क्या सच में बिहार में कांग्रेस A टीम बनने की तैयारी कर रही?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर कुटुंबा विधायक राजेश कुमार को बागडोर सौंप दी है। इसके बाद कई कयास लगाए जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच नवभारत टाइम्स संवाददाता ने इस कदम की वजह जानने के लिए बिहार के सियासी गलियारे से अपने एक विश्ववस्त सूत्र से […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 19 मार्च 2025, 04:59 AM 4 मिनट read
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क्या सच में बिहार में कांग्रेस A टीम बनने की तैयारी कर रही?
Photo: UB India News Archive

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर कुटुंबा विधायक राजेश कुमार को बागडोर सौंप दी है। इसके बाद कई कयास लगाए जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच नवभारत टाइम्स संवाददाता ने इस कदम की वजह जानने के लिए बिहार के सियासी गलियारे से अपने एक विश्ववस्त सूत्र से बातचीत की। इस बातचीत के दौरान जो कुछ पता चला वो चौंकाने वाला है। लेकिन पहले समझिए कि अखिलेश प्रसाद सिंह जैसे कद्दावर नेता को क्यों हटाया गया?

अखिलेश प्रसाद सिंह क्यों हटाए गए अध्यक्ष पद से?
अखिलेश प्रसाद सिंह की लालू प्रसाद यादव से नजदीकी छिपी हुई नहीं है। इसकी वजह जानने के लिए आपको थोड़ा ही नहीं बल्कि बहुत पीछे जाना होगा। बात 2004 की है जब अखिलेश प्रसाद सिंह मोतिहारी से लोकसभा का चुनाव जीते थे। लेकिन कांग्रेस नहीं बल्कि राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर। लालू प्रसाद यादव वो नेता थे, जिन्होंने अखिलेश प्रसाद सिंह को दिल्ली भेजा था। तब अखिलेश प्रसाद सिंह को केंद्र में कृषि, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण का राज्य मंत्री पद भी मिला था। ये पद उन्हें राजद के कोटे से मिला था, जो कि जाहिर है।

अखिलेश प्रसाद सिंह कब आए कांग्रेस में?
अखिलेश प्रसाद सिंह का इसके बाद लालू प्रसाद यादव से मनमुटाव हो गया और उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। इसके बाद वो 2009 में पूर्वी चंपारण से लोकसभा का चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। बावजूद इसके वो कांग्रेस में टिके रहे। फिर कांग्रेस के टिकट पर उन्हें 2014 में मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला, लेकिन उस चुनाव में भी उन्हें हार मिली।

2015 में लड़ा विधानसभा चुनाव
इसके बाद 2015 में उन्होंने तरारी विधानसभा से भी कांग्रेस के टिकट पर भाग्य आजमाया लेकिन वहां भी उनकी शिकस्त हुई। कांग्रेस ने उनका ट्रैक रिकॉर्ड देखते हुए उन्हें 2018 में राज्यसभा भेजा। इसके बाद 2024 में भी वो दोबारा कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा भेजे गए। इसके पहले 2022 में उन्हें बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष भी बना दिया गया। हालांकि 2019 में कांग्रेस और राजद के बीच सीट बंटवारे को लेकर काफी किचकिच हुई। सियासी गलियारे में कहा जाता है कि वो अखिलेश प्रसाद सिंह ही थे जिन्होंने कांग्रेस और राजद में सीटों पर समझौता करवाने में अहम भूमिका निभाई।

क्या अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाने से नाराज होंगे सवर्ण?
इस बात की गुंजाइश कम ही है कि अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर कांग्रेस को सवर्णों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। कांग्रेस ने शायद इसकी तैयारी पहले ही कर ली थी। इसलिए उनके सजातीय कन्हैया कुमार (भूमिहार जाति से आते हैं) को पदयात्रा के बहाने बड़ा चेहरा बनाकर खड़ा कर दिया गया। इसके बाद कांग्रेस ने राजेश कुमार को बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर दलितों को भी साधने वाला दांव चल दिया।

लेकिन कांग्रेस के कई नेताओं में थी कसमसाहट
खैर, पुराने सारे घटनाक्रम के दौरान बिहार कांग्रेस के कई नेताओं में कसमसाहट थी। हमारे सूत्र ने हमें बताया कि कई नेता अर्से से इस बात का इंतजार कर रहे थे कि वो गठबंधन की जकड़न से आजाद हों और कांग्रेस को 90 के दशक से पहले की तरह बिहार की सत्ता में अपने दम पर ले आएं। कहा जाता है कि ऐसे नेताओं के सामने अखिलेश सिंह एक दीवार की तरह थे। माना जाता है कि अखिलेश सिंह ने राजद जरूर छोड़ दिया था लेकिन उसके बाद भी उनकी लालू प्रसाद यादव से अच्छी बनती थी।

क्या अब हो गया ऐलान ए जंग!
इस बात का जवाब बिहार कांग्रेस के नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरु इशारों में दे चुके हैं। हाल ही में उन्होंने पटना एयरपोर्ट पर दो टूक कह दिया था कि कांग्रेस अब जनता (बिहार की) की A टीम बन कर काम करेगी। ये कांग्रेस का बिहार को लेकर इरादा बताने के लिए काफी था। हमारे सूत्र ने ये भी बताया कि ये उसी वक्त तय हो गया था कि बिहार में कांग्रेस विधानसभा चुनाव 2025 से पहले बड़ा फैसला ले लेगी।

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