चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नए साल के मौके पर ये बात कही। 31 दिसंबर को जिनपिंग ने ‘न्यू ईयर स्पीच’ में ताइवान को साथ लाने और चीन की इकोनॉमी को मजबूत करने पर जोर दिया। हालांकि ताइवान को लेकर उनके आक्रामक रुख ने सभी का ध्यान खींचा।
दरअसल, पिछले साल चीन ने ताइवान के आसपास मिलिट्री मूवमेंट तेज किया। आए दिन ताइवान के नजदीकी समुद्री और हवाई इलाकों में चीन ने वॉरशिप और प्लेन भेजे। इन हरकतों को ताइवान के अधिकारी चीन की सैन्य मौजूदगी को ‘सामान्य’ बनाने की कोशिश मानते हैं।
ताइवान पर चीन क्यों कब्जा करना चाहता है, क्या चीन जंग करने की स्थिति में है और इस पर भारत का क्या रुख है;
जिनपिंग ने ताइवान को लेकर क्या बयान दिया और इसके क्या मायने हैं?
2024 की आखिरी शाम यानी 31 दिसंबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘न्यू ईयर स्पीच’ दी, जिसमें उन्होंने ताइवान को लेकर आक्रामक रुख अपनाया। जिनपिंग ने कहा,
शी जिनपिंग ने इस बयान के जरिए ताइवान और उसकी आजादी के समर्थक देशों को चेतावनी दी है। जिनपिंग ताइवान को फिर से चीन का हिस्सा बनाना चाहते हैं। जिनपिंग ने बयान में आगे कहा कि चीन और ताइवान के लोग एक ही परिवार हैं। कोई भी हमारे पारिवारिक बंधन को नहीं तोड़ सकता और कोई भी इन दो देशों को एक होने से रोक नहीं सकता।
विदेश मामलों के जानकार और JNU के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं, ‘ताइवान अब चीन के लिए राष्ट्रवाद का मुद्दा बन चुका है। कोरोना के बाद से चीन की इकोनॉमी में भारी गिरावट हुई है। बढ़ती जनसंख्या और कम होते रिसोर्सेस को कंट्रोल करना चीन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। जनता इन मुद्दों को बखूबी समझ चुकी है। इसलिए जिनपिंग ताइवान के मुद्दे को हवा देकर जनता का ध्यान भटका रहे हैं।’
जिनपिंग ने ताइवान पर कब्जे की बात अभी क्यों की?
ताइवान को लेकर चीन की पॉलिसी हमेशा से एक जैसी रही है, जिसमें कोई बदलाव नहीं हुआ। पिछले साल ताइवान में हुए राष्ट्रपति चुनाव में DPP पार्टी के नेता जीते, जो ताइवान की आजादी के सपोर्टर हैं।
वहीं, करीब 20 दिन बाद अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपना कार्यभार संभालेंगे और अमेरिका ताइवान को सपोर्ट करता है। ऐसे वक्त में शी जिनपिंग ने चेतावनी दी है कि ताइवान के मुद्दे पर कोई बीच में न आए।’
विदेश मामलों के जानकार कहते है कि चीन ने 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने की प्लानिंग की है। इस वजह से जिनपिंग ने अपने बयान से अमेरिका को चेतावनी भी दी है।
दरअसल, 20 जनवरी को डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने वाले हैं। अभी तक अमेरिका ताइवान की मदद करता आ रहा है, लेकिन जिनपिंग चाहते हैं कि अब ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद ताइवान को मदद न मिले।
अक्टूबर 2024 में अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने हिंद महासागर में क्वाड ग्रुप का मालाबार युद्धाभ्यास भी किया था। इसके जरिए क्वाड देशों ने चीन के सामने शक्ति प्रदर्शन किया था और उसे पीछे हटने का मैसेज दिया था। इसके जवाब में चीन ने भी रूस के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर में युद्धाभ्यास किया था। दरअसल, क्वाड के बढ़ते दबदबे को चीन कम करना चाहता है।
ताइवान पर चीन कब्जा क्यों करना चाहता है?
