बिहार का चुनावी परिदृश्य किसी के लिए आसान नहीं , दोनों गठबंधनों में सीटों के लिए खींचतान.

बिहार का चुनावी परिदृश्य किसी की समझ में नहीं आ रहा. चुनाव का समय ज्यों-ज्यों करीब आ रहा है, सियासी दलों-गठबंधनों की उलझनें बढ़ती जा रही हैं. टिकट बंटवारा हर गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. हालांकि, यह पेच आखिरकार सुलझ जाएगा, पर मौजूदा उलझन को सुलझाने के लिए साथी दलों को […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 14 जून 2025, 05:37 AM 6 मिनट read
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बिहार का चुनावी परिदृश्य किसी के लिए आसान नहीं , दोनों गठबंधनों में सीटों के लिए खींचतान.
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बिहार का चुनावी परिदृश्य किसी की समझ में नहीं आ रहा. चुनाव का समय ज्यों-ज्यों करीब आ रहा है, सियासी दलों-गठबंधनों की उलझनें बढ़ती जा रही हैं. टिकट बंटवारा हर गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. हालांकि, यह पेच आखिरकार सुलझ जाएगा, पर मौजूदा उलझन को सुलझाने के लिए साथी दलों को मनाने में नेतृत्वकर्ता दलों के पसीने जरूर छूटेंगे. यह भी संभव है कि सीटों की मांग पूरी न होने पर गठबंधनों में शामिल कुछ दल अपना ठिकाना आखिरी वक्त में बदल लें. इस स्थिति से महागठबंधन और एनडीए के घटक दलों में रोज ही किचकिच हो रही है. सीटों के लिए हो रही खींचतान का आलम यह है कि महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे आरजेडी और एनडीए की बड़ी पार्टियां भाजपा-जेडीयू सहयोगियों के नखरों से परेशान हो गई हैं. जिस दिन टिकट बंटवारे का फार्मूला तय होगा, उस दिन कोहराम मचना तय माना जा रहा है.

महागठबंधन में सबको चाहिए भरपूर सीटें

महागठबंधन की पहले की 5 पांर्टियों में पिछली बार सीटों का जो बंटवारा हुआ था, उसमें आरजेडी को 144, कांग्रेस को 70, सीपीआई-एमएल को 19 और सीपीआई-सीपीएम को 10 सीटें मिली थीं. इस बार कांग्रेस 70 सीटों से कम पर मानने को तैयार नहीं. अब तक चुप रहे सीपीआई-एमएल ने भी 45 सीटों की मांग कर दी है. महागठबंधन के नए साथी बने मुकेश सहनी अपनी पार्टी वीआईपी के लिए 60 सीटों की शुरू से ही रट लगाए हुए हैं. एनडीए छोड़ महागठबंधन में आए पशुपति कुमार पारस की पार्टी आरएलजेपी को भी कुछ सीटें चाहिए ही. सीपीआई-सीपीएम पिछली बार की 10 सीटों से कम पर नहीं मानेंगी. यानी 185-190 सीटें सहयोगियों को ही चाहिए. अगर सबको मुंहमांगी सीटें मिलीं तो महागठबंध को लीड करने वाले आरजेडी के हिस्से 55-60 सीटें ही बचती हैं. आरजेडी 5-10 सीटें भले छोड़ दे, पर सहयोगियों की सीटों से कम पर वह कैसे लड़ेगा. इसलिए सीटों के लिए घमासान मचना तय है.

महागठबंधन की उपेंद्र कुशवाहा पर नजर

महागठबंधन में फिलवक्त 7 पार्टियां शामिल हैं. आने वाले वक्त में एक-दो और साथ आ जाएं तो आश्चर्य नहीं. महागठबंधन को उम्मीद है कि आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा कम सीटें मिलने पर एनडीए से नाराज हो सकते हैं. उनकी नाराजगी को महागठबंधन भुनाने की कोशिश में हैं. कुशवाहा वोटरों पर लोकसभा चुनाव के वक्त से ही महागठबंधन ने नजर गड़ाए रखी है. महागठबंधन ने लोकसभा चुनाव में कुशवाहा नेताओं को सर्वाधिक टिकट दिए थे. अभय कुशवाहा आरजेडी के टिकट पर सांसद बन भी गए. आरजेडी ने उन्हें लोकसभा में पार्टी का नेता बना कर कुशवाहा समाज को अपने कुशवाहा प्रेम का संदेश दिया. लालू यादव और तेजस्वी यादव की रणनीति लोकसभा के जरिए विधानसभा चुनाव की जमीन पुख्ता करने की रही है. शाहाबाद में कुशवाहा वोटरों ने पहली बार एनडीए से मुंह चुराया और महागठबंधन को मजबूत किया. महागठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा के प्रति ललक इसी वजह से बढ़ी दिखती है. एनडीए में उपेंद्र कुशवाहा खुल कर सीटों की मांग तो नहीं कर रहे, लेकिन पार्टी की इच्छा है कि आरएलएम को कम से कम 15 सीटें तो मिलनी ही चाहिए. उपेंद्र कुशवाहा बोर्ड-आयोगों में हुई आरएलएम की उपेक्षा से आहत हैं. कई आयोगों का गठन सरकार ने किया है. सिर्फ एक आयोग में उनकी पार्टी को जगह मिली है. अगर सीट बंटवारे में भी उन्हें अंडर एस्टीमेट किया गया तो वे अपनी राह अलग कर सकते हैं. अगर वे महागठबंधन में गए तो सीटों का संकट और बढ़ेगा.

कांग्रेस ने सीएम फेस पर फंसाया है पेच

कांग्रेस को लग रहा है कि नए साथियों को एकोमोडेट करने के लिए महागठबंधन में उसकी सीटें घटाई जा सकती हैं. सीटें घटाने का आधार पिछली बार कांग्रेस का खराब परफारमेंस बनेगा. तब 70 सीटों पर लड़ कर कांग्रेस ने सिर्फ 19 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को इसकी भनक लग गई है. पिछली बार की सीटों में कोई कटौती न हो, इसके लिए कांग्रेस लगातार दबाव बनाए हुए है. एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष कन्हैया कुमार के नेतृत्व में कांग्रेस ने पलायन रोको यात्रा निकाली. राहुल गांधी के लगातार दौरे हो रहे हैं. आरजेडी के पारंपिरक वोटर दलित और ईबीसी के लिए कांग्रेस का उमड़ा प्रेम महागठबंधन में दीवार खड़ी करने की कोशिश है. इससे भी बड़ा पेच कांग्रेस ने सीएम फेस को लेकर फंसा दिया है. कांग्रेस नहीं चाहती कि चुनाव से पहले सीएम के चेहरे का ऐलान हो, जबकि तेजस्वी यादव खुद को सीएम फेस घोषित कर चुके हैं. महागठबंधन में शामिल पर्टियों ने कोआर्डिनेशन कमिटी तो बना ली है, पर फेस पर अब भी स्थिति साफ नहीं है.एनडीए में भी सीटों पर मचा है घमासान

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