न्यूयॉर्क की धरती पर जब किसी भारतीय नेता या विचारक की आवाज गूंजती है, तो वह केवल एक शहर के सभागार तक सीमित नहीं रहती। न्यूयॉर्क दुनिया की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक राजधानी जैसा महत्व रखने वाला शहर है। यहां कही गई बात भारत में भी सुनी जाती है और दुनिया के अनेक हिस्सों में भी उसका अर्थ निकाला जाता है।
इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में प्रस्तावित संबोधन सामान्य राजनीतिक या सामाजिक कार्यक्रम की सीमा में नहीं देखा जा सकता। यह कार्यक्रम Universal Oneness Celebration के नाम से आयोजित किया जा रहा है और इसके केंद्र में भारतीय संस्कृति, एकता, सेवा, आध्यात्मिकता तथा वैश्विक सद्भाव का संदेश रखा गया है। आयोजकों के अनुसार 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठन इसमें जुड़े हैं और हजारों लोग इसमें भाग लेने की अपेक्षा है।
लेकिन इस कार्यक्रम की चर्चा केवल इसके समर्थकों के कारण नहीं हो रही। इसके समानांतर अमेरिका में विरोध भी सामने आया है। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने सार्वजनिक रूप से कार्यक्रम का विरोध किया है। अमेरिका में कई अंतरधार्मिक और नागरिक अधिकार संगठनों ने भी इसका विरोध किया है। 61 संगठनों द्वारा कार्यक्रम के खिलाफ खुले पत्र का उल्लेख सामने आया है।
यही कारण है कि मोहन भागवत का न्यूयॉर्क दौरा आज केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान, हिंदुत्व, धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद, प्रवासी भारतीय समाज और भारत की वैश्विक छवि को लेकर चल रहे व्यापक विमर्श का हिस्सा बन गया है।
न्यूयॉर्क ही क्यों महत्वपूर्ण है?
दुनिया में अनेक बड़े शहर हैं, लेकिन न्यूयॉर्क का अपना विशेष महत्व है। संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय यहीं है। दुनिया की वित्तीय व्यवस्था, मीडिया, कला, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इसका प्रभाव असाधारण है।
ऐसे शहर में भारतीय सभ्यता और हिंदू दर्शन से जुड़े किसी बड़े कार्यक्रम का होना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
यह बात और महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है क्योंकि भारत आज वह भारत नहीं है जो कुछ दशक पहले वैश्विक राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रहा था। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी आवाज पहले से अधिक प्रभावशाली है और दुनिया भर में भारतीय मूल के लोगों की उपस्थिति भारत की वैश्विक शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
इसलिए जब भारतीय संस्कृति, हिंदू दर्शन या भारतीय सामाजिक चिंतन की चर्चा न्यूयॉर्क जैसे मंच पर होती है, तो वह भारत की सॉफ्ट पावर का भी हिस्सा बनती है।
मोहन भागवत का कार्यक्रम इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
‘Universal Oneness’ का विचार और भारतीय दर्शन
कार्यक्रम का नाम है—Universal Oneness Celebration, अर्थात सार्वभौमिक एकात्मता का उत्सव।
आयोजकों ने इसे “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भारतीय अवधारणा से जोड़ा है—अर्थात पूरी दुनिया एक परिवार है। कार्यक्रम को रक्षाबंधन के अवसर से भी जोड़ा गया है और आयोजकों के अनुसार इसका उद्देश्य समुदायों, पीढ़ियों और देशों के बीच संबंधों को मजबूत करना है।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
क्या भारतीय दर्शन का यह संदेश वास्तव में पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हो सकता है?
उत्तर है—निश्चित रूप से।
भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह रही है कि उसने सत्य को किसी एक मार्ग में सीमित करने की कोशिश नहीं की। उपनिषदों से लेकर बुद्ध, महावीर, गुरु परंपरा और भक्ति आंदोलन तक भारतीय चिंतन में अनेक मार्गों, अनेक दृष्टियों और अनेक आध्यात्मिक अनुभवों के लिए स्थान रहा है।
इसीलिए भारत की सभ्यता को समझने के लिए केवल ‘हिंदू’ शब्द पर्याप्त नहीं है। भारत की सभ्यता एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक अनुभव है, जिसमें अनेक विचारधाराएं, दर्शन, भाषाएं, परंपराएं और धार्मिक धाराएं सहस्राब्दियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं।
यही कारण है कि यदि न्यूयॉर्क के मंच से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात होती है, तो उसका महत्व केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं होना चाहिए।
उसका अर्थ होना चाहिए—
जो हमारे जैसा नहीं है, वह भी हमारे परिवार का हिस्सा है।
लेकिन फिर विरोध क्यों हो रहा है?
