अमेरिका के पाकिस्तान के लंबी दूरी के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर आपत्ति जताने के बाद पाकिस्तान ने अब मुंह खोला है. पाकिस्तान की स्टेटमेंट से लगता है कि वह अमेरिका और भारत के रिश्तों को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हो रहा है. पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ अपने पुराने संबंधों की उसे याद दिलाते हुए कहा कि हमारा और आपका सहयोग का तो पुराना इतिहास रहा है.
दरअसल पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने अमेरिका की टिप्पणियों को ‘अनुचित और बिना किसी ऐतिहासिक संदर्भ’ का बताया. पाकिस्तान ने कहा कि वह अपनी मिसाइल क्षमताओं के विकास को जारी रखेगा. उसके लिए अपनी ‘न्यूनतम निरोधक रणनीति’ के तहत अपनी सुरक्षा को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है. पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह ऐसा इसलिए करता रहेगा क्योंकि उसे लगता है कि भारत से पैदा होने वाले खतरे को भी उसे हैंडल करना है.
अमेरिका ने कहा था, पाक का मिसाइल कार्यक्रम खतरनाक…
पाकिस्तान के न्यूज पोर्टल डॉन के मुताबिक, विदेश कार्यालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच ने कहा, अमेरिका ने पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता से तथाकथित खतरे की जो बात उठाई है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने कहा कि इन आरोपों का कोई आधार नहीं हैं और इनमें न तर्क है न ऐतिहासिक समझ. अमेरिकी डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी अडवाइजर जॉन फिनर ने कहा था पाकिस्तान ने ऐसी बैलिस्टिक मिसाइलें बना ली हैं जिनसे साउथ एशिया से बाहर, ही नहीं अमेरिका को भी निशाना बनाया जा सकता है.
पाकिस्तान को लगता है कि अमेरिका ने उसे इसलिए निशाने पर लिया है क्योंकि वह भारत के साथ अपने हित साधना चाहता है. पाकिस्तान को लगता है कि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा और अस्थिरता पैदा हो जाएगी. बलोच ने कहा, हमारे पूर्वी पड़ोस में कहीं अधिक शक्तिशाली मिसाइल क्षमताओं की अनदेखी करते हुए और उन्हें छुपाते हुए पाकिस्तान पर सवाल उठाए जा रहे हैं. यह दूसरों के कहने पर किया जा रहा है. डॉन के मुताबिक, बाइडेन ने अक्टूबर 2023 से पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम चार राउंड सैंक्शन लगाए हुए हैं.
क्या पाकिस्तान सच में ऐसी मिसाइल बना सकता है जो अमेरिका तक पहुंच जाए?
पहली बार अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने औपचारिक तौर पर दावा किया है कि पाकिस्तान ने एक ऐसी ‘कारगर मिसाइल टेक्नोलॉजी’ तैयार कर ली है जो उसे अमेरिका को भी निशाना बनाने के योग्य बनाएगी.
अमेरिकी थिंक टैंक कार्नेगी एंडॉमेन्ट के बैनर तले आयोजित होने वाले एक समारोह को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार का कहना है कि पाकिस्तान ने लॉन्ग रेंज मिसाइल सिस्टम और ऐसे दूसरे हथियार बना लिए हैं जो उसे बड़ी रॉकेट मोटर्स से परीक्षण करने की क्षमता देते हैं.
उनका कहना है, “अगर यह सिलसिला जारी रहता है तो पाकिस्तान के पास दक्षिण एशिया से बाहर भी अपने लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता आ जाएगी, इसमें अमेरिका भी शामिल है और इस बात से पाकिस्तान की संस्थाओं पर वास्तविक सवाल उठते हैं.”
अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार का बयान एक ऐसे समय में सामने आया है जब दो दिन पहले ही बाइडन प्रशासन ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से लैस लंबी दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम से कथित तौर पर जुड़े चार संस्थानों पर प्रतिबंध लगा दिया है. इनमें इस मिसाइल प्रोग्राम की निगरानी करने वाला सरकारी संस्थान नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स (एनडीसी) भी शामिल है.
