नीतीश कुमार की सरकार ने चुनावी साल और विधानसभा के आखिरी कार्यकाल का बजट सोमवार को पेश किया. बजट से लोगों को सीधे किसी तरह का चुनावी लाभ मिलने का कोई सूत्र नहीं दिख रहा है. नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में वित्त विभाग का जिम्मा संभाल रहे उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बजट में महिलाओं और अनुसूचित जाति के युवाओं के लिए कई तरह की घोषणाएं की हैं. ऐसी घोषणाएं आमतौर पर हर साल होती हैं. चुनावी साल में उम्मीद थी कि वित्त मंत्री के रूप में सम्राट चौधरी कुछ ऐसी घोषणाएं करेंगे, जिनकी उम्मीद लोग कर रहे हैं. मसलन रेवड़ियों की बरसात की. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने बजट से एक दिन पहले ऐसी रेवड़ियों की मांग भी नीतीश सरकार से की थी. इतना ही नहीं, तेजस्वी यादव सरकार से मांगने के पहले इस तरह के चुनावी वादे भी करते रहे हैं. मसलन सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाना, महिलाओं के लिए सम्मान राशि और 200 यूनिट फ्री बिजली की बात.
बजट में चुनावी साल की झलक नहीं
बिहार के लिए सम्राट चौधरी ने 2025-26 का बजट पेश किया. तकरीबन तीन लाख 17 हजार करोड़ के बजट में महिलाओं के लिए उन्होंने कई घोषणाएं कीं. महिलाओं के लिए पिंक शौचालयों का निर्माण, पिंक बसों का संचालन, जिसमें ड्राइवर से कंडक्टर तक महिलाएं ही रहेंगी, अनुसूचित जाति के युवाओं को प्रोत्साहन राशि बढ़ाने, कई जिलों में हवाई अड्डों का निर्माण वगैरह जन सामान्य से जुड़े प्रस्ताव तो आए, लेकिन चुनावी साल में जिस तरह की पहली नजर में आकर्षित करने वाली योजनाओं की घोषणा होनी चाहिए थी, उसका अभाव रहा. लोगों को उम्मीद थी कि नीतीश कुमार की सरकार बजट में कुछ ऐसी घोषणाएं करेगी, जो तेजस्वी यादव के वादे पर भारी पड़ जाएंगे. पर, ऐसा बजट में कुछ भी नहीं दिखता.
तेजस्वी यादव की नीतीश से थी मांग
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने बजट से पहले बाजाप्ता प्रेस कान्फ्रेंस कर मांग की थी कि सामाजिक सुरक्षा की पेंशन राशि 400 से बढ़ाई जानी चाहिए. महिलाओं के स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें सम्मान राशि देने की शुरुआत होनी चाहिए. हर उपभोक्ता को 200 यूनिट फ्री बिजली का लाभ मिलना चाहिए. तेजस्वी ने रणनीतिक ढंग से बजट पूर्व अपनी मांग सरकार से रखी थी. उन्हें अनुमान था कि जिस तरह के वादे उन्होंने किए हैं और चुनाव जीतने के लिए रेवड़ियां बांटने की जो परंपरा शुरू हुई है, उसे देखते हुए नीतीश सरकार भी इस तरह की घोषणाएं जरूर करेगी. अगर सरकार ने ये घोषणाएं कीं तो उन्हें यह कहने का मौका मिल जाएगा कि उनके ही दबाव पर सरकार ने ये फैसले लिए. सरकारी नौकरी के मामले में तेजस्वी ऐसी ही बाजी जीत चुके हैं. तेजस्वी ने 2020 में वादा किया था कि सरकार बनते ही वे 10 लाख सरकारी नौकरियां कैबिनेट की पहली बैठक में ही देंगे. नीतीश कामर ने उसकी खिल्ली उड़ाई थी. पर, बाद में नीतीश ने नौकरियों की बौछार कर दी. तेजस्वी आज भी इसे अपनी उपलब्धि मान कर इतराते हैं. शायद यही वजह रही कि बजट में इस पर चुप्पी दिखती है.
तेजस्वी यादव पर भारी पड़े हैं नीतीश
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और झारखंड विधानसभा के चुनावों में ऐसी रेवड़ियों का कमाल सबने देखा है. राजनीतिक दल इसका लाभ भी लेते रहे हैं. यह प्रयोग हाल के वर्षों में काफी सफल रहा है. इसके बावजूद नीतीश सरकार ने बजट में इस पर चुप्पी साध ली तो यह कोई अनजाने में नहीं हुआ या इसे नीतीश कुमार की चूक मानने की भूल नहीं करनी चाहिए. दरअसल नीतीश कुमार अगर ऐसी घोषणाएं कर देते तो इसे तेजस्वी यादव के दबाव में उठाया गया माना जाता. चुनाव से पहले ही यह तेजस्वी की रणनीतिक जीत मानी जाती. इसीलिए शायद नीतीश सरकार ने मुफ्त की रेवड़ियों पर चुप्पी साध ली. वैसे भी नीतीश कुमार ने अब तक ऐसी रेवड़ियों के सहारे चुनाव जीतने का कभी प्रयास नहीं किया है. यानी तेजस्वी का पहला वार नीतीश कुमार ने बेअसर कर दिया है.
रेवड़ी पाने के लिए अभी निराश न हों
राजनीतिक हलके में माना जा रहा है कि नीतीश कुमार भी रेवड़ियां बांटेंगे, लेकिन बाद में. बजट में इनकी घोषणाएं न कर नीतीश सरकार ने तेजस्वी यादव को चकमा दिया है. पहला यह कि तेजस्वी की मांग और सरकार बनने पर ये सुविधाएं देने के वादे बेअसर हो गए. इस बीच रेवड़ियों की घोषणा न होने का क्या असर होता है, उसका भी अंदाजा लग जाएगा. ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार रेवड़ियों के सहारे चुनाव जीतने की परंपरा से नावाकिफ हैं. उन्हें अच्छी तरह पता है कि एनडीए या भाजपा की सरकारें भी अब रेवड़ियों से परहेज नहीं करतीं. इसलिए इस बात की संभावना अब भी बलवती है कि नीतीश सरकार भी आने वाले दिनों में रेवड़ियां जरूर बांटेंगी. संभव है कि इसके लिए उचित वक्त का उसे इंतजार हो.
मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र का उदाहरण
मध्य प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र की सरकारों ने रेवड़ियां बांटने की चुनावी साल के बजट में कोई घोषणा नहीं की थी. पर, वहां महिलाओं के लिए राज्य सरकारों ने दिल खोल कर बांटे. मध्य प्रदेश में भाजपा की दमदार वापसी के पीछे लाडली बहना योजना थी तो महाराष्ट्र में लाडकी बहन योजना ने कमाल दिखाया. झारखंड में हेमंत सोरेन की मईयां योजना का कमाल भी सबने देखा है. इसलिए यह तय माना जा रहा है कि बिहार में भी रेवड़ियां बंटेंगी ही. इसके लिए इन्हीं राज्यों का पैटर्न अमल में लाया जा सकता है. मसलन चुनाव के पांच-छह महीने पहले सरकार कैबिनेट से ऐसी रेवड़ियों की स्वीकृति लेकर लोगों को बांट सकती है. तब न सिर्फ ऐसी रेवड़ियों की घोषणा हो सकती है, बल्कि उन पर अमल का वक्त भी सरकार को मिल जाएगा.








