बिहार की राजनीति में पांडे और लांडे नहीं चलेंगे… प्रशांत किशोर की ‘बदलाव रैली’ में कम भीड़ ने को लेकर यह प्रतिक्रिया सांसद पप्पू यादव की है. उन्होंने प्रशांत किशोर को बहरुपिया बताया और कहा कि काले धन की बदौलत भाजपा की ‘बी’ टीम बनकर वह काम कर रहे हैं, जिसे बिहार की जनता ने भी देख लिया है और समझ लिया है. पप्पू यादव का यह बयान उस संदर्भ में खास है, क्योंकि प्रशांत किशोर पर भाजपा की ‘बी’ टीम होने के आरोप लगते रहे हैं. खास बात यह कि भाजपा भी यही आरोप प्रशांत किशोर पर लगाती और उसे इंडि ब्लॉक यानी महागठबंधन खेमे की ‘बी’ टीम बताती रही है. लेकिन, प्रशांत किशोर उर्फ पीके पर लग रहे आरोपों के बीच सवाल यह है कि कि क्या वह सच में किसी की बी टीम बनकर राजनीति कर रहे हैं या फिर उनके स्वयं के राजनीतिक लक्ष्य हैं?
ऐसे सियासी सवालों के बीच प्रशांत किशोर इसलिए घिर गए हैं क्योंकि ‘बदलाव रैली’ वाला प्रयास विफल हो गया है. लेकिन, उन्होंने इससे सीख लेते हुए तत्काल ही अपना इरादा फिर जाहिर किया है और प्रशांत किशोर ने साफ तौर पर घोषणा कर दी है कि वह 10 दिन के बाद बिहार दौरे पर फिर निकलेंगे और प्रखंड से लेकर पंचायत स्तर तक भ्रमण करेंगे. इस दौरान वह जनता से मिलेंगे और वर्तमान सरकार की नाकामी और इससे पूर्व की सरकार की विफलता को बताते हुए अपनी राजनीति को नई धार देंगे. राजनीति के जानकार उनके इस तेवर को उनकी न झुकने, और लड़ते रहने, यानी लड़ाका होने की छवि से जोड़ कर देख रहे हैं.
बिहार की राजनीति में कहां खड़े पीके?
दरअसल, 2 अक्टूबर 2022 को जब प्रशांत किशोर ने अपनी जन सुराज पदयात्रा निकाली थी और बिहार के गांव-गांव जाने का संकल्प लिया था तो बदलाव की राजनीति की एक उम्मीद बिहारवासियों में जगी थी. वह आगे बढ़े तो उनकी ताकत बढ़ती गई और राजनीतिक धार तेज होती गई. लोगों का समर्थन भी बढ़ता गया और जनता के मन में उनके प्रति जो संशय (एक प्रोफेशनल होने न कि राजनीतिज्ञ) के बादल थे, वह अभी छंटते गए. बाद में सारण में जब एमएलसी चुनाव में उन्होंने अपने समर्थित एक मुस्लिम उम्मीदवार को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई तो उनकी राजनीति को लोगों ने नए नजरिये से देखना शुरू किया. लोगों का भरोसा बढ़ता देख बदलाव की राजनीति ओर उनके कदम और आगे बढ़े.
बिहार में बदलाव की बात और पीके की सियासत
बाद के दौर में प्रशांत किशोर की सभाओं में लोगों का समर्थन भी मिलने लगा. इसका असर और तब दिखा जब बिहार के पूर्णिया में रुपौली विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. रूपौली उपचुनाव में उनके संगठन ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई निर्दलीय शंकर सिंह की जीत सुनिश्चित कर दी. प्रशांत किशोर की अपरोक्ष राजनीतिक सफलता और उनके बढ़ते कदम से सियासी दलों और गठबंधनों के कान खड़े हो गए. इसके बाद तो अलग-अलग दलों ने पीके को टारगेट पर भी लेना शुरू कर दिया और भाजपा और राजद की ‘बी’ टीम होने के आरोप दोनो पक्षों की ओर से लगाए जाने लगे. वहीं, प्रशांत किशोर लगातार राजनीतिक परिवर्तन की बात करते हुए वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बदलने के साथ ही लालू प्रसाद यादव के जंगल राज की वापसी नहीं होने देने का दम भरते रहे.
पीके की राजनीति के आधार में जाति जमात!