यहीं से इस यात्रा का दूसरा पक्ष सामने आता है।
RSS भारत की सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में से एक है। लेकिन उसकी विचारधारा को लेकर लंबे समय से भारत और विदेशों में बहस होती रही है।
इसके समर्थक RSS को राष्ट्र निर्माण, सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक जागरण और हिंदू समाज के संगठन से जोड़कर देखते हैं।
वहीं आलोचक RSS की विचारधारा को भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों के संदर्भ में अधिक बहुसंख्यकवादी मानते हैं। अमेरिका में कार्यक्रम के विरोधियों ने इसी तरह की चिंताओं को सामने रखा है।
न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने भी कार्यक्रम का विरोध करते हुए कहा कि भारत की वह तस्वीर, जिसे उन्होंने अपने परिवार से जाना, एक बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की है। उन्होंने RSS से जुड़ी विचारधारा को अपने दृष्टिकोण से बहिष्कारी बताया। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि निजी कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार शहर प्रशासन के पास संभवतः नहीं है।
यहां लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
किसी कार्यक्रम का विरोध करना और उसे प्रतिबंधित कर देना—दो अलग बातें हैं।
ममदानी को विरोध का अधिकार है। कार्यक्रम के आयोजकों को आयोजन करने का अधिकार है। और कार्यक्रम में शामिल होने या न होने का निर्णय लोगों को स्वयं करने का अधिकार है।
यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती है।
अमेरिकी हिंदू समाज भी एकरूप नहीं है
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि अमेरिका में रहने वाला भारतीय या हिंदू समुदाय कोई एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है।
अमेरिका में ऐसे हिंदू संगठन भी हैं जो RSS और भागवत के कार्यक्रम का समर्थन कर रहे हैं और ऐसे संगठन भी हैं जो इसका विरोध कर रहे हैं।
61 अंतरधार्मिक एवं धर्मनिरपेक्ष संगठनों के विरोध की खबर सामने आई है। इनमें Hindus for Human Rights, Indian American Muslim Council और अन्य संगठन शामिल बताए गए हैं। विरोधियों का कहना है कि RSS सभी हिंदुओं या सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
दूसरी ओर, कार्यक्रम के आयोजकों का कहना है कि इसमें 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठन जुड़े हैं और कार्यक्रम का उद्देश्य साझा विरासत, सेवा, एकता और अंतरधार्मिक संवाद को बढ़ावा देना है।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—
भारतीय मूल के लोगों के बीच भी भारत की पहचान को लेकर अलग-अलग विचार हैं।
यह कोई कमजोरी नहीं है।
वास्तव में यह भारतीय समाज की जटिलता और लोकतांत्रिक प्रकृति को दर्शाता है।
मोहन भागवत के लिए सबसे बड़ी चुनौती
भागवत के सामने इस यात्रा में सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों को संबोधित करना नहीं है।
उनके सामने बड़ी चुनौती है—उन लोगों तक भारतीय विचार की वह तस्वीर पहुंचाना जो RSS को लेकर आशंकित हैं।
यदि भाषण का केंद्रीय संदेश ‘विश्व एक परिवार है’, ‘सभी के प्रति सम्मान’, ‘मानवता’, ‘एकता’ और ‘सामाजिक समरसता’ है, तो स्वाभाविक रूप से दुनिया यह भी पूछेगी कि इस विचार का व्यवहारिक अर्थ क्या है?
क्या इसमें मुसलमान भी समान रूप से शामिल हैं?
क्या ईसाई भी?
क्या बौद्ध, सिख, जैन, यहूदी और अन्य धार्मिक समुदाय भी?
क्या नास्तिक भी?
क्या वे लोग भी जो हिंदुत्व की आलोचना करते हैं?
