क्या है ऑफिसियल सीक्रेट ऐक्ट 1923 जो आज फिर से चर्चा है……………….

भारत में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 (Official Secrets Act, OSA) एक बहुत महत्वपूर्ण कानून है. यह कानून देश की सुरक्षा और गोपनीय जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है. हाल ही में ज्योति मल्होत्रा और मोती राम जाट जैसे जासूसी मामलों ने इस कानून को फिर से चर्चा में ला दिया है. ज्योति मल्होत्रा, एक यूट्यूबर, और मोती राम […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 29 मई 2025, 06:49 AM 9 मिनट read
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क्या है ऑफिसियल सीक्रेट ऐक्ट 1923 जो आज फिर से चर्चा है……………….
Photo: UB India News Archive

भारत में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 (Official Secrets Act, OSA) एक बहुत महत्वपूर्ण कानून है. यह कानून देश की सुरक्षा और गोपनीय जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है. हाल ही में ज्योति मल्होत्रा और मोती राम जाट जैसे जासूसी मामलों ने इस कानून को फिर से चर्चा में ला दिया है. ज्योति मल्होत्रा, एक यूट्यूबर, और मोती राम जाट, एक सीआरपीएफ जवान, पर पाकिस्तान को गोपनीय जानकारी देने का आरोप है. इन मामलों ने दिखाया कि यह कानून आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कितना जरूरी है. लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इस कानून का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है, क्योंकि यह बहुत व्यापक और अस्पष्ट है. हम इस कानून की शुरुआत, इसका इतिहास, इसके नियम, और इसकी खामियों को समझेंगे.

2. आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?

आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) एक ऐसा कानून है जो भारत में गोपनीय जानकारी को सुरक्षित रखने और जासूसी को रोकने के लिए बनाया गया है. इसका मुख्य मकसद है देश की सुरक्षा को बनाए रखना. इस कानून का इस्तेमाल तब होता है जब कोई व्यक्ति सरकार की गोपनीय जानकारी को गलत तरीके से लीक करता है या दुश्मन देश को देता है.

इस कानून की शुरुआत अंग्रेजों के समय में हुई थी. सबसे पहले 1889 में भारतीय आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम बनाया गया. उस समय अंग्रेजों ने यह कानून इसलिए बनाया था ताकि भारतीय अखबारों को दबाया जा सके. ये अखबार अंग्रेजी सरकार की नीतियों के खिलाफ लिखते थे और लोगों में आज़ादी की भावना जगाते थे. 1904 में इस कानून को और सख्त किया गया. फिर 1923 में इसे पूरी तरह से बदलकर नया आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम बनाया गया, जो आज भी लागू है.

3. आज़ादी के बाद भारत ने इस कानून को क्यों रखा?

जब भारत 1947 में आज़ाद हुआ, तो सरकार ने इस कानून को खत्म करने के बजाय इसे बनाए रखने का फैसला किया. इसका कारण था कि देश को एक मजबूत कानून की जरूरत थी जो सरकार की गोपनीय जानकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुरक्षित रख सके. आज़ादी के बाद भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था, जैसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे।. इसलिए सरकार ने सोचा कि यह कानून देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है.

4. आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के दो मुख्य हिस्से

1923 का यह कानून दो मुख्य चीजों पर ध्यान देता है:

  1. जासूसी (धारा 3): इसमें उन लोगों को सजा देने का नियम है जो जासूसी करते हैं. जैसे, अगर कोई व्यक्ति निषिद्ध जगहों पर जाता है, वहां से जानकारी इकट्ठा करता है, या ऐसी जानकारी दुश्मन को देता है जो भारत की सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है, तो उसे सजा हो सकती है.
  2. गोपनीय जानकारी का गलत इस्तेमाल (धारा 5): इसमें उन लोगों को सजा देने का नियम है जो सरकार की गोपनीय जानकारी को गलत तरीके से लीक करते हैं, रखते हैं, या गलत लोगों को देते हैं.

5. धारा 5 में किस तरह की जानकारी शामिल है?

धारा 5 बहुत सारी सरकारी जानकारी को कवर करती है। इसमें शामिल है:

  • कोई भी गोपनीय कोड या पासवर्ड
  • कोई स्केच, नक्शा, मॉडल, लेख, नोट या दस्तावेज
  • कोई भी ऐसी जानकारी जो सरकार ने गोपनीय मानी हो

अगर कोई व्यक्ति ऐसी जानकारी को गलत तरीके से किसी और को देता है, उसे रखता है, या उसका गलत इस्तेमाल करता है, तो उसे इस धारा के तहत सजा हो सकती है. इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति ऐसी जानकारी को जानबूझकर लेता है, जबकि उसे पता है कि यह गलत तरीके से दी जा रही है, तो वह भी सजा का हकदार होगा.

6. धारा 5 को इतना व्यापक और अस्पष्ट क्यों माना जाता है?

धारा 5 को बहुत व्यापक और अस्पष्ट माना जाता है क्योंकि यह बहुत सारी सरकारी जानकारी को कवर करती है, लेकिन यह साफ नहीं बताती कि “गोपनीय दस्तावेज” क्या है. इसका मतलब है कि इस धारा के तहत लगभग किसी भी सरकारी जानकारी को गोपनीय माना जा सकता है. इसकी वजह से सरकार को बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाता है कि वह किसी को भी इस कानून के तहत सजा दे सकती है.