इसके बाद बारी उपचुनाव की आई तो चार में राजद को तीन सीटें भी पीके के सियासी समीकरण के कारण हाथ से निकल गई. रामगढ़, तरारी, बेलागंज और इमागंज की ये सीटें प्रशांत किशोर के खाते में नहीं गईं, बल्कि इसका एनडीए को फायदा हुआ और चारों सीटों पर कब्जा हो गया. इसके बाद तो उनपर एनडीए की ‘बी’ टीम होने का ठप्पा लग गया. यह आरोप उनपर इसलिए लग रहा है, क्योंकि प्रशांत किशोर अगड़ी जाति (ब्राह्मण) से आते हैं, इसलिए वह कई पिछड़ी जाति की राजनीति करने वाले नेताओं के टारगेट पर भी रहते हैं. लेकिन, आश्चर्य तब होगा जब उनके समर्थकों के बारे में जानेंगे.पिछड़े और अति पिछड़े समाज के युवाओं का समर्थन मिलता हुआ उनको दिख रहा है. उन्होंने अपना प्रदेश अध्यक्ष भी एक दलित को बनाया है. उनके उम्मीदवारों पर भी गौर करेंगे तो कुछ ऐसे ही तथ्य समाने आएंगे.
नीतीश का द इंड और पीके का फेस!
बहरहाल, मूल सवाल है कि क्या प्रशांत किशोर किसी की बी टीम बनकर राजनीति कर रहे हैं? दरअसल, राजनीति के जानकार प्रशांत किशोर पर लग रहे आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें एक लड़ाका मानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं, एक रैली अगर असफल हो भी गई तो क्या बदलाव की उम्मीद ही छोड़ दी जाए. बिहार की जनता नीतीश कुमार के कमजोर पड़ जाने की बात को भलि भांति समझ रही है. बिहार की जनता बदलाव की ओर देख रही है, लेकिन मुश्किल यह है कि नीतीश कुमार के मुकाबिल बिहार में कोई चेहरा भी नहीं दिख रहा है. तेजस्वी यादव के पास एक फिक्स जनाधार है, लेकिन पुराने दौर में लालू-राबड़ी शासन का को देख चुके लोग खुले तौर पर उनपर संपूर्ण भरोसा करने की हिम्मत अभी नहीं जुटा पा रहे हैं. वहीं, पप्पू यादव और कन्हैया कुमार सरीखे नेताओं की राजनीतिक साख नहीं है. चिराग पासवान अभी बिहार की राजनीति को लेकर बहुत एक्टिव नहीं दिख रहे हैं, फिलहाल उनका फोकस केंद्र की राजनीति में है. वहीं, पूर्व आईपीएस शिवदीप लांडे ने भी राजनीति में कदम रख दिया है, लेकिन अभी उनकी सियासी जमीन के बारे में लोगों ने जाना नहीं है. ऐसे प्रशांत किशोर अब भी बिहार की सियासी रेस में बड़े फेस बने हुए हैं.
प्रशांत किशोर का लक्ष्य क्या?
रवि उपाध्याय कहते हैं कि दरअसल, प्रशांत किशोर जब ने जब अपना प्रोफेशन छोड़ा तो वह अपनी सफलता के चरम पर थे. जाहिर तौर पर वह राजनीति में धनोपार्जन के लिए तो नहीं आए हैं, निश्चित तौर पर वह लंबी लड़ाई का मन बनाकर बिहार की राजनीति में आए हैं. उनके सामने में अभी खुला मैदान है, क्योंकि रैली में कम भीड़ आने की वजह उनके समर्थकों की सही तस्वीर नहीं दिखा रही है. इसके पीछे कई फैक्टर हैं क्योंकि मौसम की खराबी के बीच गेंहूं कटनी का समय है और नई फसलों की तैयारी की जा रही है. ऐसे में लोगों की कम उपस्थिति रही.अब एक बार फिर प्रशांत किशोर बिहार के दौरे पर निकलने वाले हैं. किसी की बी टीम बनाकर उनकी राजनीति की लड़ाई नहीं बल्कि उनका सियासी सफर लंबा होने वाला है. संभव है कि 2025 में वह बहुत प्रभाव न छोड़ पाएं, लेकिन उनके टारगेट पर 2029 का लोकसभा चुनाव और 2030 का विधानसभा चुनाव भी रहेगा. वह इतनी जल्दी पीछे नहीं मुड़ने वाले नहीं हैं भले उन पर किसी की ‘बी’ टीम के आरोप लगते रहें.








