टैक्स में भारी छूट के बाद RBI के रेपो रेट में कटौती के पीछे क्या वजह है?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने रेपो रेट को 6.5% से घटाकर 6.25% कर दिया है. मतलब, ब्याज दर में 0.25% की कमी की गई है. ऐसा 5 साल में पहली बार हुआ है. साल 2020 के बाद पहली बार रेपो रेट घटा है. रेपो रेट वह दर है जिस पर […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 10 फरवरी 2025, 05:41 AM 9 मिनट read
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टैक्स में भारी छूट के बाद RBI के रेपो रेट में कटौती के पीछे क्या वजह है?
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने रेपो रेट को 6.5% से घटाकर 6.25% कर दिया है. मतलब, ब्याज दर में 0.25% की कमी की गई है. ऐसा 5 साल में पहली बार हुआ है. साल 2020 के बाद पहली बार रेपो रेट घटा है.

रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक RBI से लोन लेते हैं. जब RBI रेपो रेट कम करता है, तो बैंकों को सस्ता लोन मिलता है. इसका फायदा यह होता है कि बैंक भी अपने ग्राहकों को होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन कम ब्याज दर पर देते हैं.

अभी तक रेपो रेट 6.5% था. ये खबर ऐसे समय पर आई है जब कुछ दिन पहले ही केंद्र सरकार ने बजट 2025-26 में इनकम टैक्स में भारी छूट का ऐलान किया. अब RBI का ये कदम भी उसी दिशा में है.

इस स्पेशल स्टोरी में आप अच्छे से समझेंगे कि आखिर किन वजहों से आरबीआई ने रेपो रेट घटाने का फैसला किया? साथ ही ये भी जानेंगे कि टैक्स में भारी छूट के बाद आरबीआई के रेपो रेट में कटौती के पीछे क्या वजहे हैं?

पहले जानिए, RBI गवर्नर ने क्या कहा
आरबीआई गवर्नर ने कहा है कि आरबीआई और मॉनेटरी पॉलिसी कमेटीमिलकर देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार काम करते रहेंगे. वो महंगाई को काबू में रखने के लिए जो तरीका है, उसका इस्तेमाल करते रहेंगे और देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए फैसले लेंगे. उन्होंने ये भी बताया कि वो नए डेटा का इस्तेमाल करके जरूरी आर्थिक चीजों का और बेहतर अनुमान लगाकर और ज्यादा सटीक मॉडल बनाकर इस सिस्टम को बेहतर बनाएंगे.  मतलब, वो और भी बेहतर तरीके से ये जानने की कोशिश करेंगे कि आगे क्या होने वाला है ताकि सही समय पर सही कदम उठाया जा सके.

ये पॉलिसी ऐसे वक्त में आ रही है जब दुनियाभर में अनिश्चितता का माहौल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा, मैक्सिको और चीन पर टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की घोषणा की है. हालांकि, कनाडा और मैक्सिको पर लगने वाले टैरिफ को एक महीने के लिए टाल दिया गया है. इन टैरिफ की वजह से ग्लोबल ट्रेड वॉर (वैश्विक व्यापार युद्ध) का डर पैदा हो गया है.

GDP का अनुमान कितना?
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि अगले साल यानी 2025-26 में हमारी जीडीपी लगभग 6.7% बढ़ेगी. सरकार ने भी बजट से पहले जो इकोनॉमिक सर्वे निकाला था, उसमें भी 6.3 से 6.8% के बीच इतना ही अनुमान था. उन्हें उम्मीद है कि हमारा एक्सपोर्ट अच्छा रहेगा, सरकार खर्चे भी सोच-समझकर करेगी और लोग भी चीजें खरीदते रहेंगे. हालांकि, अभी 2024-25 में जीडीपी की रफ्तार थोड़ी धीमी है, सिर्फ 6.4% बढ़ने का अनुमान है. ये पिछले चार साल में सबसे कम है.

