क्या उपेंद्र और चिराग पकड रहे है पुरानी राह………………..

बिहार विधानसभा का चुनाव ज्यों-ज्यों नजदीक आता जा रहा है, राजनीतिक दलों के रंग-ढंग भी बदलने लगे हैं. वैसे तो बिहार में दो गठबंधनों- एनडीए और ‘इंडिया’ के बीच ही संघर्ष होने की संभावना है. पर, दोनों गठबंधनों में शामिल दलों के तेवर से ऐसा लग रहा है कि चुनाव से पहले ही एक संघर्ष […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 6 जून 2025, 05:46 AM 9 मिनट read
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क्या उपेंद्र और चिराग पकड रहे है पुरानी राह………………..
Photo: UB India News Archive

बिहार विधानसभा का चुनाव ज्यों-ज्यों नजदीक आता जा रहा है, राजनीतिक दलों के रंग-ढंग भी बदलने लगे हैं. वैसे तो बिहार में दो गठबंधनों- एनडीए और ‘इंडिया’ के बीच ही संघर्ष होने की संभावना है. पर, दोनों गठबंधनों में शामिल दलों के तेवर से ऐसा लग रहा है कि चुनाव से पहले ही एक संघर्ष चल रहा है. एनडीए में लोजपा-आर के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान अलग बवेला मचाए हुए हैं तो आरएलएम के संस्थापक अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का भी सुर बदलने लगा है. संयोग यह कि 8 जून को दोनों अपनी-अपनी ताकत का अलग-अलग प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं. राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरलएम) की महारैली मुजफ्फरपुर में होगी तो लोक जनशक्ति पार्टी- रामविलास (एलजेपी-आर) आरा में उसी दिन नव संकल्प महासभा का आयोजन करेगी. प्रसंगवश यह जिक्र जरूरी है कि लोजपा- आर ने चिराग पासवान के लिए विधानसभा का चुनाव लड़ने का प्रस्ताव पारित किया है. वे भी असेंबली इलेक्शन में उतरने की इच्छा जता चुके हैं. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएम इसलिए नाराज है कि विक्रमगंज में प्रधानमंत्री मोदी ने उनके नाम का जिक्र संबोधन से भाषण तक एक बार भी नहीं किया. कुशवाहा को लगता है कि उन्हें डुबाने की कोशिश हो रही है. चेतावनी भी दे चुके हैं कि वे जिस नाव पर सवार हैं, अगर उन्हें डुबाने की कोशिश हुई तो वह नाव भी डूब जाएगी. इशारों में यह एनडीए को उनकी चेतावनी है.

NDA के लिए 8 जून है इंपार्टेंट
एनडीए के लिए 8 जून को होने वाले दोनों दलों के कार्यक्रम इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि उनकी ओर से शायद कोई ऐसा फैसला लिया जा सकता है, जिससे गठबंधन की एका छिन्न-भिन्न हो सकती है. एनडीए की दोनों बड़ी पार्टियों- भाजपा और जेडीयू के नेताओं की चिंता बढ़नी स्वाभाविक है. इसलिए कि अभी तक विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दलों ने गठबंधन के तहत ही कार्यक्रम आयोजित किए हैं. कुछ ही महीनों पहले एनडीए के सभी दलों के राज्य प्रमुखों ने जिलों का साझा तौर पर दौरा किया था. यह एनडीए में एकजुटता दिखाने का प्रयास था. अलग-अलग कार्यक्रमों से बचने के तहत ही जेडीयू ने अपने राष्ट्रीय महासचिव मनीष वर्मा के चल रहे जिलावार कार्यक्रम को रोक दिया था. भाजपा भी अकेले किसी कार्यक्रम से परहेज करती रही है.

