जनगणना को लेकर इस समय जो सियासी घमासान है, उसकी जड़ सिर्फ जनसंख्या की गिनती नहीं, बल्कि जातिगत आंकड़े, आरक्षण, सामाजिक न्याय और भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हुई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनगणना 2027 में पहली बार स्वतंत्र भारत में व्यापक जाति-गणना शामिल की जा रही है। केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को इसे मंजूरी दी थी। जनगणना दो चरणों में होगी और मार्च 2027 को सामान्य संदर्भ तिथि रखा गया है।
आजादी के बाद सामान्य जनगणना में SC और ST की गणना होती रही, लेकिन अन्य जातियों की व्यापक गणना नहीं हुई। अब सरकार ने सभी जातियों की गणना का फैसला किया है। इससे पहली बार देश के पास अलग-अलग जातियों की वास्तविक संख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़ा व्यापक आधिकारिक डेटा आ सकता है। यही डेटा आगे आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के वितरण की बहस को प्रभावित कर सकता है। विपक्ष की प्रमुख आपत्ति यह है कि जाति की जानकारी किस तरीके से दर्ज की जाएगी और क्या OBC समुदायों को पर्याप्त स्पष्टता के साथ चिन्हित किया जाएगा। हाल के दिनों में कांग्रेस ने इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि जाति-गणना को अलग राजनीतिक सर्वे के बजाय मुख्य जनगणना का हिस्सा बनाने से एक अधिक संस्थागत और देशव्यापी प्रक्रिया होगी। यहीं से मामला और बड़ा हो जाता है। जनगणना के आंकड़े भविष्य के परिसीमन यानी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दक्षिणी राज्यों को आशंका रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को परिसीमन में नुकसान हो सकता है, जबकि अधिक आबादी वाले राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। इसी कारण परिसीमन को लेकर भी राजनीतिक तनाव है। 2026 में लोकसभा सीटों की संख्या और महिला आरक्षण को लेकर परिसीमन की बहस और तेज हुई है। इसलिए अब जनगणना को केवल जनसंख्या गिनने की प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि 2029 के बाद के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संभावित बुनियाद के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस ने जनगणना 2027 में जाति, धर्म और माता-पिता से जुड़ी जानकारी जुटाने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि जाति संबंधी सवालों की संरचना जानबूझकर गलत रखी गई है और जनगणना के पीछे ‘गहरा और बुरा मकसद’ हो सकता है। कांग्रेस ने खास तौर पर 2021 के सुप्रीम कोर्ट हलफनामे का हवाला देते हुए पूछा है कि जब सरकार ने जातियों की पहचान के लिए ड्रॉप-डाउन मेनू की उपयोगिता बताई थी, तो 2027 की जनगणना में इसे शामिल क्यों नहीं किया गया।
धर्म और माता-पिता की जानकारी को लेकर कांग्रेस ने उठाए सवाल
जयराम रमेश ने एक्स पर एक मीडिया रिपोर्ट साझा की। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि जनगणना 2027 के दौरान माता-पिता दोनों के धर्म, जन्म तिथि और जन्म स्थान की जानकारी मांगी जा रही है। इतना ही नहीं, यह जानकारी गांव के स्तर तक दर्ज किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जनगणना के सवाल-जवाब वाले फॉर्म में जाति बताने के लिए खुला विकल्प दिया गया है। इसके अलावा, जवाब देने वाला व्यक्ति “जाति नहीं बताना चाहते” और “कोई जाति नहीं” जैसे विकल्प भी चुन सकता है।
जयराम रमेश बोले- सवाल पूछने का तरीका जानबूझकर गलत
रमेश ने अपनी पोस्ट में कहा, ‘जनगणना 2027 में जाति के बारे में सवाल पूछने का तरीका जानबूझकर गलत है। धर्म, जन्म तिथि और माता-पिता के जन्म स्थान के बारे में इतने बारीक सवाल पहले कभी नहीं पूछे गए।’ उन्होंने आगे कहा कि जनगणना गोपनीय होती है। साफ है कि जनगणना 2027 के पीछे कोई गहरा और बुरा मकसद है।
जाति जनगणना को लेकर पहले भी सरकार पर निशाना