अमेरिका के लिए संभावित ख़तरों के बारे में बात करते हुए अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार जॉन फाइनर का कहना था कि ऐसे देशों की सूची छोटी है जो परमाणु हथियार भी रखते हों और उनके पास सीधे अमेरिका को निशाना बनाने की क्षमता भी हो. अमेरिका के ऐसे विरोधी हैं- रूस, उत्तर कोरिया और चीन.
उनके अनुसार, “हमारे लिए यह मुश्किल होगा कि हम पाकिस्तान के उठाए गए क़दमों को अमेरिका के लिए ख़तरे के तौर पर न देखें. मुझ समेत हमारे प्रशासन के सीनियर अधिकारियों ने कई बार इन आशंकाओं को पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखा है.”
अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के उप सलाहकार का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का पार्टनर रहा है और वह साझा हितों पर पाकिस्तान के साथ काम करने की भी इच्छा रखते हैं. लेकिन उनका कहना था, “इसके बाद हमारे पास यह सवाल भी उठता है कि पाकिस्तान ऐसी क्षमता क्यों प्राप्त कर रहा है जो हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सके.”
उनके अनुसार, “दुर्भाग्य से हमें लगता है कि पाकिस्तान हमारी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आशंकाओं को गंभीरता से लेने में नाकाम हुआ है.”
अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार के बयान के बाद बीबीसी ने विशेषज्ञों से बात कर यह जानने की कोशिश की है कि अमेरिका को यह आशंका क्यों है कि पाकिस्तान ऐसी मिसाइल तैयार कर रहा है जो अमेरिका में लक्ष्यों को निशाना बना सकेगी? इस समय इस आशंका की वजह क्या है और क्या पाकिस्तान सच में ऐसी मिसाइल बना सकता है जो अमेरिका तक पहुंच जाए?
इसके अलावा इस लेख में हमने यह भी जानने की कोशिश की है कि पाकिस्तान का वह मिसाइल प्रोग्राम, जो हाल में अमेरिकी प्रतिबंधों का निशाना बन रहा है, वह क्या है? इसमें कौन-कौन सी मिसाइल शामिल हैं और अमेरिका को इनसे क्या आशंकाएं हैं? इस लेख में हमने यह भी समझने की कोशिश की है कि अमेरिकी प्रतिबंध पाकिस्तान के मिसाइल प्रोग्राम को कैसे प्रभावित कर सकते हैं.
इस्लामाबाद में रहने वाले रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सैयद मोहम्मद अली के अनुसार पाकिस्तान पर लगाया गया अमेरिकी प्रशासन का हाल का आरोप तकनीकी सच्चाइयों से परे है.
उनके अनुसार पहली वजह तकनीकी है, दूसरी रणनीतिक और तीसरी वजह आर्थिक या राजनीतिक है.
सैयद मोहम्मद अली का दावा है कि पाकिस्तान की बैलिस्टिक मिसाइलों में बदलाव लाने का मक़सद भारत के अलावा किसी दूर-दराज़ के देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि भारत के तेज़ी से बढ़ रहे मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम का मुक़ाबला करना या उसे नाकाम बनाना है.
इसका मतलब यह है कि दुश्मन जितना भी आधुनिक रक्षा प्रणाली बना ले, आपकी बैलिस्टिक या क्रूज़ मिसाइल उसे नाकाम बनाने की क्षमता रखती हो और उसका रेंज से कोई संबंध नहीं है.
वह इसराइल के पांच स्तरों पर आधारित डिफ़ेंस सिस्टम का उदाहरण देते हैं जिसमें एयरो और आयरन डोम से लेकर डेविड्स स्लिंग, इंटरसेप्टर और एंटी एयरक्राफ़्ट गन भी शामिल हैं.
