐसा करते हैं.”

आतिफ रशीद ने आगे कहा, “मोहन भागवत जी ने देश की न्याय प्रक्रिया के अंतगर्त स्टेटमेंट दिया है. उन्होंने कहा ‘हमें नहीं लगता कि हर मस्जिद के नीचे मंदिर तलाशने की जरूरत है’. उनका दो साल पहले का ये स्टेटमेंट आज भी वैसे ही वैलिड है. आज भी आरएसएस अपने स्टेटमेंट पर कायम है. अब जहां विवादित मामले हैं, वहां अदालत फैसला करेगा. बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद का समाधान कितनी आसान से कोर्ट के जरिए निकल गया. दोनों पक्षों ने फैसला स्वीकार किया. लेकिन गैर जरूरी विवाद खड़े करने की आवश्यकता नहीं है.”

“आरएसएस समाज में संदेश देने का काम करता है. उनका ये स्टेटमेंट हमेशा कायम रहेगा. जो 50 साल पहले स्टैंड था ‘एक देश एक विधान एक संविधान’, यही स्टैंड आज भी कायम है. 50 साल पहले स्टैंड था ‘देश में एकता हो सप्रभुता हो’, यह आज भी है.”

अब बयान पर क्यों खामोश हैं मोहन भागवत?
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता आजम खान ने एबीपी न्यूज से कहा, “मोहन भागवत की बात एकदम सही है. बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 1991 के वर्शिप एक्ट को वैलिड ठहराया था. प्राचीन शासक या मध्यकालीन शासक की गलतियों को वर्तमान भारत में सुधार नहीं सकते हैं. इसलिए ये एक्ट सही है. अगर इस एक्ट का पालन होता, तो शायद आज ये सब विवाद खड़े नहीं होते.”

“सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने जब से ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे की अनुमति दी है तब से इस तरह के मामले और ज्यादा बढ़ गए हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट चाहे तो इन विवादों को रोका जा सकता है. वरना बीजेपी और आरएसएस का ये पसंदीदा मुद्दा है. ये लोग जनता को धार्मिक विवाद पर उलझाकर रखना चाहते हैं.”

सपा प्रवक्ता आजम खान ने आगे कहा, “मोहन भागवत खामोश इसलिए हैं क्योंकि उन्हें अब पता चल गया है कि धार्मिक एजेंडा ही शायद राजनीतिक सफलता का सबसे बड़ा हथियार है. पहले बीजेपी का राजनीतिक एजेंडा प्रोग्रेस पर था, तो उन्हें लग रहा था कि धार्मिक एजेंडे की जरूरत नहीं है. सॉफ्ट रहते हैं. तभी मोहन भागवत ने ऐसा बयान दिया. मगर 2024 लोकसभा चुनाव में 400 पार का नारा फेल होने के बाद वह कोर हिंदुत्व के मुद्दे पर लौटने के लिए मजबूर हो गए. आएसएस बीजेपी की जननी है. आरएसएस के अनुसार ही बीजेपी चलती है.”

वहीं कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने एबीपी न्यूज से कहा, मोहन भागवत और बीजेपी नेता अपनी इमेज पब्लिकली और दुनिया में ठीक करने के लिए अक्सर इस तरह के बयान देते हैं. लेकिन उनका मकसद कुछ और ही होता है. संभल मस्जिद का मुद्दा अभी इतना सुर्खियों में है. लेकिन बीजेपी और आरएसएस का एक बयान नहीं आया.

RSS का क्या कहना है
आरएसएस के एक प्रचारक ने एबीपी न्यूज को बताया, आरएसएस सरसंघचालक का स्टेटमेंट साल में एक-दो बार कुछ मौकों पर ही आता है. जैसे विजयदशमी उत्सव पर, जब संघ की स्थापना हुई थी या संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह पर उनका बयान आता है. फिर उनकी बात को ही पूरे साल फॉलो किया जाता है. अगर हर व्यक्ति बोलने लगेगा, तो उनमें और राजनीतिक व्यक्ति में अंतर क्या रह जाएगा. इसलिए संघ के लोग कोई इंटरव्यू नहीं देते या उनका कोई लेख भी पब्लिश नहीं होता.