कांग्रेस ने मंगलवार को भी आरोप लगाया था कि मोदी सरकार जाति जनगणना को रोकना चाहती है। पार्टी ने सवाल उठाया था कि जनगणना 2027 में जाति चुनने के लिए ड्रॉप-डाउन मेनू क्यों शामिल नहीं किया गया, जबकि केंद्र सरकार ने सितंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में इसकी सिफारिश की थी। विपक्षी पार्टी ने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 अप्रैल 2025 को जाति जनगणना कराने की घोषणा कर ‘पूरी तरह से यू-टर्न’ लिया था। कांग्रेस का कहना है कि अब सरकार ‘अपने ही पहले वाले यू-टर्न पर यू-टर्न’ ले रही है।
2021 के हलफनामे का हवाला देकर कांग्रेस ने घेरा
जयराम रमेश ने बताया कि 21 सितंबर 2021 को मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया था। इसमें जाति जनगणना की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज किया गया था।
हालांकि, रमेश ने एक्स पर साझा की गई अपनी पोस्ट में हलफनामे के पैरा 12 (d) का हवाला देते हुए कहा कि इसमें जातियों का रजिस्टर तैयार करने के लिए ड्रॉप-डाउन मेनू का सुझाव दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार की सिफारिश पर कांग्रेस का सवाल
रमेश ने हलफनामे के संबंधित हिस्से को उद्धृत करते हुए कहा कि 2011 की जनगणना से पहले जातियों का कोई रजिस्टर तैयार नहीं किया गया था। जातियों के रजिस्टर के लिए यह बेहतर होता कि जातियों को चुनने के लिए एक ड्रॉप-डाउन मेनू दिया जाता, जिससे कुछ ऐसा भरोसेमंद डेटा मिल पाता, जिस पर भरोसा किया जा सके। रमेश ने इसी आधार पर सवाल उठाया कि 2027 की जनगणना में ऐसा ड्रॉप-डाउन मेनू क्यों नहीं है, जबकि सितंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट के सामने दाखिल हलफनामे में मोदी सरकार ने खुद इसकी सिफारिश की थी।
जनगणना 2027: आंकड़ों की लड़ाई या सत्ता के नए समीकरण?
भारत में जनगणना हमेशा से सिर्फ लोगों की गिनती का प्रशासनिक अभ्यास नहीं रही है। यह देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर तैयार करने का सबसे बड़ा माध्यम है। लेकिन 2027 की जनगणना इस मायने में असाधारण है कि इसमें पहली बार स्वतंत्र भारत में व्यापक स्तर पर जाति की जानकारी दर्ज की जाएगी। यही कारण है कि जनगणना को लेकर राजनीतिक घमासान लगातार तेज होता जा रहा है।
सरकार ने जनगणना के दूसरे चरण के लिए 40 सवालों वाला प्रारूप अधिसूचित किया है। इसमें सभी लोगों से उनकी जाति के बारे में जानकारी ली जाएगी और जाति को उत्तरदाता द्वारा घोषित रूप में दर्ज किया जाएगा।
लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश में कौन कितनी संख्या में है। असली सवाल यह है कि इन आंकड़ों के सामने आने के बाद भारत की राजनीति, आरक्षण और प्रतिनिधित्व का ढांचा कितना बदल सकता है?
जाति के आंकड़े क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं?
भारत की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर आधारित रही है, लेकिन देश के पास सभी जातियों की आधुनिक और व्यापक आधिकारिक जनगणना उपलब्ध नहीं है।
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है—राजनीतिक दल चुनाव में जातीय समीकरणों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नीति निर्माण के लिए जातियों की वास्तविक संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का व्यापक आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
2027 की जनगणना इस स्थिति को बदल सकती है।
यदि यह पता चलता है कि किसी समुदाय की आबादी वर्तमान राजनीतिक अनुमान से काफी अधिक या कम है, तो उसके आधार पर आरक्षण, सरकारी योजनाओं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के वितरण की मांगें भी बदल सकती हैं।
यानी जाति की गिनती वास्तव में सत्ता में हिस्सेदारी की नई बहस का आधार बन सकती है।
कांग्रेस की आपत्ति क्या है?