“अगर कोई मिसाइल पांच स्तरों से निकलकर अपने लक्ष्य को निशाना बनाकर उसे नष्ट करने की क्षमता रखती है तो इसका एमआईआरवी (मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल) से लैस होना ज़रूरी होता है, जैसा कि पाकिस्तानी मिसाइल अबाबील है.”
सैयद मोहम्मद अली के अनुसार एमआईआरवी का मतलब एक ऐसी मिसाइल है जो एक ही समय पर कई वॉरहेड्स ले जा सकती है और यह स्वतंत्र रूप से प्रोग्राम्ड होते हैं. इन वॉरहेड्स की संख्या तीन से आठ और उससे अधिक भी हो सकती है. रूस के मामले में यह 12 तक है.
यह मिसाइलें स्वतंत्र रूप से अपने-अपने लक्ष्य की ओर जाती हैं और हर एक का लक्ष्य की ओर जाने का रास्ता भी अलग होता है. एक मिसाइल के ज़रिए जब इसे लॉन्च किया जाता है और जब उसकी री-एंट्री व्हीकल दोबारा हवा में आती है तो वह री-एंट्री व्हीकल अलग दिशाओं में फैलकर अपने-अपने लक्ष्य को निशाना बनाती है.
वह इसका उदाहरण लड़ाकू विमान की फ़ॉर्मेशन से देते हैं जो लक्ष्य तक पहुंचने से पहले, वहां पहुंचकर हमले के दौरान और बाद में अलग होती है. फ़ाइटर प्लेन किसी टारगेट पर पहुंचकर सरफ़ेस टू एयर मिसाइल और एंटी एयरक्राफ़्ट गन से बचने के लिए इस अंदाज़ में इधर-उधर फैल जाती हैं कि वह सब दुश्मन की फ़ायरिंग की चपेट में आए बिना अलग-अलग दिशाओं से टारगेट पर हमला कर सकें.
सैयद मोहम्मद अली के अनुसार अमेरिका के पास ऐसी मिसाइल Minuteman III है और भारत ने हाल ही में इस टेक्नोलॉजी में सुधार लाना शुरू किया है.
सैयद मोहम्मद अली का दावा है कि पाकिस्तान अगर इसको बेहतर बना रहा है तो उसका मक़सद भारत के अलावा किसी और देश को लक्ष्य बनाना नहीं है मगर भारत के सिस्टम में आने वाले बदलाव (चाहे वह एस 400 के बारे में हो या किसी और के बारे में) को नाकाम बनाकर उनकी टारगेट तक पहुंचाने की क्षमता को कुंद करना है.
उनका कहना है, “पाकिस्तान किसी ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम नहीं कर रहा जो पहले से भारत के पास नहीं है और भारत न केवल आईसीबीएम (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) बना रहा है बल्कि उन्हें टेस्ट भी कर चुका है जिनकी रेंज 5000 किलोमीटर से अधिक है. इसका मतलब है कि उनका टारगेट पाकिस्तान या चीन नहीं जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान ने इस रेंज की किसी मिसाइल का आज तक परीक्षण नहीं किया.”
उनका कहना है कि पाकिस्तान पर यह आरोप तकनीकी सच्चाई से परे हैं.
इसके बारे में ऑस्ट्रेलिया के शहर कैनबरा की नेशनल यूनिवर्सिटी में स्ट्रैटेजिक ऐंड डिफ़ेंस स्टडीज़ के शिक्षक डॉक्टर मंसूर अहमद कहते हैं, “जब तक एक सिस्टम (मिसाइल) एक रेंज पर टेस्ट नहीं हो जाता तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि इस देश ने यह क्षमता प्राप्त कर ली है और पाकिस्तान ने अब तक ऐसी कोई मिसाइल टेस्ट नहीं की है जिसकी रेंज भारत से बाहर हो.”