ताइवान और चीन के बीच मौजूदा तनातनी दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद शुरू हुई। तब चीन में राष्ट्रवादी सरकारी सेना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गृह युद्ध शुरू हो गया था। 1949 में कम्युनिस्ट जीत गए और उनके नेता माओत्से तुंग ने चीन की राजधानी बीजिंग को कंट्रोल में ले लिया।
जबकि हार के बाद राष्ट्रवादी पार्टी कुओमिंतांग के नेता ताइवान भाग गए। तब से ही कुओमिंतांग ताइवान की सबसे प्रमुख राजनीतिक पार्टी है और ताइवान पर ज्यादातर समय इसी पार्टी का शासन रहा है।
ताइवान पर कब्जे की बात चीन किस बूते कह रहा है?
चीन लगातार ताइवान पर कब्जा करने का ऐलान करता रहा है। 3 पॉइंट्स में समझते हैं कि चीन किस तरह कब्जा कर सकता है…
1. चीन ने ताइवान की समुद्री सीमा को घेरा दिसंबर 2024 की शुरुआत से चीन ने ताइवान के आसपास के समुद्री इलाकों को घेरना शुरू कर दिया था। चीन ने दक्षिणी चीन सागर में बड़ी संख्या में नेवी के जवानों और युद्धपोतों को तैनात किया है। इसके साथ ही 2024 में चीन ने ताइवान के चारों ओर की समुद्री सीमा में दो सैन्य युद्धाभ्यास भी किए थे। चीन इन मिलिट्री एक्टिविटी को नॉर्मल रूटीन बताता है, जिससे वह ताइवान की समुद्री सीमा को पूरी तरह से घेर सके।
2. दुनिया की सबसे बड़ी नेवी चीन के पास अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नेवी पावर है। वह अमेरिका से भी आगे निकल गया है। चीन की नेवी में 370 युद्धपोत हैं, तो अमेरिका के पास लगभग 300 युद्धपोत हैं। अमेरिकी नौसेना संस्थान ने अनुमान लगाया है कि 2035 तक चीन की नेवी अमेरिका से 1.5 गुना ज्यादा बड़ी हो जाएगी।
अभी चीन के पास 60 सबमरीन हैं, जिनमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाली और बैलिस्टिक मिसाइल से लैस सबमरीन भी शामिल हैं। अमेरिका के पास 67 सबमरीन हैं, लेकिन सभी प्रशांत महासागर में तैनात नहीं हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने अनुमान लगाया है कि पुरानी सबमरींस के रिटायर होने के बाद 2035 तक चीन के पास 80 से ज्यादा सबमरीन हो जाएंगी।
कैम्पबेल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सल्वाटोर मर्कोग्लियानो के मुताबिक, अमेरिका लगातार अपनी नेवी पावर को कम कर रहा है। अमेरिका हर साल जितने नए जहाज अपनी नेवी को दे रहा है, उससे ज्यादा रिटायर हो रहे हैं। वहीं, चीन लगातार अपनी नेवी पावर बढ़ा रहा है, जिसके चलते चीन के पास आज सबसे बड़ी नेवी है।
3. ताइवान के मुद्दे पर चीन के साथ रूस अक्टूबर 2024 में चीन के साथ रूस के डिप्लोमेटिक रिलेशंस को 75 साल पूरे हुए। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ताइवान मुद्दे पर चीन का समर्थन करते हुए कहा कि ताइवान को लेकर रूस हमेशा से चीन का समर्थन करता आया है, ये आगे भी जारी रहेगा। रूस और चीन एशिया-प्रशांत एरिया में पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रभाव पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। लावरोव ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह ताइवान के आसपास अपनी मिलिट्री एक्टिविटीज बढ़ाकर नई टेंशन पैदा कर रहा है। उन्होंने ताइवान को चीन का हिस्सा बताते हुए जिनपिंग का समर्थन किया था।
क्या चीन पहले भी ताइवान पर कब्जा करने की बात कर चुका है?
जनवरी 1979 में चीन ने पहली बार ताइवान को मिलाने की बात कही थी। 1980 के दौरान चीन और ताइवान के बीच रिश्ते बेहतर होने लगे थे। दोनों देशों के बीच बिजनेस, इन्वेस्टमेंट और टूरिज्म भी बढ़ने लगा था, जो 35 साल जारी रहा।
2016 में ताइवान में डेमोक्रेटिक ग्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) के त्साई इंग-वेन राष्ट्रपति बने। वेन ताइवान को चीन में मिलाने का विरोध करते रहे हैं। इसके बाद से चीन और ताइवान के बीच विवाद बढ़ता गया। ताइवान की ओर से लगातार चीन के प्रभाव से आजादी की मांग उठने लगी। 2 जनवरी 2019 को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान के साथ शांतिपूर्वक बातचीत करने का ऐलान किया, लेकिन जिनपिंग ने ताइवान की आजादी की मांग को खारिज कर दिया।
क्या मौजूदा स्थिति में ताइवान पर कब्जे के लिए चीन जंग का ऐलान कर सकता है?