महंगाई के बारे में क्या कहा गया है?
भारतीय रिजर्व बैंक ने अगले वित्त वर्ष यानी अप्रैल से शुरू होने वाले साल के लिए खुदरा महंगाई दर 4.2% रहने का अनुमान लगाया है. हालांकि, अभी चल रहे वित्त वर्ष 2024-25 के लिए महंगाई का अनुमान 4.8% पर ही रखा गया है.

गवर्नर ने कहा कि अगर अगले साल मानसून सामान्य रहता है, तो 2025-26 में महंगाई दर 4.2% रहेगी. उन्होंने ये भी बताया कि पहली तिमाही में ये 4.5%, दूसरी तिमाही में 4%, तीसरी तिमाही में 3.8% और चौथी तिमाही में 4.2% रहने का अनुमान है. उन्होंने ये भी कहा कि महंगाई को लेकर जोखिम बराबर बने हुए हैं, मतलब ये बढ़ भी सकती है और घट भी सकती है.

दिसंबर में खुदरा महंगाई दर घटकर 5.22% पर आ गई है, जो कि चार महीनों में सबसे कम है. ये गिरावट मुख्य रूप से खाने-पीने की चीजों, खासकर सब्जियों के दाम कम होने की वजह से हुई है. नवंबर में महंगाई दर 5.48% थी. महंगाई कम होने से आरबीआई को रेपो रेट घटाने का मौका मिल गया.

टैक्स में छूट और रेपो रेट कटौती के बीच क्या संबंध है?
सरकार ने बजट 2025-26 में इनकम टैक्स में कटौती करके और TDS की लिमिट बदलकर लोगों के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे छोड़ दिए हैं. यानी, सरकार जब टैक्स में भारी छूट देती है तो लोगों और कंपनियों के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा आ जाता है. इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. लेकिन अगर लोन महंगे रहेंगे, तो लोग और बिजनेस ज्यादा खर्च करने से बचेंगे. इसलिए RBI ब्याज दरें घटाता है ताकि लोन सस्ते हों और खर्च करने की आदत बनी रहे.

वहीं, आरबीआई ने बैंकों में पैसों की कमी को दूर करने के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपये डाले हैं. इससे बैंकों को लोन देने में आसानी होगी. जब बैंकों के पास ज्यादा पैसे होंगे, तो वो ज्यादा लोगों को लोन दे पाएंगे. रेपो रेट में कटौती ने इस कदम को और असरदार बना दिया है. मतलब, अब बैंकों के पास पैसे भी ज्यादा हैं और ब्याज दरें भी कम हैं, इससे विकास को जोरदार बढ़ावा मिलेगा.

कुल मिलाकर, सरकार का बजट, घटती हुई महंगाई और आरबीआई के कदमों ने मिलकर अर्थव्यवस्था को बूस्ट देने की एक अच्छी तिकड़ी बनाई है. इन सभी कदमों का मकसद है देश की आर्थिक रफ्तार को तेज करना और लोगों की जेब में ज्यादा पैसे पहुंचाना.

अमेरिका के टैरिफ वॉर से दुनिया में खतरा, भारत में रेपो रेट कटौती से मिलेगी राहत?
अमेरिका ने हाल ही में कनाडा, मेक्सिको और चीन पर नए टैक्स लगा दिए हैं, जिससे दुनिया भर में ट्रेड वॉर यानी व्यापार युद्ध का डर बढ़ गया है. इसका असर ये हुआ है कि भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया है और एक डॉलर की कीमत 87.29 रुपये तक पहुंच गई है.  इतना ही नहीं, महंगाई बढ़ने का खतरा भी मंडरा रहा है.

ऐसे में आरबीआई ने जो रेपो रेट में कटौती की है, वो एक अच्छा कदम माना जा रहा है. रेपो रेट में कमी से बाहरी झटकों से भारतीय अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक बचाया जा सकता है. दरअसल, जब रेपो रेट कम होता है तो बैंकों को कम ब्याज दर पर लोन मिलता है, जिससे वो आगे ग्राहकों को भी कम ब्याज दर पर लोन दे पाते हैं. इससे बाजार में पैसे का फ्लो बढ़ता है. आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं और विकास को बढ़ावा मिलता है.

