अमेरिका में कुशल कामगारों को नौकरी करने की अनुमति देने वाला H1-B वीजा इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. कुछ राइट विंग एक्टिविस्ट इस वीजा प्रोग्राम को खत्म करने की मांग कर रहे हैं. यह मांग तब और तेज हो गई जब भारतीय-अमेरिकी श्रीराम कृष्णन को व्हाइट हाउस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए वरिष्ठ नीति सलाहकार नियुक्त किया गया.
इसके बाद एलन मस्क भी इस बहस में कूद पड़े और कानूनी तरीके से आने वाले कुशल प्रवासियों का समर्थन किया. अब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है और उन्होंने इस वीजा प्रोग्राम का समर्थन किया है.
ट्रंप ने 28 दिसंबर शनिवार को न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “मैं हमेशा से H-1B वीजा का समर्थक रहा हूं. मैंने खुद कई बार इसका इस्तेमाल किया है. यह एक बहुत अच्छा प्रोग्राम है.”
इस स्पेशल स्टोरी में आप बेहद आसान भाषा में जानेंगे कि आखिर इस पूरी बहस की शुरुआत कैसे हुई, भारतीय ही निशाने पर क्यों आए, भारत का इस पर क्या असर होगा और ट्रंप के नए कार्यकाल में भारत के लिए कैसे मुश्किल है.
पहले समझिए क्या है H1-B वीजा प्रोग्राम
H-1B वीजा एक ऐसा प्रोग्राम है जिसके जरिए अमेरिकी कंपनियां विदेशी नागरिकों को खास तरह की नौकरियों के लिए अपने यहां काम पर रख सकती हैं. यह वीजा उन लोगों के लिए होता है जो अमेरिका के नागरिक या स्थायी निवासी नहीं हैं. मतलब, अगर आप अमेरिकी नागरिक नहीं हैं और अमेरिका में नौकरी करना चाहते हैं, तो पहले ‘इमिग्रेशन एंड नेशनैलिटी एक्ट’ के तहत H1-B वीजा लेना होगा.
यह वीजा उन कंपनियों के लिए मददगार साबित होता है जिन्हें अमेरिका में अपनी जरूरत के हिसाब से काबिल कर्मचारी नहीं मिल पाते. इस वीजा पर ज्यादा से ज्यादा 6 साल तक अमेरिका में काम कर सकते हैं.
लेबर डिपार्टमेंट की वेबसाइट के अनुसार, H1-B वीजा प्रोग्राम खास तरह की नौकरियों के लिए बनाया गया है. ये नौकरियां ऐसी होती हैं जिनमें बहुत ज्यादा ज्ञान और हुनर चाहिए होता है. जैसे कि इंजीनियरिंग, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग या मेडिकल. इसके लिए कम से कम बैचलर डिग्री या उसके बराबर का अनुभव होना जरूरी है. अगर कोई कंपनी अमेरिका में किसी खास काम के लिए योग्य कर्मचारी नहीं ढूंढ पाती, तो वह H1-B वीजा के जरिए किसी दूसरे देश के काबिल कर्मचारी को नौकरी पर रख सकती है.
H1-B वीजा के लिए कैसे करें आवेदन?
H1-B वीजा के लिए हम खुद आवेदन नहीं कर सकते. H-1B वीजा उन लोगों को मिल सकता है जिन्हें किसी अमेरिकी कंपनी ने प्रोफेशनल नौकरी का ऑफर दिया है. वही कंपनी इस वीजा के लिए आवेदन करती है.
इसके लिए आपको किसी अमेरिकी कंपनी की जरूरत होगी जो आपके आवेदन को प्रायोजित करे. आमतौर पर H1-B वीजा तीन साल के लिए दिया जाता है, लेकिन इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है. कई बार H1-B वीजा धारक आगे चलकर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करते हैं. ग्रीन कार्ड मिलने पर उन्हें अमेरिका में स्थायी निवास और काम करने की अनुमति मिल जाती है.
H1-B वीजा: कौन है इसके लिए योग्य?
