लोगों को परजीवी मत बनाइए… सुप्रीम कोर्ट की इस बात को शायद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सलीके से समझा है और बिहार बजट को मुफ्त की रेवड़ी वाली राजनीति से परहेज रखा है. दूसरी तरफ तेजस्वी यादव की राजनीति फ्री बीज के वादों के साथ आगे बढ़ रही है.ऐसे में नीतीश कुमार ने अपने संकल्प से सियासत में नई लकीर खींचने की कवायद की है. हालांकि अभी बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा में देरी है और इस दौरान उनकी ओर से कई लोक लुभावन घोषणाएं की जा सकती हैं, लेकिन बजट में ऐसा कुछ नहीं दिखा जो मुफ्त की रेवड़ी वाली राजनीति का इशारा करती हो. वह महिला सशक्तिकरण के लिए काम करते रहेंगे, ऐसा जरूर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले भी फ्री बीज की राजनीति से परहेज करते रहे हैं. एक बार फिर उन्होंने सियासत की अपनी लीक पर ही विश्वास किया है.
दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीते 19 वर्षों में जबसे वह बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं, अपनी सियासत के जरिए ऐसी ‘फ्री बीज’ की राजनीति से किनारा कर रखा है जो ‘मुफ्तखोरी’ को बढ़ावा दे.सीएम नीतीश ऐसी सियासत के कितन खिलाफ हैं यह बात तब भी सामने आयी थी जब वह इंडिया अलायंस का हिस्सा थे, लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की फ्री बीज की राजनीति का विरोध किया था. तब केजरीवाल लगातार बिजली मुफ्त देने की घोषणा कर रहे थे और इसको दिल्ली चुनाव में भी उन्होंने मुद्दा बनाया था और जीत हासिल की थी. पंजाब और गुजरात विधानसभा चुनाव में उन्होंने (अरविंद केजरीवाल) 300 यूनिट प्रति महीने मुक्त बिजली देने का वादा किया. वह इसे पूरे देश स्तर पर लागू करने की मांग करते रहे हैं. वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तब इसे बेमतलब का कहा था.बात 2022 की है.
ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार बिहार में उपभोक्ताओं को राहत नहीं देती, तरीका दूसरा है. यह सब्सिडी के जरिए उपभोक्ताओं को दिया जाता है लेकिन सीधे तौर पर मुफ्त बिजली नहीं दी जाती. बता दें कि इसी दौर में अरविंद केजरीवाल ने पूरे देश में फ्री बिजली पानी के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा मुफ्त करने की वकालत की थी.इससे इतर नीतीश कुमार ने बिजली के लिए वन नेशन वन टैरिफ की मांग की थी. नीतीश कुमार का पक्ष यह था कि बिहार पर बिजली पर हर राज्य में अलग-अलग टैरिफ रखना मुनासिब नहीं है, राज्यों को वित्तीय क्षति होती है.जाहिर तौर पर नीतीश कुमार ने सीधा संकेत यहां दिया था कि वह फ्री बीज की राजनीति नहीं करते, लेकिन लोक कल्याण की बातों से उनको परहेज नहीं.
आज दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, तेलंगना, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में मुफ्त की योजनाओं के आसरे सरकार बनी है. ऐसे में नीतीश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट की उस बात में हां में हां मिलाया है. दरअसल,विभिन्न मुफ्त की रेवड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिकाओं पर सर्वोच्च अदालत ने टिप्पणी की थी और कहा था कि- लोगों को परजीवी मत बनाइए. बीते 12 फरवरी को जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि, दुर्भाग्य की बात है कि मुफ्त में मिलने वाली चीजों के कारण…. लोग काम करने से बचने लगे हैं. उन्हें मुफ्त में राशन मिल रहा है. उन्हें बिना कुछ काम किए ही पैसे मिल रहे हैं.
राष्ट्र के विकास में योगदान देकर उन्हें मुख्यधारा के समाज का हिस्सा बनाने के बजाय क्या हम परजीवियों का एक वर्ग नहीं बना रहे हैं? दुर्भाग्य से, इन मुफ्त सुविधाओं की वजह से, जो चुनावों के ठीक पहले घोषित की जाती हैं… कोई लाडली बहना, कोई दूसरी योजना. इस वजह से लोग काम करने को तैयार नहीं हैं.
उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है.उन्हें बिना काम किए ही कुछ राशि मिल रही है. क्या उन्हें मुख्यधारा के समाज का हिस्सा बनाना बेहतर नहीं होगा. उन्हें राष्ट्र के विकास में योगदान करने की अनुमति दी जानी चाहिए.
पीठ ने कही ये बात
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, हम लोगों के प्रति आपकी सद्भावना को समझते हैं लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होगा कि उन्हें सोसाइटी की मेन स्ट्रीम का हिस्सा बनाया जाए और देश के विकास में हिस्सा लेने का मौका दिया जाए. न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने बेघर व्यक्तियों के लिए आश्रय के अधिकार से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए ये बात कही.
तेजस्वी की रणनीति का नीतीश पर दबाव!