7. OSA में “गोपनीय दस्तावेज” की परिभाषा क्या है?

आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम में “गोपनीय दस्तावेज” की कोई साफ परिभाषा नहीं दी गई है. इसका मतलब है कि कानून यह नहीं बताता कि कौन सी जानकारी गोपनीय है और कौन सी नहीं.

8. “गोपनीय दस्तावेज” का फैसला कैसे होता है?

“गोपनीय दस्तावेज” का फैसला सरकार के विभाग खुद करते हैं. वे एक आंतरिक नियम पुस्तिका का पालन करते हैं, जिसे मैनुअल ऑफ डिपार्टमेंटल सिक्योरिटी इंस्ट्रक्शंस 1994 कहा जाता है. यह पुस्तिका OSA का हिस्सा नहीं है, बल्कि सरकार के विभागों के लिए बनाई गई है. इस पुस्तिका के आधार पर विभाग तय करते हैं कि कौन सी जानकारी गोपनीय है और कौन सी नहीं.

9. “गोपनीय दस्तावेज” की परिभाषा न होने का क्या असर पड़ता है?

“गोपनीय दस्तावेज” की साफ परिभाषा न होने की वजह से सरकार को बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाता है. सरकार अपने हिसाब से तय कर सकती है कि कौन सी जानकारी गोपनीय है और किसे इस कानून के तहत सजा दी जाए. इससे कई बार गलत इस्तेमाल की आशंका बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए, अगर कोई पत्रकार या सामान्य व्यक्ति ऐसी जानकारी साझा करता है जो सरकार को पसंद नहीं, तो उसे गोपनीय बताकर सजा दी जा सकती है. इससे लोगों की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर असर पड़ सकता है.

10. हाल के मामले और OSA का उपयोग

10.1. ज्योति मल्होत्रा केस

हाल ही में हरियाणा की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा, जिन्हें ज्योति रानी के नाम से भी जाना जाता है, को 16 मई 2025 को हिसार पुलिस ने जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया. उनके यूट्यूब चैनल ‘Travel with JO’ के 3.77 लाख सब्सक्राइबर्स हैं. पुलिस के अनुसार, ज्योति 2023 से एहसान-उर-रहीम (उर्फ दानिश) नाम के एक पाकिस्तानी हाई कमीशन अधिकारी के संपर्क में थीं, जिसे 13 मई 2025 को भारत ने जासूसी के आरोप में निष्कासित कर दिया था.

ज्योति पर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तानी खुफिया एजेंटों को संवेदनशील जानकारी दी और सोशल मीडिया पर भारत विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया. उनके खिलाफ OSA की धारा 3, 4 और 5 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत मामला दर्ज किया गया। धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कार्यों से संबंधित है.

जांच में पता चला कि ज्योति ने कई बार पाकिस्तान की यात्रा की और व्हाट्सएप व टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स के जरिए संदिग्ध लोगों से संपर्क किया. पुलिस ने उनके मोबाइल फोन और लैपटॉप जब्त किए हैं, जिनकी फोरेंसिक जांच चल रही है. ज्योति ने 2024 में राजस्थान के मुनाबाव बॉर्डर पर बिना इजाजत वीडियो बनाए, जो एक प्रतिबंधित क्षेत्र है. हालांकि, अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं मिला कि उनके पास सैन्य या रक्षा से जुड़ी जानकारी थी.

10.2. मोती राम जाट केस

मोती राम जाट, जो सीआरपीएफ में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर थे, को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया. उन पर आरोप है कि उन्होंने 2023 से पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी दी और इसके लिए पैसे लिए. उनकी गिरफ्तारी दिल्ली में हुई.  उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स की जांच एनआईए और अन्य केंद्रीय एजेंसियां कर रही हैं.

11. OSA की आलोचना

OSA की धारा 5 की अस्पष्टता की वजह से कई लोग इसकी आलोचना करते हैं. वे कहते हैं कि यह कानून बहुत व्यापक है और इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई पत्रकार सरकार की गलत नीतियों को उजागर करता है और उसमें कोई सरकारी दस्तावेज शामिल होता है, तो उसे गोपनीय बताकर सजा दी जा सकती है. इससे बोलने की आज़ादी और प्रेस की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है.

कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून को और स्पष्ट करना चाहिए. गोपनीय दस्तावेज की परिभाषा को साफ करना जरूरी है ताकि इसका गलत इस्तेमाल न हो. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस कानून को आधुनिक समय के हिसाब से बदलना चाहिए, क्योंकि यह अंग्रेजों के समय का है और आज के डिजिटल युग में इसकी कुछ बातें पुरानी हो गई हैं.

आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है. ज्योति मल्होत्रा और मोती राम जाट जैसे मामलों ने दिखाया कि यह कानून आज भी जासूसी रोकने और गोपनीय जानकारी को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाता है. लेकिन इसकी धारा 5 की अस्पष्टता की वजह से इसका गलत इस्तेमाल होने की आशंका बनी रहती है. “गोपनीय दस्तावेज” की साफ परिभाषा न होने से सरकार को बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाता है.

डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिए जासूसी के नए तरीके सामने आ रहे हैं. इसलिए इस कानून को और स्पष्ट और आधुनिक करने की जरूरत है. भविष्य में इस पर और चर्चा होगी ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की आज़ादी के बीच संतुलन बनाया जा सके.

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