अगर आप अमेरिका में H1-B वीजा पर काम करना चाहते हैं, तो आपको कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी. सबसे पहले आपके पास किसी अमेरिकी कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव होना चाहिए. यह नौकरी ऐसी होनी चाहिए जिसमें खास तरह के ज्ञान या कौशल की जरूरत हो, जैसे कि इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, मेडिसिन या फाइनेंस.
आपके पास उस क्षेत्र में कम से कम बैचलर डिग्री या काफी काम का अनुभव होना चाहिए. उस कंपनी को यह दिखाना होगा कि उन्होंने आपको नौकरी देने से पहले उस पद के लिए योग्य अमेरिकी नागरिकों की तलाश की थी. अगर इन सभी शर्तों को पूरा करते हैं, तो कोई भी भारतीय H1-B वीजा के लिए आवेदन कर सकता है. साथ ही, आवेदक का मकसद अमेरिका में सिर्फ पैसा कमाना होना चाहिए, न कि अपने शौक पूरे करना या किसी सामाजिक सेवा में लगना.
H1-B वीजा विवाद: कैसे हुई शुरुआत?
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब कुछ राइट विंग एक्टिविस्ट लोगों और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) के समर्थकों ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के उस फैसले की आलोचना की जिसमें उन्होंने भारतीय-अमेरिकी श्रीराम कृष्णन को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नीति सलाहकार के रूप में नियुक्त किया था. सरल शब्दों में कहें तो कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आया कि एक भारतीय मूल के व्यक्ति को इतने महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया है. उन्हें डर है कि इससे अमेरिका में H1-B वीजा पर आने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ सकती है.
दरअसल, श्रीराम कृष्णन पहले भी H1-B वीजा पर ज्यादा से ज्यादा विदेशी लोगों को अमेरिका लाने और ग्रीन कार्ड की सीमा हटाने की बात कह चुके हैं. इसी बात को लेकर कुछ लोग उनका विरोध कर रहे थे.
H1-B वीजा को लेकर छिड़ी बहस में एलन मस्क ने करारा जवाब दिया है. उन्होंने उन लोगों को कड़ी फटकार लगाई है जो H1-B वीजा का विरोध कर रहे हैं. मस्क ने यहां तक कहा, “मैं, SpaceX, Tesla और सैकड़ों अन्य कंपनियों को बनाने वाले कई महत्वपूर्ण लोग अमेरिका में इसी H1-B वीजा की वजह से हैं, जिन्होंने अमेरिका को मजबूत बनाया है.”
ट्रंप का यू-टर्न: पहले विरोध, अब समर्थन!
यह खास बात है कि अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले H1-B वीजा के कट्टर आलोचक थे, अब इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं. ट्रंप ने पहले H1-B वीजा को अमेरिकी नागरिकों के लिए ‘बहुत बुरा’ और ‘अनुचित’ कहा था. अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने ‘हायर अमेरिकन’ नीति लागू की थी ताकि वीजा केवल हुनरमंद या सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाले लोगों को ही मिले.
लेकिन, अब ट्रंप H1-B वीजा का समर्थन कर रहे हैं. इसके पीछे शायद यह तर्क है कि अमेरिका की टेक इंडस्ट्री को चलाने के लिए विदेशों से हुनरमंद लोगों की जरूरत है. खुद एलन मस्क की कंपनी टेस्ला ने भी 2024 में 724 H1-B वीजा हासिल किए हैं.
इस विवाद को लेकर भारतीय निशाने पर क्यों?
H-1B वीजा अमेरिका में एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है. इस वीजा धारकों में भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा है, इसलिए किसी भी बदलाव का सबसे बड़ा असर उन्हीं पर पड़ेगा. ये वीजा प्राप्त करने वालों में लगभग 70% भारतीय हैं. अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 में अमेरिका द्वारा जारी किए गए सभी H-1B वीजा में से 72.3% वीजा भारतीय नागरिकों को मिले हैं. इस कारण इस वीजा प्रोग्राम में किसी भी बदलाव का भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर होगा.