उपेक्षा से आहत उपेंद्र कुशवाहा
उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी की एनडीए में उपेक्षा से आहत हैं. उन्हें दो मौकों पर अपनी उपेक्षा का एहसास हुआ है. वे मुखर होकर तो नहीं बोल रहे, लेकिन भीतर ही भीतर तकलीफ तो है ही. हाल ही में बिहार में अल्पसंख्यक आयोग, अनुसूचित जाति आयोग और सवर्ण आयोग का गठन हुआ है. इनमें लोजपा-आर और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के लोगों को तो जगह मिली, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएम का प्रतिनिधित्व नहीं दिखा. अनुसूचित जाति आयोग में चिराग पासवान के बहनोई और जीतन राम मांझी के दामाद को जगह मिली है. अल्पसंख्यक आयोग में कुशवाहा अपनी पार्टी के पदाधिकारी फजल इमाम मल्लिक के लिए जगह चाहते थे. पर, उन्हें जगह नहीं दी गई. उपेंद्र कुशवाहा के लोगों को इस बात से भी दुख पहुंचा है कि विक्रमगंज की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी का तो नाम लिया, लेकिन शाहाबाद क्षेत्र से होने के बावजूद उपेंद्र कुशवाहा का नाम अपने संबोधन में नहीं रखा. कुशवाहा को भय है कि टिकट बंटवारे में भी उनकी उपेक्षा हो सकती है. इसीलिए पहले से ही उन्होंने भूमिका बनानी शुरू कर दी है.

सीटों के लिए पासवान के पैंतरे
चिराग पासवान भी अपनी पार्टी के लिए अधिक से अधिक सीटें चाहते हैं. लोजपा-आर 40 सीटों की मांग उठा चुकी है. सच सबको पता है. 5 दलों के गठबंधन एनडीए में चिराग को इतनी सीटें तो मिल ही नहीं सकतीं. ऐसे में अधिक से अधिक सीटें लेने की उनकी कोशिश जारी है. दबाव बनाने के लिए वे विधानसभा का चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं. उनकी पार्टी के लोग उन्हें बिहार की उम्मीद बता रहे हैं. चिराग की ताकत का एहसास कराने के लिए उनके बहनोई और लोजपा-आर के सांसद अरुण भारती लगातार लगे हुए हैं. वे यह तक बता रहे कि चिराग बिहार के सर्वमान्य नेता है. वे रिजर्व सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे. वे जेनरल सीट से लड़ेंगे. मौजूदा विधानसभा में चिराग की पार्टी का कोई सदस्य नहीं है. ऐसे में उन्हें जो भी सीटें मिलेंगी, वे या तो एनडीए की हारी हुई सीटें होंगी या फिर उसके लिए भाजपा और जेडीयू को अपनी जीती हुई सीटों में कटौती करनी होंगी. पिछली बार 134 सीटों पर लड़ कर चिराग की पार्टी सिर्फ 9 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. चिराग उन सीटों पर अपनी दावेदारी कर रहे हैं, जबकि जेडीयू इसके लिए तैयार नहीं है. जेडीयू जीती हुई अपनी 43 सीटों के अलावा वे सीटें भी चाहता है, जहां उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे. ऐसे में चिराग के लिए परेशानी हो सकती है. चिराग की हड़बड़ी का आलम यह है कि वे पहले से ही कई सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं. उनमें एक सीट शेखपुरा की भी है.