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, जाति-गणना के तरीके को लेकर सवाल उठा रहा है।
हाल ही में कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जातियों की पहले से तैयार सूची नहीं होने और उत्तरदाताओं से जाति का नाम स्वयं लिखवाने की व्यवस्था से आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। पार्टी ने तेलंगाना के जाति सर्वेक्षण मॉडल का भी हवाला दिया है।
सरकार का पक्ष यह है कि जाति को व्यक्ति द्वारा घोषित किए जाने से वास्तविक सामाजिक पहचान दर्ज की जा सकेगी। लेकिन विशेषज्ञों के सामने चुनौती यह होगी कि अलग-अलग नाम, उपजातियां और स्थानीय पहचान बाद में किस तरह व्यवस्थित की जाएंगी।
इसलिए आने वाले समय में बहस सिर्फ “जाति गिनी जाए या नहीं” पर नहीं होगी, बल्कि इस पर भी होगी कि “जाति को गिना कैसे जाए?”
बिहार का अनुभव क्यों महत्वपूर्ण है?
जाति-आधारित सर्वेक्षण की राजनीति में बिहार पहले ही एक बड़ा प्रयोग कर चुका है।
बिहार के जाति सर्वेक्षण ने देशव्यापी बहस को नई दिशा दी। इससे यह सवाल और मजबूत हुआ कि यदि सरकारें सामाजिक न्याय की नीतियां बनाना चाहती हैं तो उनके पास समाज की वास्तविक सामाजिक संरचना के आंकड़े भी होने चाहिए।
अब राष्ट्रीय जनगणना में जाति को शामिल किए जाने से बिहार जैसे राज्य के अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर देखने का अवसर मिलेगा।
यही कारण है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य बड़े हिंदी भाषी राज्यों की राजनीति में इसका प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
असली राजनीतिक विस्फोट: आरक्षण
जाति के आंकड़े सामने आने के बाद सबसे बड़ी बहस आरक्षण को लेकर हो सकती है।
यदि किसी जाति या सामाजिक समूह की जनसंख्या उसकी वर्तमान हिस्सेदारी से काफी अलग निकलती है, तो उसके आधार पर आरक्षण में बदलाव की मांग उठ सकती है।
विशेषकर OBC वर्ग के भीतर कौन कितना बड़ा है, किसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है और सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा में किसकी वास्तविक भागीदारी कितनी है—इन सवालों पर नए सिरे से बहस हो सकती है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न भी खड़ा होगा:
क्या जनसंख्या का अनुपात ही राजनीतिक और आरक्षण संबंधी हिस्सेदारी का आधार होना चाहिए?
यही प्रश्न आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बहसों में से एक बन सकता है।
जनगणना और परिसीमन का संबंध
जनगणना का दूसरा बड़ा राजनीतिक पहलू परिसीमन है।
परिसीमन का अर्थ है—जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों का पुनर्निर्धारण।
2027 की जनगणना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भविष्य के परिसीमन से जुड़ सकती है। विशेषज्ञों ने भी जनगणना और परिसीमन को 2027 के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों में माना है।
यहीं से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक चिंता सामने आती है।
दक्षिण भारत के कई राज्यों ने लंबे समय तक जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। दूसरी तरफ उत्तर भारत के कई राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है।
यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का वितरण जनसंख्या के अनुपात में अधिक किया जाता है तो बड़े और अधिक आबादी वाले राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।
इसलिए सवाल सिर्फ सीटों की संख्या का नहीं है।
सवाल है—
भारत के राजनीतिक शक्ति-संतुलन का अगला नक्शा कैसा होगा?