हालांकि, ये कहना मुश्किल है कि रेपो रेट में कटौती अकेले ही इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए काफी होगी. अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक हालात क्या मोड़ लेते हैं और आरबीआई आगे क्या कदम उठाता है.

रेपो रेट घटने के क्या मायने हैं?
जब बैंकों को आरबीआई से कम ब्याज दर पर लोन मिलता है, तो वो भी आगे बिजनेस करने वालों को कम ब्याज पर लोन देते हैं. इससे बिजनेस करने वालों के लिए अपना कारोबार बढ़ाना और नए प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाना आसान हो जाता है. जब बिजनेस बढ़ेगा, तो ज्यादा चीजें बनेंगी और नए लोगों को नौकरी मिलेगी.  मतलब, देश की आर्थिक हालत सुधरेगी.

रेपो रेट घटने से आपके होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन वगैरह की ब्याज दरें भी कम हो सकती हैं. यानी, आपकी ईएमआई कम हो जाएगी और आपको लोन चुकाने में आसानी होगी. जब लोन सस्ता होगा, तो लोग ज्यादा लोन लेंगे और ज्यादा खर्च करेंगे, जिससे बाजार में मांग बढ़ेगी.

जब बैंक अपनी बचत खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दरें कम करते हैं तो लोगों को बचत करने में उतना फायदा नहीं दिखता. ऐसे में लोग अपना पैसा शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड या प्रॉपर्टी में लगाने के बारे में सोच सकते हैं. मतलब, रेपो रेट घटने से इन जगहों पर निवेश बढ़ सकता है.

जब रेपो रेट कम होता है, तो देश में निवेश पर मिलने वाला मुनाफा कम हो सकता है. इससे कुछ निवेशक अपना पैसा देश से बाहर ले जा सकते हैं, जिससे रुपये की कीमत कम हो सकती है. रुपया कमजोर होने से विदेशों से चीजें मंगाना महंगा हो सकता है, लेकिन दूसरी तरफ हमारे देश से चीजें बाहर भेजना सस्ता हो जाएगा. इससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा.

अगर RBI रेपो रेट न घटता तो क्या होता?
अगर रेपो रेट न घटता, तो टैक्स में छूट के बावजूद अर्थव्यवस्था पर उसका उतना असर नहीं पड़ता जितना सरकार चाहती है. इसका सीधा असर कर्ज लेने, खर्च करने, निवेश और आर्थिक विकास पर पड़ता. अगर रेपो रेट ज्यादा ही रहता तो बैंक लोन की ब्याज दरें भी ऊंची रखतीं. टैक्स बचत से पैसा तो होता, लेकिन महंगे लोन की वजह से लोग घर, गाड़ी या बिज़नेस में निवेश करने से बचते. टैक्स छूट से लोगों की बचत तो बढ़ती, लेकिन खर्च न बढ़ने से बाजार में सुस्ती बनी रहती.

किसी भी बिजनेस को बढ़ने के लिए सस्ते लोन की जरूरत होती है. अगर बिजनेस नया निवेश नहीं करेगा तो नई नौकरियां भी नहीं निकलेंगी. कंपनियां ज्यादा कर्मचारियों की भर्ती नहीं करेंगी, ऐसे में बेरोजगारी बढ़ सकती थी. रेपो रेट कम होने से शेयर बाजार में भी तेजी आती है.

आरबीआई हमेशा रेपो रेट को इस तरह से तय करता है कि महंगाई काबू में रहे. अगर सरकार की टैक्स छूट से बहुत ज्यादा पैसा बाजार में आ जाता और रेपो रेट भी ऊंचा रहता, तो कुछ चीजों की कीमतें बढ़ सकती थीं. बाजार में असंतुलन आ सकता था.

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