सैयद मोहम्मद अली का कहना है कि भारत एसएसबीएन (शिप, सबमर्सिबल, बैलिस्टिक, न्यूक्लियर या न्यूक्लियर पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल) सबमरीन या बैलिस्टिक मिसाइल फ़ायर करने की क्षमता रखने वाली पनडुब्बियां भी बना रहा है.
वह कहते हैं, “मिसाइलों की बहस में ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइलों को तो बहुत महत्व दिया जाता है मगर समंदर की सतह के नीचे या परमाणु पनडुब्बियां रखने वाले देश के बारे में बात नहीं की जाती जिसमें रेंज का चक्कर ही नहीं होता क्योंकि किसी भी देश के पास पनडुब्बी ले जाकर वहां से यह मिसाइल फ़ायर की जा सकती है.”
उनके अनुसार इसकी मिसाल भारत की ‘अरिहंत’ और ‘अरिघात’ परमाणु पनडुब्बियां हैं जो अब भारत की नौसेना का हिस्सा बन चुकी हैं.
याद रहे कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस और चीन के पास भी परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां हैं यानी यह पांच देश दुनिया के किसी भी देश पर परमाणु हमला करने की क्षमता रखते हैं.
सैयद मोहम्मद अली का कहना है कि दो परमाणु पनडुब्बियों को अपनी नौसेना के बेड़े में शामिल करने के बाद भारत ने भी यह क्षमता प्राप्त कर ली है यानी वह उन देशों की पंक्ति में शामिल हो गया है जो अमेरिका समेत दुनिया के किसी भी देश पर परमाणु हमला करने की क्षमता रखते हैं. उनका कहना है कि केवल ज़मीन की सतह से ज़मीन तक मार करने वाली मिसाइलों पर बहस महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलुओं को नज़रअंदाज़ करती है.
सैयद मोहम्मद अली का मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका को निशाना बनाने का सोचे, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से यह संभव नहीं क्योंकि पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार (लगभग 6 अरब डॉलर) अमेरिका है और वहां रह रहे पाकिस्तानियों की बहुत बड़ी संख्या उस देश से पैसे भेजती है. इसके अलावा पाकिस्तान अपनी आर्थिक समस्याओं के हल (आईएमएफ़) के लिए अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना अपनी विदेश नीति के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण लक्ष्य समझता है.
तो अमेरिकी आशंका की वजह क्या है?
डॉक्टर मंसूर अहमद का कहना है कि ऐसा मुमकिन है कि पाकिस्तान (एनडीसी) अबाबील मिसाइल सिस्टम का अधिक सुधरा हुआ वर्ज़न तैयार कर रहा हो जो किसी भी भारतीय बैलिस्टिक मिसाइल डिफ़ेंस शील्ड को तोड़ सकता है और एक से अधिक वॉरहेड्स का भारी पेलोड ले जा सकता है.
उनका यह भी कहना है कि इसके लिए अधिक शक्तिशाली रॉकेटों की ज़रूरत होगी. “अमेरिकी अधिकारी एनडीसी पर इसकी तैयारी का आरोप लगा रहे हैं लेकिन यह भारत के लिए बनाए गए विशेष मिसाइल सिस्टम को आईसीबीएम (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) सिस्टम में बदल नहीं सकता और इसके लिए बिल्कुल नए मिसाइल सिस्टम की ज़रूरत होगी.”
अमेरिका की आशंका की टाइमिंग के बारे में सैयद मोहम्मद अली और डॉक्टर मंसूर दोनों ही इसका आरोप बाइडन प्रशासन पर लगाते हैं. उनका दावा है कि बाइडन प्रशासन बहुत अधिक भारत के प्रभाव में है.
सैयद मोहम्मद अली कहते हैं कि यह अमेरिका के नीति निर्धारक वर्गों में भारत के बढ़ते प्रभाव का परिणाम है और पाकिस्तान की रक्षा क्षमताओं में कमी लाने के लिए भारत अब अमेरिका का कंधा और दबाव इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है.