अगर उत्तर ‘हां’ है, तो यही वह बिंदु है जहां ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का वास्तविक अर्थ दिखाई देगा।
क्योंकि अपने समर्थकों से प्रेम करना सरल है।
अपने आलोचकों को भी सम्मान देना ही वास्तविक उदारता की परीक्षा है।
भारत के लिए इस यात्रा का महत्व
मोहन भागवत की यात्रा को केवल RSS के कार्यक्रम के रूप में देखना शायद इसके व्यापक महत्व को सीमित कर देना होगा।
भारत पिछले वर्षों में अपनी सांस्कृतिक कूटनीति को अधिक महत्व देता आया है।
योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, बौद्ध विरासत, भारतीय संगीत, नृत्य, भोजन और आध्यात्मिक परंपराएं दुनिया में भारत की पहचान का हिस्सा हैं।
भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ केवल बॉलीवुड या योग तक सीमित नहीं है। भारतीय दर्शन में मौजूद विचार—जैसे वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व—आज की दुनिया की अनेक समस्याओं के संदर्भ में प्रासंगिक हो सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन, युद्ध, धार्मिक संघर्ष, मानसिक तनाव, सामाजिक विभाजन और बढ़ती आर्थिक असमानता से जूझ रही दुनिया को यदि कोई सभ्यता सह-अस्तित्व और सामूहिक कल्याण का संदेश देती है, तो उसका महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपनी सभ्यता को केवल अतीत की गौरवगाथा के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के समाधान देने वाली परंपरा के रूप में प्रस्तुत करे।
प्रवासी भारतीयों की भूमिका
मोहन भागवत के न्यूयॉर्क दौरे का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय प्रवासी समाज है।
अमेरिका में रहने वाले भारतीय केवल आर्थिक रूप से सफल प्रवासी नहीं हैं। वे अमेरिकी समाज के विभिन्न क्षेत्रों—प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, शिक्षा, राजनीति, व्यापार, वित्त और संस्कृति—में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उनकी भारत से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान अमेरिका में भारत की छवि को प्रभावित करती है।
इसलिए प्रवासी भारतीयों के बीच भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर होने वाली चर्चा भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि प्रवासी भारतीय अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वासी हैं, लेकिन साथ ही अमेरिकी लोकतंत्र की बहुलतावादी भावना का सम्मान करते हैं, तो यह भारत-अमेरिका संबंधों के लिए सकारात्मक शक्ति बन सकता है।
लेकिन यदि भारतीय पहचान केवल राजनीतिक संघर्ष का विषय बन जाए, तो वही शक्ति विभाजन का कारण भी बन सकती है।
इसलिए न्यूयॉर्क का कार्यक्रम केवल भारत की संस्कृति का प्रदर्शन नहीं है; यह प्रवासी भारतीय समाज की दिशा पर भी प्रश्न खड़ा करता है।
विवेकानंद से भागवत तक—न्यूयॉर्क और अमेरिका में भारतीय विचार की यात्रा
भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक संवाद की चर्चा करते समय स्वामी विवेकानंद का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का परिचय दुनिया के सामने कराया था।
उनका संदेश धार्मिक श्रेष्ठता का संदेश नहीं था।
वह भारत की उस परंपरा का परिचय था जिसमें अलग-अलग धार्मिक मार्गों के अस्तित्व को स्वीकार करने की क्षमता थी।
आज 133 वर्ष बाद न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संबोधन उसी व्यापक भारतीय सांस्कृतिक विमर्श की आधुनिक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है—हालांकि दोनों के ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं।
विवेकानंद के समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
आज भारत एक स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में प्रभावशाली राष्ट्र है।
इसलिए आज भारत से अपेक्षा भी अधिक है।
आज भारत को दुनिया से केवल यह नहीं कहना है कि ‘हमारी संस्कृति महान है।’
बल्कि यह भी दिखाना है कि—
हमारी संस्कृति दुनिया के लिए क्या योगदान दे सकती है?
