बिहार सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में स्थानीय महिलाओं के लिए 35 फीसदी सीटें आरक्षित करने के फैसले के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे पहले इस निर्णय के राजनीतिक उद्देश्य को पढ़ा जा रहा है, तो यह स्वाभाविक ही है। बिहार में चार माह के भीतर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, और पिछले कई चुनाव इस बात के साक्षी हैं कि बड़ी संख्या में महिला मतदाता वहां अपने मताधिकार का प्रयोग करने लगी हैं। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में तो पुरुषों के मुकाबले 5.24 फीसदी अधिक महिलाओं ने वोट डाले थे। साफ है, सत्ता की चाबी वहां महिलाओं ने अपने हाथों में ले ली है और वे धार्मिक व जातिगत आग्रहों से अधिक लैंगिक हितों से प्रेरित हैं। बिहार उन शुरुआती राज्यों में एक है, जिसने पंचायत और स्थानीय निकायों में आधी आबादी के लिए पचास फीसदी सीटें आरक्षित की हैं। इस कदम ने यहां की स्त्रियों में जबर्दस्त राजनीतिक जागरूकता पैदा की है। ऐसे में, हरेक राजनीतिक दल इस वर्ग को आकर्षित करने में जुट गया है। राजद-कांग्रेस-वाम दलों का महागठबंधन ‘माई-बहिन मान योजना’ के तहत महिलाओं को प्रतिमाह 2,500 रुपये देने का वायदा कर चुका है, तो राजद नेता तेजस्वी यादव बेरोजगारी और डोमिसाइल के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। ऐसे में, नीतीश सरकार के इस नीतिगत दांव को समझा जा सकता है।
राज्य सरकार का यह फैसला सामाजिक लिहाज से भी काफी प्रभावशाली हो सकता है। पिछले डेढ़ दशक में बिहार में बड़ी संख्या में लड़कियां कॉलेज-यूनिवर्सिटी से डिग्रियां लेकर निकली हैं और राष्ट्रीय जागरूकता ने उनके भीतर भी अपने पैरों पर खड़े होने की ललक पैदा की है। सूचना क्रांति, बढ़ती अपेक्षाओं और सामंती बंधनों के ढीले पड़ते जाने के कारण अब ग्रामीण बिहार की बेटियां भी ऊंचे सपने संजो रही हैं। गांव-गांव में स्कूलों व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के विस्तार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनके पास भी आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने के मौके हैं, इसके लिए उन्हें बस शिक्षित होने की जरूरत है। फिर सरकारी क्षेत्र की नौकरियों को लेकर, खासकर महिलाओं में खूब आकर्षण है। बड़ी संख्या में महिला शिक्षा मित्रों, आंगनबाड़ी सहायिकाओं ने महिलाओं को लेकर गांव-समाज की सोच को बदला है। ऐसे में, सरकारी नौकरियों में स्थानीय महिलाओं का आरक्षण एक बड़े सामाजिक बदलाव का वाहक बन सकता है।
यह सर्वविदित तथ्य है कि दिन-ब-दिन शैक्षिक क्षेत्र की लैंगिक खाई कम हो रही है। यही नहीं, अब सभी प्रदेशों की बेटियां देश के दूसरे हिस्सों में नौकरी के लिए जाने लगी हैं। बिहार की लड़कियां देश के तमाम महानगरों में नौकरीशुदा हैं, तो खुद वहां पर शिक्षकों की हालिया भर्तियों में एक दर्जन से भी अधिक प्रदेशों की लड़कियां इंटरव्यू देने पहुंची थीं। उनमें से अनेक सफल भी रहीं और बाकायदा वहां के स्कूलों में पढ़ा रही हैं। निस्संदेह, सैद्धांतिक स्तर पर यह एक स्वागत योग्य बदलाव है, मगर व्यावहारिक रूप से देखें, तो देश में महिला सुरक्षा अब भी चिंता का बड़ा विषय है। ऐसे में, यदि बेटियों को उनकी योग्यता के अनुसार घर के आस-पास ही रोजगार के अवसर मिल जाएं, तो यह अधिक मुनासिब माना जाएगा। इस नजरिये से नीतीश सरकार का फैसला स्वागत-योग्य है। अन्य राज्य सरकारों को भी महिलाओं के लिए ऐसे विशेष प्रबंध करने चाहिए, ताकि वे न सिर्फ आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें, बल्कि देश की तरक्की में बराबर की हिस्सेदारी निभा सकें। ऐसे फैसलों का विस्तार निजी क्षेत्र तक होना चाहिए।








