लालू यादव की रणनीति और नैरेटिव को कमजोर करती जा रही है बीजेपी ……………..

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने कहा कि नीतीश कुमार के पास दैवीय शक्ति आ गई है. प्रगति यात्रा में मुख्यमंत्री जिस तरह से काम कर रहे हैं मतलब कहा जा सकता है कि जो चीज सोचा वह मिल गया. दिलीप जायसवाल ने कहा, कभी सोच भी नहीं सकता था कोई कि […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 24 फरवरी 2025, 05:38 AM 5 मिनट read
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लालू यादव की रणनीति और नैरेटिव को कमजोर करती जा रही है बीजेपी ……………..
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 भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने कहा कि नीतीश कुमार के पास दैवीय शक्ति आ गई है. प्रगति यात्रा में मुख्यमंत्री जिस तरह से काम कर रहे हैं मतलब कहा जा सकता है कि जो चीज सोचा वह मिल गया. दिलीप जायसवाल ने कहा, कभी सोच भी नहीं सकता था कोई कि 40 मेडिकल कॉलेज बिहार में बन जाएगा. यह कोई मामूली बात नहीं है.लगता है नीतीश कुमार जी में कोई दैवीय शक्ति आ गई है.बिहार को विकसित बिहार बनाने के लिए उन्होंने मजबूत इच्छाशक्ति प्रगति यात्रा में दिखाई है.बीजेपी नेता ने कहा, एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष से अलग हटकर एक व्यक्ति के रूप में भी देखकर मैं अचंभित हूं.उन्होंने कहा कि जो अच्छा काम कर सकता है उसके अंदर दैवीय शक्ति होती है.मुझे तो यही एहसास हुआ है. दरअसल, सामने से जब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव यह बार-बार कहते हैं कि सीएम नीतीश अब टायर्ड और रिटायर्ड हैं, तो दिलीप जायसवाल की ये बातें निश्चित तौर पर बीजेपी के सियासी प्लान का बड़ा हिस्सा है. जाहिर है जिन शब्दों से दिलीप जायसवाल ने सीएम नीतीश कुमार को नवाजा है वह अपने आप में बड़े राजनीतिक महत्व का है.एक तो यह कि एनडीए के छतरी तले बीजेपी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही बिहार चुनाव में आगे बढ़ेगी, दूसरा यह कि नीतीश कुमार की छवि इस कदर बड़ा दिखाना चाहते हैं जिससे बिहार में उनके मुकाबिल को दिखे ही नहीं.

बता दें कि बिहार के की राजनीति में मुख्य तौर पर दो गठबंधनों का मुकाबला है. एक ओर एनडीए है तो दूसरी तरफ महागठबंधन. एनडीए में बीजेपी और जेडीयू जहां प्रमुख पार्टियां हैं, वहीं महागठबंधन में राजद और कांग्रेस का नेतृत्व है. एनडीए में जहां सियासी हैसियत के हिसाब बीजेपी और जेडीयू करीब-करीब बराबरी का हक रखती है हक रखती है. वहीं, महागठबंधन में कांग्रेस के राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद क्षेत्रीय दल राजद का वर्चस्व है. अब गठबंधन की शक्ति को देखें तो राजनीतिक जनाधार में कागज पर बराबर दिखते दोनों गठबंधनों में जमीनी स्तर पर बहुत बड़ा अंतर है. इस अंतर के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. सीएम नीतीश एक ऐसी शख्सियत हैं जो वर्तमान में एनडीए की राजनीति के सबसे बड़े ‘फेस’ कहे जा सकते हैं.

नीतीश कुमार नाम भर नहीं, नरेटिव हैं…
दरअसल, नीतीश कुमार सिर्फ नाम नहीं एक नैरेटिव हैं…और इस ‘चेहरे’ को हर हाल में एनडीए की राजनीति का नेतृत्व करने वाली बीजेपी आगे रखना चाहती है. वर्तमान में देश और प्रदेश (बिहार) की राजनीति में बीजेपी नीतीश कुमार के ‘चेहरे’ को हर हाल में बचा कर रखना चाहती है. राजनीति के जानकार इसकी कई वजह बताते हैं. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं, बीजेपी किसी भी तरह से नीतीश कुमार के इमेज को डैमेज नहीं देना चाहती है. यही कारण है कि लगातार नीतीश कुमार का गुणगान पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम दिग्गज नेता करते रहते हैं. यही नहीं नीतीश कुमार को लेकर अब एनडीए के अन्य घटक दल, जो (चिराग पासवान और जीतन राम मांझी सरीखे नेता) कल तक थोड़ा बहुत विरोध का स्वर भी मुखर करते थे, वह भी अब नीतीश कुमार के तारीफों पुल बांधते रहते हैं. ऐसा करने के पीछे बिहार की वो सियासत है जिसमें कहा जाता है कि- जाति है कि जाती नहीं, यानी बिहार की प्योर कास्ट पॉलिटिक्स.

नीतीश के ‘फेस’ में लालू की हर रणनीति की काट 
बिहार की राजनीति को जानने वाले यह खुले तौर पर कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव की हमेशा से इच्छा रहती है कि नीतीश कुमार उनके कुनबे में रहें. उनकी राजनीति का आधार प्योर कास्ट बेस्ड है. यही वो आधार है जो नीतीश कुमार के इधर-उधर होने से हिल जाता है और लालू यादव का कुनबा बीच के कुछ कालखंड (2015-16-17 में करीब 20 महीने और 2022-23 में करीब 17 महीने की राजद-जदयू की महागठबंधन सरकार) को छोड़ दें तो सत्ता से बाहर ही रहा है. अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि लालू यादव की आरजेडी की राजनीति को खतरा बीजेपी से है क्योंकि वह जातीय आधार पर सामाजिक समीकरण तो बनाती है, लेकिन सामाजिक समरसता की बात भी करती है. बीजेपी सर्व समाज (विशेषकर हिंदुओं की एकता की बात) की राजनीति के बूते अपना राजनीतिक आधार मजबूत करती जा रही है, वहीं लालू यादव की हमेशा से कोशिश रही है कि बीजेपी, बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी के तौर पर पहचानी जाए. बस यहीं नीतीश कुमार का फर्क पड़ जाता है.

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