‘चीन मौजूदा समय में ताइवान पर हमला नहीं कर सकता क्योंकि चीन की इकोनॉमी बुरी तरह बिगड़ी हुई है। ऐसे में अगर जंग का ऐलान होता है तो दुनियाभर के देश चीन के खिलाफ हो जाएंगे। इससे चीन की इकोनॉमी की हालत और खराब हो जाएगी। चीन अपनी नेवी को ताइवान के पास तैनात करके सिर्फ डरा सकता है, लेकिन जंग का ऐलान नहीं कर सकता।’
हालांकि चीन ने 2004 में संसद में एक अलगाव विरोधी कानून पास किया था। इसके मुताबिक अगर ताइवान किसी भी तरह से चीन से अलग होने की कोशिश करेगा, तो चीन इसे कुचलने के लिए मिलिट्री पावर का इस्तेमाल कर सकता है।
चीन मौजूदा स्थिति में ताइवान को लेकर कोई युद्ध नहीं छेड़ेगा। वे कहते हैं, ‘ताइवान पर कब्जा करना चीन के लिए कुछ ही दिनों का काम है, लेकिन चीन युद्ध जैसे हालात नहीं चाहता है। चीन अपनी सिचुएशन समझता है, वैश्विक स्तर पर उसे अपना मुकाम पता है। कमजोर इकोनॉमी के कारण चीन युद्ध की स्थिति में नहीं है। अगर चीन युद्ध के जरिए ताइवान पर कब्जा करता है तो इससे चीन की इमेज और इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ेगा।’
दरअसल, चीन की इकोनॉमी एक्सपोर्ट बेस्ड है यानी चीन में प्रोडक्ट बनाए जाते हैं और दूसरे देशों में एक्सपोर्ट किए जाते हैं। इसमें अमेरिकी कंपनियों का हिस्सा ज्यादा है। ऐसे में अगर चीन जंग का ऐलान करता है तो चीन में प्रोडक्शन में गिरावट आएगी और इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ेगा।
चीन-ताइवान के विवाद में भारत और अमेरिका का क्या रूख है?
अमेरिका और भारत ताइवान के सपोर्ट में नहीं आएंगे। वे कहते हैं, ‘अमेरिका भले ही ताइवान का सपोर्ट करता आया है। लेकिन अब वहां नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आ रहे हैं, जो अपना रुख बदलते रहते हैं। ऐसे में अमेरिका कितने दिन ताइवान का साथ देगा, कहना थोड़ा मुश्किल है।
वहीं भारत के नजरिए से देखें तो हाल ही में चीन के साथ रिश्ते सुधरे हैं और सीमा विवाद पर समझौते हुए हैं। साथ ही भारत में ताइवान का दूतावास तक नहीं है यानी भारत ने उन्हें रिकॉग्नाइज ही नहीं किया है। ऐसे में भारत चीन का विरोध करते हुए ताइवान को सपोर्ट नहीं करेगा।’
CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, 1979 में अमेरिका ने चीन के साथ एक संधि करते हुए ताइवान को चीन का हिस्सा मान लिया था। अमेरिका ने ‘वन चाईना पॉलिसी’ को मंजूरी दी थी। इसके बावजूद अमेरिका ने ताइवान को हथियार सप्लाई किए और आज भी ताइवान को हथियार पहुंचा रहा है।
1979 में ही अमेरिका ने ताइवान में अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ ताइवान भी स्थापित किया था। यह ताइवान में अमेरिकी दूतावास की तरह काम करता है। हालांकि, अमेरिका ने अब तक ताइवान की मदद करने का खुला समर्थन नहीं किया है। वहीं चीन जानता है कि अमेरिका उसे रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ऐसे में चीन जंग का ऐलान नहीं कर सकता।