जाहिर है सुप्रीम कोर्ट भी इस फ्री बीज कल्चर के दुष्प्रभाव को भांप रहा है और आने वाले समय में देश की अर्थवयवस्था और कार्यशील जनसंख्या की क्षति को लेकर कोर्ट चिंतित है. बिहार में भी तेजस्वी यादव ने महिलाओं के लिए माई-बहिन मान योजना के तहत माताओं बहनों को 2500 रुपये प्रति माह देने, वृद्धजन और विकलांग जन पेंशन को प्रति माह 1500 रुपये किये जाने, रियायती दरों में गैस सिलेंडर, स्मार्ट मीटर का दुष्चक्र बंद करने और प्रति माह 200 यूनिट बिजली निःशुल्क देने जैसे वादे किये हैं. जाहिर है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी इसका दबाव है. लेकिन नीतीश कुमार की अपनी सियासत है और अपनी लीक (रास्ता) भी.
सशक्तिकरण में विश्वास, मुफ्त रेवड़ी से परहेज
दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विभिन्न वर्गों के सशक्तिकरण में अधिक विश्वास करते हैं. इसका उदाहरण उन्होंने समय-समय पर दिया भी है. बिहार के पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण देकर उन्होंने क्रांतिकारी कदम उठाया जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ. इसी प्रकार वर्ष 2016 में उन्होंने शराबबंदी जैसा बड़ा फैसला लिया जो कि राजस्व का नुकसान होते हुए भी प्रदेश में एक नई खामोश क्रांति की शुरुआत हुई, जिसने महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाया. वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पहले ही कार्यकाल में बालिकाओं के विकास के लिए मुफ्त साइकिल और पोशाक योजनाओं की शुरुआत की. इसके बाद इसका दायरा बढ़ा और गरीब तबके के बच्चों के लिए भी मुफ्त साइकिल की व्यवस्था की गई और पोशाक भी दिए गए.वहीं, बाद के दौरा में इन्होंने महादलित श्रेणी बनाकर अत्यंत गरीब लोगों को भी राहत पहुंचाने के लिए कई योजनाएं लाई.
नीतीश की सियासत की अपनी राह
बिहार में भी विधानसभा चुनाव होने हैं और उन पर लगातार दबाव है कि वह भी मुफ्त की योजनाओं की घोषणा करें. विधानसभा चुनाव से पहले ही नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने तमाम ऐसे वादे किए हैं जो बिहार में फ्री बीज पॉलिटिक्स के बढ़ने के संकेत हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं और सामने विपक्ष की ओर से लगातार फ्री बीज जैसी घोषणाएं की जा रही हैं, ऐसे में उनके सामने चुनौती है. लेकिन, नीतीश सरकार ने बिहार बजट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया जो राज्य पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ हो.3 लाख 17000 करोड़ के बजट के बावजूद फ्री बीज की कोई भी योजना नहीं है. हालांकि, महिलाओं के सशक्तिकरण किसानों के कल्याण गरीब वर्गों को राहत जैसे कई योजनाओं को इंट्रोड्यूस किया गया, लेकिन मुफ्त वाली कोई भी योजना नहीं है.
तेजस्वी की अपनी राह और नीतीश का अपना अंदाज
आप कह सकते हैं कि नीतीश कुमार की सरकार ने इस बजट में कोई लोक लुभावन घोषणा नहीं की गई है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने वोटरों को बचाए रखने के लिए उसको साधने की पूरी कोशिश की है. मुफ्त राशि देने की कोई घोषणा नहीं की गई जैसा कि तेजस्वी यादव वादा कर रहे हैं. लेकिन, सरकार ने महिलाओं पर विशेष फोकस किया है और इसे नीतीश कुमार का कोर वोटर कहा जाता है.पटना में महिलाओं के लिए जिम ऑन व्हील्स, कामकाजी महिलाओं के छात्रावास की स्थापना. कन्या मंडप में गरीब लड़कियों की शादी का योजना, महिलाओं के लिए शहरी क्षेत्र में पिंक शौचालय का निर्माण कराने की योजना, महिला सिपाहियों को पदस्थापन थाने के आसपास आवासन सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार के जरिए किराए पर आवास लेकर आवासीय सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी. ये सभी महिला सशक्तिकरण के लिए कारगर साबित होगी और महिला मतदाताओं को ध्यान में रखकर फैसले लिए गए हैं.
फ्री बीज या फिर अपनी लीक पर साधेंगे सियासत?
महिला के साथ-साथ यूथ वोटर को भी साधने की पूरी कोशिश की गई है. हर प्रखंड में एक आउटडोर स्टेडियम, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के लिए एक हजार करोड़ खर्च करने की घोषणा. छात्रवृत्ति योजना के तहत छात्रवृत्ति दर को दोगुना किया जाएगा. मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति छात्रावास अनुदान योजना अंतर्गत छात्रावास अनुदान की वर्तमान दर 1,000 रुपये प्रतिमाह को दोगुना कर 2,000 रुपये प्रतिमाह किया जाएगा.किसानों के लिए भी इस बजट में विशेष सुविधा दी गई है. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर मूंग, अरहर व उड़द दाल खरीदे जाएंगे. सुधा के तर्ज पर तरकारी (सब्जी) आउटलेट खुलेंगे. इससे निश्चित है किसानों को फायदा होगा. अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में क्या नीतीश कुमार की राजनीति भी फ्री बीज की ओर बढ़ती है, अथवा वह अपनी लीक पर ही चलते रहते हैं








