चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश आए करीब, क्या भारत को रणनीति बदलने की जरूरत

चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान ने 19 जून को कुनमिंग, युन्नान में पहली बार त्रिपक्षीय बैठक की। यह बैठक विदेश मंत्रालय स्तर पर हुई। यह घटनाक्रम पिछले एक साल में इस क्षेत्र में बने भू-राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है। बांग्लादेश में पिछले साल हुए सत्ता परिवर्तन और भारत-बांग्लादेश के बीच बढ़ती दूरी के कारण यह बदलाव […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 26 जून 2025, 01:03 PM 4 मिनट read
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चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश आए करीब, क्या भारत को रणनीति बदलने की जरूरत
Photo: UB India News Archive

चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान ने 19 जून को कुनमिंग, युन्नान में पहली बार त्रिपक्षीय बैठक की। यह बैठक विदेश मंत्रालय स्तर पर हुई। यह घटनाक्रम पिछले एक साल में इस क्षेत्र में बने भू-राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है। बांग्लादेश में पिछले साल हुए सत्ता परिवर्तन और भारत-बांग्लादेश के बीच बढ़ती दूरी के कारण यह बदलाव आया है। इस त्रिकोण में बांग्लादेश-पाकिस्तान के रिश्ते सुधर रहे हैं और बांग्लादेश चीन की ओर झुक रहा है। चीन और पाकिस्तान के रिश्ते पहले से मजबूत हैं। ऑपरेशन सिंदूर में भी यह दिख चुका है।

बांग्लादेश और पाकिस्तान आ रहे हैं तेजी से करीब

कड़वे इतिहास के बावजूद बांग्लादेश और पाकिस्तान एक-दूसरे के साथ जुड़ रहे हैं। दिसंबर 2024 में मोहम्मद यूनुस और शहबाज शरीफ की मुलाकात के बाद सैन्य और आर्थिक सहयोग शुरू हुआ। जनवरी में बांग्लादेश के एक उच्च-स्तरीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात की। फरवरी में बांग्लादेशी नौसेना ने 12 साल के अंतराल के बाद कराची में अमन 2025 में भाग लिया। 1971 के बाद पहली बार, दोनों देशों ने मार्च 2025 से सीधा व्यापार शुरू किया। रणनीतिक रूप से यह दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को सीमित करता है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति खराब है, इसलिए बांग्लादेश के रूप में एक नया व्यापारिक भागीदार मिलना अच्छा है।

बांग्लादेश का चीन की तरफ भी हो चुका है झुकाव

यूनुस ने मार्च में चीन की यात्रा के दौरान आर्थिक मदद की बात की। कई मुद्दों पर कुल नौ आर्थिक और तकनीकी समझौते हुए। अमेरिका का निवेश कम हो रहा है और बांग्लादेश भारत से दूर जा रहा है, इसलिए चीन उसकी आर्थिक समस्याओं को हल करने का सबसे अच्छा विकल्प है। दिलचस्प बात यह है कि यह सहयोग सिर्फ सरकारी स्तर पर ही नहीं हो रहा है। चीन बांग्लादेश के राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी कर रहा है और लोगों के बीच संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है। हसीना के शासन में भी चीन-बांग्लादेश के रिश्ते बढ़े, लेकिन भारत की सहमति से। भारत को बड़ी आर्थिक परियोजनाओं में प्राथमिकता दी जाती थी और भारत की सुरक्षा चिंताओं का ध्यान रखा जाता था। यूनुस ने अब चीनी कंपनियों को तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना (TRCMRP) में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है, जबकि हसीना भारत को शामिल करना चाहती थीं। वहीं सिलीगुड़ी कॉरिडोर से 135 किलोमीटर दूर, बांग्लादेशी एयरबेस को लेकर यूनुस का खतरनाक मंसूबा पहले ही जाहिर हो चुका है।

पड़ोसियों के त्रिकोण के खिलाफ क्या विकल्प हैं

बांग्लादेश की मौजूदा सरकार की नकेल कसने के लिए भारत के पास फिलहाल कूटनीति ही बड़ा विकल्प है। मसलन, जिस तरह से सिंधु जल संधि को रोकने से पाकिस्तान की सांसें फूल रही हैं, उसी तरह से गंगा जल समझौते पर पुनर्विचार का संदेश भी बांग्लादेश को सांप सुंघा सकता है। इसके अलावा भारत बांग्लादेश तक यह संदेश भी पहुंचा सकता है कि अपने जन्मदाता से सीधा भिड़ना उसके भविष्य के लिए सही नहीं है। इसके अलावा सबसे बेहतर विकल्प है,वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के आने का इंतजार करना।

जहां तक पाकिस्तान की बात है तो भारत ने ऑपरेशन सिंदूर को मात्र स्थगित करने की बात कहकर उसे ठीक से समझा दिया है। सबसे बड़ी चुनौती चीन को साधे रखने की है और उसके लिए कूटनीति से अच्छी रणनीति कोई हो नहीं सकती। पिछले कुछ समय में इस मामले में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में कुछ बेहतरी के भी संकेत मिले भी हैं। लेकिन, हकीकत यही है कि अभी भारत ने अपने दुश्मनों में अभी एक तीसरे को भी जोड़ लिया है। ऐसे में भारत को हर स्थिति के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है और जबतक बांग्लादेश में कोई भारत की हितैषी सरकार नहीं आ जाती, बहुत ही ज्यादा सतर्क रहने में ही भलाई है।

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