फिर एबीपी न्यूज ने बरली महानगर प्रचार प्रमुख विकास सक्सेना से इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की. उन्होंने कहा, “परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कभी भी ये नहीं कहा कि हिंदू मंदिर पर से अपना दावा छोड़ दिया जाए या उनकी सच्चाई जानने का प्रयास न किया जाए. सवाल ये है कि क्या किसी भी ऐसे स्थान पर जहां मुगल आक्रांताओं ने हिंदू धर्म स्थल को तोड़कर उनका स्वरूप बदल दिया, उनको मस्जिद में बदल दिया, तो क्या लोगों को ये जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उनका वास्तविक स्वरूप क्या था?”

“परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने ये बात अवश्य कही थी कि अनावश्यक किसी तरह का विवाद नहीं होना चाहिए. अगर कहीं पर मस्जिद ही है, तो उन पर विवाद नहीं होना चाहिए. लेकिन, अगर किसी इमारत के ऐतिहासिक प्रमाण मिलता है तो उनकी जांच या सर्वे जरूर होना चाहिए. आज हमारे देश बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो मुगलों को आक्रांता मानने के लिए तैयार नहीं है. विदेशी मानने के लिए तैयार नहीं है. वह लोग ये मानते हैं कि जब से अंग्रेज आए, विदेशी भी तभी से आए. इन मुगल आक्रांताओं ने किस तरह भारत की संस्कृति को नष्ट करने का काम किया, इसकी जानकारी लोगों को होनी चाहिए.”

मंदिर-मस्जिद सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा?
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा, “बीजेपी और आरएसएस कहता कुछ है और करता कुछ है. आरएसएस का पूरा लिटरेचर एंटी मुस्लिम हैं. इनकी किताबों में लिखा है ‘जब मैं बनारस जाता हूं और गंगा के किनारे मस्जिद का मीनारा देखता हूं, तो मुझे लगता है जब तक इनको न हटाया जाएगा, तब तक हमें चैन नहीं आएगा.’ ऐसी विचारधारा रखने लोग कभी अपनी विचारधारा से हट नहीं सकते हैं. इन लोगों के लिए मंदिर-मस्जिद सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा है. वह चाहते हैं कि मंदिर-मस्जिद करके हिंदू भाइयों के धार्मिक जज्बातों के साथ खिलवाड़ किया जाए और उसका राजनीतिक फायदा उठाया जाए.”

एबीपी न्यूज ने सीनियर जर्नलिस्ट राशिद किदवई से भी बातचीत की. उन्होंने कहा, “धर्म और राजनीति का संगम बहुत समस्याओं को जन्म देता है. इसलिए संविधान निर्माताओं ने ऐसे आस्था से जुड़े तमाम मामले और राजनीतिक से अलग रखा. अब संठगन हर मुद्दे पर अपना फायदा नुकसान देखते हैं. ऐसे में संविधान की बात खत्म हो जाती है. इसलिए मोहन भागवत ही नहीं, बल्कि तमाम नेता परिस्थिति बदलने पर चुप्पी साध लेते हैं. क्योंकि वह समझ लेते हैं समाज में अब कैसा माहौल बन रहा है. लोग एकजुट हो रहे हैं या नहीं.”

राशिद किदवई ने आगे कहा,  “हम 400 साल, 500 साल पहले के इतिहास की बात करते हैं. लेकिन इतिहास तो उससे भी बहुत पुराना है. 1000 साल या 5000 साल पहले का इतिहास क्यों नहीं देखते. कहने का मतलब है आज हम अपनी सुविधा के अनुसार इतिहास देखते हैं. नेता भी परिस्थिति के अनुसार बयान देते हैं, फिर छोड़ देते हैं. लेकिन ये गंभीर मुद्दे हैं. चुनावी फायदे के लिए ये सब नहीं करना चाहिए.”

हालांकि, महानगर प्रचार प्रमुख विकास सक्सेना ने कहा, “सच को जब हम छिपाते हैं तो ये ज्वालामुखी बनकर फूटकर बाहर आता है. फिर इसके दुष्परिणाम सभी को भुगतने पड़ते हैं. जरूरी है कि पहले सच सामने आए, फिर उसपर बैठकर चर्चा की जाएगी कि इसका क्या समाधान हो सकता है. अगर कोई एक विचारधारा ये कहती है कि हम किसी के साथ रह ही नहीं सकते हैं, तो समस्या खड़ी होती है. सनातन संस्कृति हमेशा से विविधता में एकता की बात करती है. सनातन धर्म में सभी प्रकार के मत संप्रदाय के लिए स्थान है. किसी से हमारा बैर नहीं है. सनातन सभी को साथ लेकर चलने वाला धर्म है. यही हिंदुत्व की पहचान है.”

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