उनका कहना है कि पाकिस्तान की रक्षा क्षमताओं की आलोचना करना और इसे लेकर आशंकाएं जताना इस बात का सबूत है कि वॉशिंगटन में भारतीय लॉबी बाइडन के आख़िरी दिनों में उनकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाना चाहती है.
सैयद मोहम्मद अली का मानना है कि भविष्य में भी ऐसा मुमकिन नहीं है कि पाकिस्तान अमेरिका पर हमला करने की क्षमता प्राप्त कर ले क्योंकि “पाकिस्तान का मिसाइल व एटॉमिक प्रोग्राम भारत के लिए ख़ास है और पाकिस्तान किसी तरह की हथियारों की दौड़ में शामिल नहीं है.”
पाकिस्तान का मिसाइल प्रोग्राम और अमेरिकी प्रतिबंध
पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम से संबंधित संस्थानों और सप्लायर्स पर अमेरिकी प्रतिबंधों का सिलसिला ख़त्म नहीं हो रहा है. 2024 में तीसरी बार बैलिस्टिक मिसाइल की तैयारी में सहायता के आरोप में चार और संस्थानों पर पाबंदी लगाई गई है.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह पाबंदियां नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स समेत तीन फ़र्मों पर लगाई जा रही हैं जो बड़े पैमाने पर तबाही फैलाने वाले हथियारों की तैयारी और उनके लिए पार्ट-पुर्ज़े उपलब्ध कराने में शामिल हैं.
जिन चार संस्थानों पर पाबंदियां लगाई गई हैं उनमें नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स के अलावा अख़्तर ऐंड संस प्राइवेट लिमिटेड, एफ़िलिएट्स इंटरनेशनल और रॉक साइड इंटरप्राइज़ शामिल हैं.
इस बयान के अनुसार इनमें से इस्लामाबाद में स्थित नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स (एनडीसी) ने पाकिस्तान के लंबी दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम की तैयारी के लिए अलग-अलग पुर्ज़े प्राप्त किए हैं जिसमें ख़ास तरह के व्हीकल शैसी (चेसीस) शामिल हैं जो मिसाइल लॉन्चिंग और टेस्टिंग के लिए इस्तेमाल होते हैं.
अमेरिका का आरोप है के एनडीसी शाहीन सिरीज़ की मिसाइल समेत पाकिस्तान की दूसरी बैलिस्टिक मिसाइलों की तैयारी में लगा हुआ है.
बयान के अनुसार कराची स्थित अख़्तर ऐंड संस प्राइवेट लिमिटेड ने एनडीसी के लिए पाकिस्तान के लंबी दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के लिए कई पुर्ज़े उपलब्ध कराए हैं.
इसके अलावा कराची के ही एफ़िलिएट्स इंटरनेशनल पर आरोप है कि उसने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम में मदद के लिए एनडीसी और दूसरे संस्थानों के लिए मिसाइल बनाने के ज़रूरी सामान की ख़रीदारी में भूमिका अदा की है.
याद रहे कि इससे पहले इस साल सितंबर में अमेरिका ने एक चीनी रिसर्च इंस्टीट्यूट और कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए थे जिनके बारे में उनका दावा था कि वह पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के लिए पुर्ज़े और टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराने में शामिल हैं.
इसके अलावा इसी साल अप्रैल में चीन की तीन और बेलारूस की एक कंपनी पर पाबंदी लगाई गई थी. अक्टूबर 2023 में पाकिस्तान को बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के पुर्ज़े और सामान उपलब्ध कराने के आरोप में चीन की तीन और कंपनियों पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाए गए थे.
लेकिन पाकिस्तान ने इस अमेरिकी कार्रवाई को ‘निराशाजनक’ बताते हुए कहा है कि हाल के अमेरिकी प्रतिबंधों का मक़सद क्षेत्र में सैन्य असंतुलन को बढ़ावा देना है.