विरोध को भारत के खिलाफ अभियान मानना भी सही नहीं
कभी-कभी भारत में किसी भारतीय संगठन या नेता के विदेश में विरोध को सीधे भारत विरोध से जोड़ दिया जाता है।
यह दृष्टिकोण भी बहुत सरल निष्कर्ष होगा।
अमेरिका एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक समाज है। वहां किसी संगठन या विचारधारा की आलोचना होना अपने आप में भारत का अपमान नहीं है।
यदि किसी अमेरिकी नागरिक को RSS की विचारधारा से आपत्ति है, तो उसे अपनी बात कहने का अधिकार है।
उसी तरह यदि कोई अमेरिकी हिंदू संगठन RSS का समर्थन करता है, तो उसे भी अपना विचार रखने का अधिकार है।
वास्तविक समस्या तब होगी जब विरोध हिंसा में बदल जाए या किसी पक्ष को अपनी बात कहने से जबरन रोका जाए।
इसलिए इस पूरे विवाद को भारत बनाम अमेरिका के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
यह मूलतः विचार बनाम विचार का प्रश्न है।
RSS के लिए भी यह आत्ममंथन का अवसर
इस कार्यक्रम को केवल आलोचकों का विरोध मानकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा।
यदि अमेरिका में RSS को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं, तो संगठन के लिए यह अवसर है कि वह दुनिया के सामने अपने विचारों को और स्पष्ट करे।
RSS स्वयं को सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है।
ऐसे में विदेशों में उसकी छवि किस प्रकार बन रही है, यह उसके लिए गंभीर विषय होना चाहिए।
यदि संगठन वास्तव में सामाजिक समरसता और ‘एकात्मता’ की बात करता है, तो उसे यह भी दिखाना होगा कि उसका यह विचार भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए किस प्रकार समान रूप से लागू होता है।
विश्वास केवल भाषण से नहीं बनता; व्यवहार से बनता है।
भारत के लिए ‘सॉफ्ट पावर’ की नई संभावना
21वीं सदी में शक्ति की परिभाषा बदल रही है।
सैन्य शक्ति महत्वपूर्ण है।
आर्थिक शक्ति महत्वपूर्ण है।
तकनीकी शक्ति महत्वपूर्ण है।
लेकिन इसके साथ एक और शक्ति तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है—सांस्कृतिक शक्ति।
जिस देश की संस्कृति, जीवन-दर्शन और विचार दुनिया के लोगों को आकर्षित करते हैं, वह बिना किसी दबाव के अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।
भारत के पास इस क्षेत्र में बहुत बड़ी संपदा है।
योग इसका उदाहरण है।
आयुर्वेद इसका उदाहरण है।
बौद्ध दर्शन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा इसका उदाहरण है।
भारतीय संगीत, नृत्य और साहित्य इसका उदाहरण है।
और अब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विचार भी वैश्विक विमर्श में भारत की भूमिका को मजबूत कर सकते हैं।
लेकिन इसके लिए एक शर्त है—
भारत की सांस्कृतिक शक्ति समावेशी दिखाई देनी चाहिए।
न्यूयॉर्क से भारत को क्या संदेश मिल सकता है?
मोहन भागवत का न्यूयॉर्क संबोधन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां से दिया गया संदेश भारत में भी राजनीतिक और सामाजिक बहस को प्रभावित करेगा।
यदि संबोधन में भारतीय सभ्यता, सामाजिक समरसता, युवा शक्ति, परिवार, सेवा, पर्यावरण, विश्व शांति और मानव एकता की बात प्रमुखता से आती है, तो इसे भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन यदि यह मंच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप या सांस्कृतिक श्रेष्ठता के प्रदर्शन में बदल जाता है, तो कार्यक्रम का मूल संदेश कमजोर पड़ सकता है।
इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कितने लोग कार्यक्रम में पहुंचे।
सबसे बड़ा प्रश्न होना चाहिए—
कार्यक्रम के बाद दुनिया भारत के बारे में क्या सोचती है?
विरोध के बीच कार्यक्रम की सफलता का अर्थ क्या है?