कुछ अमेरिकी मानते हैं कि H-1B वीजा धारक उनकी नौकरियां छीन रहे हैं क्योंकि वे कम सैलेरी पर काम करने को तैयार हैं. यह भी तर्क दिया जाता है कि H-1B वीजा धारकों की वजह से अमेरिकी कर्मचारियों की सैलेरी में कमी आ रही है.
कुछ कंपनियों पर आरोप है कि वे H-1B वीजा का दुरुपयोग सस्ते श्रम के लिए कर रही हैं और अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी देने से बच रही हैं. कुछ राजनीतिक दल अपने हितों के लिए H-1B वीजा का विरोध करती हैं और इस मुद्दे को उछालकर भारतीयों को निशाना बनाते हैं.
H1-B वीजा का भविष्य क्या होगा?
एक्टिविस्ट लॉरा लूमर ने अमेरिकी टेक इंडस्ट्री पर आरोप लगाया कि वे वीजा सिस्टम का दुरुपयोग कर रहे हैं और अमेरिकी नागरिकों को हाशिए पर धकेल रहे हैं. वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए इस वीजा प्रोग्राम को लेकर अपनी योजना साफ नहीं की है. हालांकि ट्रंप का ध्यान अभी गैरकानूनी तरीके से अमेरिका आने वालों को रोकने पर ज्यादा है, लेकिन नौकरी के लिए मिलने वाले वीजा को लेकर उनकी क्या नीति होगी, यह अभी पता नहीं है. ऐसे में अमेरिका में H1-B वीजा का भविष्य अभी भी अधर में लटका हुआ है.
संभव है कि ट्रंप प्रशासन H1-B वीजा के नियमों को और कड़ा कर दे, ताकि अमेरिकी कंपनियां पहले अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देने पर मजबूर हों. यह भी हो सकता है कि हर साल दिए जाने वाले H1-B वीजा की संख्या कम कर दी जाए. यह भी संभव है कि ट्रंप प्रशासन H1-B वीजा प्रोग्राम में कोई खास बदलाव न करे.
H1-B वीजा पर अमेरिका जाने वाले ज्यादातर लोग भारतीय होते हैं. इसलिए इस वीजा प्रोग्राम में होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा असर भारतीयों पर पड़ेगा. अभी यह कहना मुश्किल है कि ट्रंप प्रशासन H1-B वीजा को लेकर क्या फैसला लेगा. लेकिन यह जरूर है कि इस वीजा का भविष्य अभी अनिश्चित है.
अमेरिका में भारतीय एच-1बी वीजा होल्डर के खिलाफ हो रहे विरोध को लेकर केंद्र सरकार अलर्ट हो गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय, IT मंत्रालय और कॉमर्स डिपार्टमेंट अमेरिका में वैध रूप से काम करने वाले भारतीय प्रोफेशनल्स की स्थिति पर नजर रख रही है।
सरकार के एक सूत्र ने बताया कि ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए, जहां हमारे भारतीय प्रोफेशनल्स को अमेरिका में रहने की दिक्कत हो। सरकार इस बारे में चिंतित है। IT मंत्रालय भी स्थिति को समझने के लिए बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों से फीडबैक ले रहा है। IT मंत्रालय ने कंपनियों से पूछा है कि ग्राउंड पर इस वीजा को लेकर क्या हालात हैं।
सरकार के सूत्र ने कहा कि हम नहीं चाहते की भारत-अमेरिका के बीच कानूनी ढांचे में कोई बाहरी कारण की चलते दिक्कतें आएं। अमेरिका की ओर से भी यह नहीं होना चाहिए।
दरअसल, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड इस वीजा के विरोध में रहे हैं। उनके समर्थक उद्योगपति मस्क ने भी सोमवार को कहा था कि H1B वीजा खत्म जैसा है। उन्होंने एक पोस्ट के जवाब में कहा कि इस प्रोग्राम में न्यूनतम सैलरी और मेंटेनेंस को बढ़ाकर इसमें सुधार किया जाना चाहिए। हालांकि, ट्रम्प ने कई मौकों पर वीजा के समर्थन में भी बयान दिए हैं।








