संविधान में लिखे समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द का मतलब क्या है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले के एक बयान ने विवाद खड़ा कर दिया है. उन्होंने कहा है कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना का हिस्सा ही नहीं थे. ये शब्द संविधान में साल 1976 में आपातकाल के दौरान जोड़े गए. इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि इन शब्दों […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 27 जून 2025, 12:25 PM 5 मिनट read
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संविधान में लिखे समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द का मतलब क्या है?
Photo: UB India News Archive

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले के एक बयान ने विवाद खड़ा कर दिया है. उन्होंने कहा है कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना का हिस्सा ही नहीं थे. ये शब्द संविधान में साल 1976 में आपातकाल के दौरान जोड़े गए. इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि इन शब्दों पर सार्वजनिक रूप से बहस होनी चाहिए कि अब ये प्रासंगिक हैं भी या नहीं.

आइए जान लेते हैं कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द के मायने क्या हैं? क्यों विवाद की जड़ बने हैं ये शब्द और कब-कब इनको लेकर विवाद हुआ.

42वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़े गए

वास्तव में पहले संविधान में भारत को एक सार्वभौम लोकतांत्रिक गणराज्य बताया गया था. साल 1976 में 42वां संविधान संशोधन किया गया. इसके जरिए संविधान में ‘समाजवादी’ व ‘धर्मनिरपेक्ष’ दोनों शब्द जोड़े गए. तब देश में आपातकाल लगा हुआ था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस समय अपने शासन को गरीबों और आम जनता के लिए समर्पित बताते हुए इन दोनों शब्दों को संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया था. वैसे ये संशोधन तभी सवालों के घेरे में आ गया था. इसको लेकर तभी से विवाद चला आ रहा है.

Indira Gandhi

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दोनों शब्दों को गरीबों और आम जनता के लिए समर्पित किया था.

सोवियत संघ या चीन का मॉडल नहीं

संविधान के जानकारों की मानें तो समाजवादी का अर्थ उस समय राष्ट्रीयकरण अथवा साम्यवाद से नहीं था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का तर्क था कि यह चीन और तत्कालीन सोवियत का मॉडल नहीं है, बल्कि भारत का अपना मॉडल है जहां केवल जरूरी क्षेत्रों का ही राष्ट्रीयकरण होगा. वहीं धर्मनिरपेक्ष शब्द के बारे में जानकार बताते हैं कि यह शब्द तो संविधान की आत्मा में पहले से ही था. इसको संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 में देश के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा अर्चना और धर्म के पालन की स्वाधीनता के जरिए व्यक्त किया गया था. इस विचारधारा को प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से 42वें संशोधन के जरिए लाया गया.

संविधान की बुनियादी विशेषता है धर्मनिरपेक्षता

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे का कहना है कि समाजवाद वास्तव में कल्याणकारी राज्य के प्रति राज्य (देश) की प्रतिबद्धता और समान अवसर की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. यानी भारत एक ऐसा राज्य (देश) है जहां सामाजिक और आर्थिक रूप से समानता स्थापित की जाती है. वहीं, धर्मनिरपेक्षता वास्तव में सभी नागरिकों की समानता के अधिकार के सभी पहलुओं में से एक है. यहां राज्य (देश) का अपना कोई धर्म नहीं और न ही नागरिकों को धर्म को स्वाधीन रूप से मानने, उसका आचरण करने और प्रचार करने की की आजादी या अधिकार पर प्रतिबंध लगाता है. उन्होंने बताया कि केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य और एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि धर्मनिरपेक्षता वास्तव में संविधान की एक बुनियादी विशेषता है.

Supreme Court Vs Government Indian Constitution

संविधान को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था.

शुरू से ही विवादों से घिरे रहे दोनों शब्द

संविधान में समाजवादी और धर्मनिरपेक्षता शब्द को शामिल करने के साथ ही इस पर विवाद शुरू हो गया था. इसके विरोधियों का मानना है कि संविधान के दर्शन में एक तरह से पहले से ही समाजवादी और धर्मनिरपेक्षता का स्पष्ट उल्लेख हुए बिना न्याय, समानता, स्वाधीनता और भाईचारे का विचार निहित है. कांग्रेस के आलोचक चिंता व्यक्त करते रहे हैं कि संविधान में अलग से इन शब्दों को शामिल किए जाने से इनका दुरुपयोग या फिर गलत व्याख्या की जा सकती है. ऐसे में ऐसे नीतियां बनेंगी जो इन शब्दों के मूल इरादे से हट जाएंगी.

कांग्रेस के विरोध वाली पार्टियां हमेशा इसे कांग्रेस के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही हैं. वहीं, वर्तमान में भाजपा सरकार ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाकर कांग्रेस के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है. इससे दोनों राजनीतिक पार्टियों के बीच नए सिरे से टकराव शुरू हो गया है.

पिछले कुछ सालों में कई बार इन दोनों ही शब्दों को संविधान से हटाने की भी मांग की जा चुकी है. भाजपा के कुछ नेताओं ने राज्यसभा और सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर याचिकाएं दायर की थीं. इन याचिकाओं में कहा गया था कि संसद को इतने मूलभूत बदलाव का अधिकार ही नहीं होना चाहिए. हालांकि, 2008 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि समाजवाद को व्यापक रूप से लोक कल्याणकारी व्यवस्था जैसे देखा जाना चाहिए. यह लोकतंत्र का ही एक हिस्सा है.

फिर शुरू हुआ टकराव

संघ के महासचिव के बयान के बाद टकराव जाहिर है फिर से शुरू हो गया है. कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा है आरएसएस ने कभी भी भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं किया. संघ के शब्दों में भारत का संविधान कभी भी ‘मनुस्मृति से प्रेरित नहीं था. आरएसएस और भाजपा बार-बार एक नए संविधान की बात करती आ रही हैं. यह तो साल 2024 में नरेंद्र मोदी के लोकसभा चुनाव प्रचार का मुद्दा भी था.

वहीं कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सवाल उठाया है कि यह आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले हैं. ये संविधान की प्रस्तावना से समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द को हटाने की मांग कर रहे हैं. भला संघ और भाजपा किसी भी कीमत पर संविधान को क्यों बदलना चाहते हैं?”

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