कार्यक्रम के प्रति विरोध के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति की खबरें सामने आई हैं। आयोजकों ने भारी रुचि का उल्लेख किया है और 39 अमेरिकी राज्यों से लोगों के आने की बात रिपोर्ट हुई है।
लेकिन भीड़ को सफलता का अकेला पैमाना नहीं माना जा सकता।
किसी भी विचार की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह अपने समर्थकों के बाहर कितने लोगों को संवाद के लिए तैयार करता है।
यदि भागवत का संदेश केवल पहले से सहमत लोगों को उत्साहित करता है, तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा।
लेकिन यदि वह आलोचकों को भी यह सोचने पर मजबूर करता है कि भारतीय सभ्यता और हिंदू दर्शन का एक व्यापक, उदार और समावेशी पक्ष भी है, तो यह यात्रा कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित होगी।
भारत को दुनिया से संवाद करना होगा, दुनिया से लड़ना नहीं
आज भारत वैश्विक मंच पर जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसके लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है—संवाद।
भारत को अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए।
भारत को अपनी सभ्यता की उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखना चाहिए।
भारत को अपनी आध्यात्मिक विरासत की चर्चा करनी चाहिए।
लेकिन साथ ही भारत को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि दूसरे देशों और समाजों के लोगों के पास भारत को लेकर अलग दृष्टिकोण हो सकता है।
उस दृष्टिकोण से असहमति हो सकती है।
लेकिन असहमति का उत्तर संवाद होना चाहिए।
यही भारतीय परंपरा की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है।
अंततः सवाल मोहन भागवत का नहीं, भारत की दिशा का है
मोहन भागवत का न्यूयॉर्क दौरा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
यह RSS के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संगठन अपने शताब्दी वर्ष में वैश्विक संपर्क बढ़ा रहा है।
यह भारतीय प्रवासी समाज के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अपनी भारतीय पहचान और स्थानीय लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन खोज रहा है।
यह अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां भारत और भारतीय मूल के लोगों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
और यह भारत के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया भारत को अब केवल एक विकासशील देश के रूप में नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति और हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता के रूप में देख रही है।
इसलिए न्यूयॉर्क के मंच पर मोहन भागवत के शब्दों की जिम्मेदारी सामान्य भाषण से कहीं अधिक है।
यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात होती है, तो उसमें केवल अपने लोगों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए।
यदि ‘एकात्मता’ की बात होती है, तो उसमें असहमति रखने वालों के लिए भी स्थान होना चाहिए।
यदि ‘भारतीय संस्कृति’ की बात होती है, तो उसमें भारत की विविधता का भी उतना ही सम्मान होना चाहिए।
और यदि ‘विश्व बंधुत्व’ की बात होती है, तो उसका पहला प्रमाण यही होना चाहिए कि विचारों की असहमति के बावजूद हम एक-दूसरे को सुनने और सम्मान देने के लिए तैयार हैं।
निष्कर्ष: न्यूयॉर्क से उठने वाली आवाज भारत की आवाज कैसे बने?
मोहन भागवत का न्यूयॉर्क दौरा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक भारतीय संगठन के प्रमुख ने अमेरिका में भाषण दिया।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भारत को दुनिया के सामने अपनी पहचान परिभाषित करने का अवसर मिल रहा है।
एक ओर आलोचक हैं, जो RSS की विचारधारा को बहुसंख्यकवादी और बहिष्कारी मानते हैं।
दूसरी ओर समर्थक हैं, जो RSS को भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, सामाजिक सेवा और हिंदू समाज के संगठन का प्रतिनिधि मानते हैं।
इन दोनों धारणाओं के बीच न्यूयॉर्क का मंच एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है।
यह परीक्षा केवल मोहन भागवत की नहीं है।
यह परीक्षा RSS की भी है।
यह परीक्षा भारतीय प्रवासी समाज की भी है।
और एक व्यापक अर्थ में यह परीक्षा भारत की वैश्विक सांस्कृतिक छवि की भी है।
भारत यदि दुनिया को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि उसकी सभ्यता का मूल संदेश “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” है, तो उसे अपनी शक्ति के साथ अपनी उदारता भी दिखानी होगी।
भारत की महानता केवल इस बात में नहीं है कि वह अपनी प्राचीन परंपराओं को बचाकर रख सका।
भारत की महानता इस बात में है कि वह हजारों वर्षों की विविधता को अपने भीतर समेटकर भी जीवित रहा।
न्यूयॉर्क से भारत की सबसे प्रभावशाली आवाज वही होगी जो कहे—हम अपनी जड़ों पर गर्व करते हैं, लेकिन हमारी जड़ें हमें दूसरों से नफरत करना नहीं सिखातीं; हम अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वासी हैं, लेकिन दूसरों की पहचान का सम्मान भी करते हैं; हम भारत को महान मानते हैं, लेकिन दुनिया के हर मनुष्य को अपने परिवार का हिस्सा मानने की क्षमता भी रखते हैं।
शायद यही वह बिंदु है जहां ‘हिंदू विचार’ भारतीय विचार बनता है, भारतीय विचार वैश्विक विचार बनता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक संस्कृत वाक्य नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक जीवंत संदेश बन जाता है।
और इस दृष्टि से देखा जाए तो न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संबोधन केवल एक कार्यक्रम नहीं—भारत की सभ्यता अपने बारे में दुनिया से क्या कहना चाहती है, उसका एक महत्वपूर्ण अध्याय है।