महिला आरक्षण भी इसी समीकरण का हिस्सा है
महिला आरक्षण कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को भी परिसीमन से जोड़ा गया है। इसलिए जनगणना, परिसीमन और महिला आरक्षण तीन अलग-अलग मुद्दे दिखाई देने के बावजूद एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
यानी आने वाले वर्षों में एक श्रृंखला बनती दिखाई देती है:
जनगणना → जातिगत आंकड़े → परिसीमन → सीटों का पुनर्वितरण → महिला आरक्षण → राजनीतिक प्रतिनिधित्व
इस पूरी प्रक्रिया का असर 2029 और उसके बाद की राजनीति पर पड़ सकता है।
भाजपा के लिए चुनौती और अवसर
भाजपा के लिए जाति-गणना एक जटिल राजनीतिक मुद्दा है।
एक ओर पार्टी के सामने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व की राजनीति है। दूसरी ओर भाजपा की राजनीति लंबे समय से जातीय पहचान से आगे निकलकर व्यापक हिंदू सामाजिक एकजुटता बनाने की कोशिश करती रही है।
यदि जाति के आंकड़े सामने आने के बाद राजनीति फिर से अत्यधिक जाति-केंद्रित होती है, तो सभी दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इसका प्रभाव महत्वपूर्ण होगा।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए जातीय समीकरण पहले से ही राजनीति के केंद्र में हैं। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम यह दिखा रहा है कि दल अपने सामाजिक गठबंधनों का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन एक बड़ा खतरा भी है
जाति के आंकड़े सामाजिक न्याय के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन उनका राजनीतिक इस्तेमाल समाज में नए तनाव भी पैदा कर सकता है।
यदि हर राजनीतिक मांग केवल संख्या के आधार पर तय होने लगे तो समाज में यह सवाल उठ सकता है कि—
किसकी संख्या कितनी है और उसे सत्ता में कितना हिस्सा मिलना चाहिए?
यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की बहस को मजबूत भी कर सकता है और समाज को अधिक जातीय ध्रुवीकरण की ओर भी ले जा सकता है।
इसलिए आंकड़े अपने आप में न अच्छे हैं, न बुरे।
महत्वपूर्ण यह है कि उनका इस्तेमाल कैसे किया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल: आंकड़े आने के बाद क्या होगा?
यही पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जाति की गणना हो जाएगी। आंकड़े तैयार होंगे। लेकिन उसके बाद क्या होगा?
क्या आरक्षण की समीक्षा होगी?
क्या OBC के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग तेज होगी?
क्या राजनीतिक दल टिकट वितरण की रणनीति बदलेंगे?
क्या सरकारी योजनाओं का लक्ष्य जातीय-सामाजिक आंकड़ों के आधार पर तय होगा?
क्या परिसीमन के बाद कुछ राज्यों की लोकसभा सीटें बढ़ेंगी और कुछ की हिस्सेदारी घटेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या भारत की राजनीति “विकास बनाम जाति” से आगे बढ़कर “विकास + प्रतिनिधित्व + सामाजिक न्याय” के नए मॉडल की ओर जाएगी?
इन सवालों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।
2027 की जनगणना को इसलिए केवल जनसंख्या की गणना समझना भूल होगी।
यह भारत की सामाजिक संरचना का नया आईना हो सकती है।
जाति के आंकड़े भारत की राजनीति को नए सामाजिक समीकरण दे सकते हैं। परिसीमन राजनीतिक शक्ति का भौगोलिक संतुलन बदल सकता है और महिला आरक्षण संसद तथा विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व का स्वरूप बदल सकता है।
इसलिए आज का घमासान वास्तव में जनगणना के सवाल पर नहीं है।
घमासान उस भारत को लेकर है जो जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद दिखाई देगा।
क्योंकि आंकड़े सिर्फ यह नहीं बताएंगे कि भारत में कितने लोग रहते हैं—
वे यह भी बता सकते हैं कि भारत के समाज में कौन कितना बड़ा है, किसकी हिस्सेदारी कितनी है और भविष्य की सत्ता में किसकी आवाज कितनी मजबूत होगी।