नाराज उपेंद्र ने NDA छोड़ा था
उपेंद्र कुशवाहा 2019 में भी ख़फ़ा हुए थे. लोकसभा चुनाव के कुछ ही पहले एनडीए से नाराज होकर अलग हो गए थे. वर्ष 2013 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाने वाले कुशवाहा ने 2014 का लोकसभा चुनाव एनडीए फोल्डर में रह कर लड़ा था. तब उन्हें हिस्से में 3 सीटें मिली थीं. उनकी पार्टी तीनों सीटें जीत गई और उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह भी मिली. 2018 से ही उन्होंने पैंतरे शुरू कर दिए थे. वे 5 सीटें मांग रहे थे. इतनी सीटें न मिलने पर वे अलग हो गए. लोकसभा चुनाव में उनकी तत्कालीन पार्टी रालोसपा ने 5 सीटों पर चुनाव लड़ा. खुद कुशवाहा 2 सीटों से लड़े. रालोसपा सभी सीटें हार गई. कुशवाहा भी दोनों सीटों पर हार गए. 2020 का असेंबली चुनाव उनकी पार्टी एनडीए से अलग होकर लड़ी. कोई नहीं जीता. हार-थक कर 2021 में उन्होंने अपनी पार्टी का जेडीयू में विलय कर दिया. नीतीश कुमार ने उन्हें एमएलसी बनाया. वे नीतीश की सरकार में डेप्युटी सीएम बनना चाहते थे, पर नीतीश ने उनकी बात यह कह कर अनसुनी कर दी कि जेडीयू से अब और मंत्री नहीं बनाए जा सकते. उसके बाद आरजेडी से नीतीश के गठबंधन का उन्होंने विरोध शुरू किया. यह वही दौर था, जब नीतीश ने 2025 का चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ने का ऐलान कर दिया था. कुशवाहा उन दिनों नीतीश का सबसे करीबी अपने को मानते थे. नाराज होकर कुशवाहा ने जेडीयू छोड़ दी. नई पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) बना कर एनडीए में वापसी की. 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली, जहां से चुनाव वे खुद लड़े और हार गए. एनडीए ने उन पर फिर कृपा बरसाई और 2 साल के लिए उन्हें राज्यसभा भेजा गया.

चिराग-उपेंद्र के सामने आप्शन
उपेंद्र कुशवाहा के तेवर से लगता है कि वे 2019 दोहराना चाहते हैं. तब कम सीटें मिलने पर उन्होंने एनडीए छोड़ दिया था. इस बार भी वे नाराज होकर अपनी राह अलग कर लें तो आश्चर्य नहीं. हालांकि अलग होकर चुनाव लड़ने का उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा है. 2020 का विधानसभा चुनाव उन्होंने मायावती की पार्टी बसपा और अससुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ मिल कर लड़ा था. तब भी उनका कोई उम्मीदवार नहीं जीता. इस बार अगर वे एनडीए छोड़ते हैं तो उनके सामने सीमित विकल्प हैं. महागठबंधन में उनका जाना इसलिए संभव नहीं होगा, क्योंकि पहले से ही वहां सीटों के लिए घमासान मचा है. कांग्रेस और मुकेश सहनी के नेतृत्व वाली वीआईपी सीटों के लिए गदर मचाई हुई हैं. गए भी तो उन्हें बमुश्किल 4-5 सीटें ही मिल पाएंगी. इतनी सीटें तो एनडीए में ही मिल जाएंगी. बसपा के साथ वे फिर हाथ मिला सकते हैं. हालांकि तल्ख तेवर दिखा कर उनकी कोशिश यही होगी कि एनडीए में कम से कम 10 सीटें मिल जाएं.

NDA पर नहीं होगा असर
चिराग पासवान की पार्टी तो बड़ा सपना देख रही है. लोजपा-आर के नेता चिराग में सीएम की संभावनाएं तलाश रहे हैं. उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. हालांकि दोनों के पैंतरों की वजह सबको पता है. दोनों अधिकाधिक सीटों की बार्गेनिंग कर रहे हैं. एनडीए से अलग होने का नतीजा दोनों देख चुके हैं. 2020 का विधानसभा चुनाव चिराग एनडीए से अलग होकर लड़े. 134 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. एक सीट पर ही उनका उम्मीदवार जीत पाया, जिसने बाद में पाला बदल लिया. उनकी पार्टी के पास 5-6 प्रतिशत वोट हैं. एनडीए में रह कर लोकसभा के 4 चुनाव उनकी पार्टी लड़ी और हर बार परफार्मेंस शत-प्रतिशत रहा. ऐसा तभी संभव हुआ, जब उन्हें नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के चेहरों का लाभ मिला. 2020 में उनके अलग लड़ने के बावजूद एनडीए ने सरकार बना ली. वह भी तब, जब उन्होंने जेडीयू को तकरीबन 3 दर्जन सीटों पर नुकसान पहुंचाया. भाजपा और जेडीयू नेतृत्व को दोनों की ताकत का अंदाजा है. इसलिए शायद ही उनकी चिल्ल-पों का कोई असर हो.

 

 

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