क्या तकनीक ने महाशक्तियों की पुरानी सैन्य बढ़त को कमजोर कर दिया है?

युद्ध हमेशा से ताकत की परीक्षा रहा है। इससे पता चलता है कि किसके पास कितनी सैन्य ताकत है, कौन उसका कितना बेहतर इस्तेमाल कर सकता है और किसके पास लंबे समय तक लड़ने की क्षमता है। लेकिन अब दुनिया के कई संघर्षों में एक नया बदलाव दिखाई दे रहा है। छोटे खिलाड़ी ऐसी कार्रवाई […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 24 अगस्त 2026, 01:08 AM 8 मिनट read
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क्या तकनीक ने महाशक्तियों की पुरानी सैन्य बढ़त को कमजोर कर दिया है?
Photo: UB India News Archive

युद्ध हमेशा से ताकत की परीक्षा रहा है। इससे पता चलता है कि किसके पास कितनी सैन्य ताकत है, कौन उसका कितना बेहतर इस्तेमाल कर सकता है और किसके पास लंबे समय तक लड़ने की क्षमता है। लेकिन अब दुनिया के कई संघर्षों में एक नया बदलाव दिखाई दे रहा है। छोटे खिलाड़ी ऐसी कार्रवाई करने में सक्षम हो रहे हैं, जिससे बड़ी सैन्य शक्तियों को भी गंभीर चुनौती मिल रही है।

हिज्बुल्ला इस्राइल को, यूक्रेन ताकतवर रूस को और ईरान अमेरिका को जिस तरह से चुनौती दे रहा है, उससे युद्ध की बदलती तस्वीर समझी जा सकती है। बड़ी शक्तियों के सामने लक्ष्य बड़ा होता है। उन्हें युद्ध जीतना होता है, उसे खत्म करना होता है और फिर घर लौटना होता है। इसके उलट छोटे खिलाड़ियों के सामने अक्सर लक्ष्य सिर्फ इतना होता है कि वे हार से बच जाएं। यही अंतर अब युद्ध की रणनीति और नतीजों पर असर डाल रहा है।

छोटे खिलाड़ियों को बड़ी ताकतों के सामने बढ़त कैसे मिल रही है?

इस बदलती स्थिति का सबसे बड़ा कारण हथियारों की बदलती तकनीक है। अब किसी हमले के लिए हमेशा विशाल और बेहद महंगे सैन्य तंत्र की जरूरत नहीं होती। छोटे खिलाड़ी भी ऐसे हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं जो अपेक्षाकृत सस्ते होने के बावजूद सटीक हमला करने में सक्षम हैं। ड्रोन और आधुनिक मिसाइलों ने इस बदलाव को और तेज किया है। पहले युद्ध का एक सामान्य नियम माना जाता था कि किसी हथियार को जितनी दूर तक भेजा जाएगा, उसके सटीक होने की संभावना उतनी ही कम होगी।

अब तकनीक ने इस पुराने नियम को काफी हद तक बदल दिया है। बेहतर जानकारी, वास्तविक समय में मिलने वाले आंकड़े और लक्ष्य के अनुसार दिशा बदलने वाली तकनीक ने लंबी दूरी के हमलों को भी अधिक प्रभावी बना दिया है। इसका सीधा फायदा उन छोटे खिलाड़ियों को मिलता है जिनके पास बड़ी सेना या भारी हथियारों का विशाल भंडार नहीं है। वे कम खर्च में ऐसा हमला कर सकते हैं, जिसका जवाब देना बड़ी शक्ति के लिए बहुत महंगा पड़ सकता है।

ईरान ने अमेरिका और इस्राइल को किस तरह चुनौती दी?

ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है। ईरान की सेना अमेरिका की तुलना में काफी छोटी है और लंबे समय से उस पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगे हुए हैं। इसके बावजूद उसने अपेक्षाकृत कम लागत वाले मिसाइल और ड्रोन विकसित किए हैं। इन हथियारों के जरिए वह अमेरिका और इस्राइल के सामने चुनौती खड़ी करने की स्थिति में पहुंचा है। इस संघर्ष में होर्मुज जलडमरूमध्य भी महत्वपूर्ण बन जाता है।

ईरान ने अपनी सेना के अपेक्षाकृत छोटे आकार और भारी नुकसान के बावजूद बड़े पैमाने पर तथा सटीक कार्रवाई करने की क्षमता का इस्तेमाल करते हुए वहां अपनी स्थिति मजबूत करने की तैयारी की। इसी कारण युद्ध केवल मैदान पर सैनिकों की संख्या का मुकाबला नहीं रह गया है। अब सवाल यह भी है कि कौन कम खर्च में कितनी सटीक कार्रवाई कर सकता है और सामने वाले की महंगी सैन्य व्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचा सकता है। यही वह बदलाव है, जिसने बड़ी शक्तियों के लिए युद्ध को पहले के मुकाबले ज्यादा जटिल बना दिया है।

अमेरिका के लिए युद्ध में मुश्किलें क्यों बढ़ीं?

अमेरिका के सामने समस्या केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। इस संघर्ष का असर उसकी सैन्य आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। फारस की खाड़ी में मौजूद अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के लिए जरूरी सामान की आपूर्ति में भी दिक्कतों का जिक्र किया गया है। युद्ध के शुरुआती दिन ईरान की मिसाइलों और ड्रोन ने बहरीन में अमेरिकी आपूर्ति ठिकाने के एक बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया।

इसके बाद अमेरिका को आपूर्ति के लिए डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटिश कमान वाले अड्डे पर अधिक निर्भर होना पड़ा। यह जगह बहरीन से करीब 2,700 मील दूर है। इससे पता चलता है कि किसी छोटे खिलाड़ी का हमला केवल सीधे सैन्य ठिकाने को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं रहता। वह पूरी आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है और बड़ी शक्ति के लिए युद्ध की लागत बढ़ा सकता है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध में सैन्य ताकत के साथ-साथ आपूर्ति, दूरी और खर्च भी बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं।

क्या मिसाइलें 21वीं सदी का सबसे अहम हथियार बन रही हैं?

मिसाइल तकनीक में हो रहा बदलाव इस पूरी तस्वीर को और महत्वपूर्ण बना देता है। ऐसे हथियार विकसित किए जा रहे हैं जो उड़ान के दौरान अपनी दिशा बदल सकते हैं, बेहतर वास्तविक समय की जानकारी के आधार पर आगे बढ़ सकते हैं और ऐसे कोण से हमला कर सकते हैं जिसकी उम्मीद रक्षा करने वाले को न हो। ईरान की फतह मिसाइलों में भी ऐसी क्षमताएं होने की बात कही गई है।

हालांकि, दिए गए विवरण में यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि जॉर्डन के मुवाफ्फक साल्टी एयर बेस पर मौजूद करीब 50 करोड़ डॉलर मूल्य के रडार को मिसाइल ने नष्ट किया या ड्रोन ने। लेकिन इस घटना का महत्व इस बात में है कि एक महंगे रक्षा तंत्र को अपेक्षाकृत कम लागत वाली कार्रवाई से निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि मिसाइलों को 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण हथियारों में गिना जा रहा है। आधुनिक युद्ध में हमला करने वाले के पास अब केवल दूरी और ताकत का विकल्प नहीं है। उसके पास जानकारी, सटीकता, गति और अप्रत्याशित दिशा से हमला करने की क्षमता भी है।

क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस बदलाव को और तेज करेगी?

  • इस बदलते युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई एक और बड़ा बदलाव ला सकती है। यदि एआई के जरिए छोटे समूहों को बेहतर जानकारी, तेज विश्लेषण और अधिक सटीक कार्रवाई करने की क्षमता मिलती है तो बड़ी और छोटी ताकत के बीच का अंतर और कम हो सकता है। चिंता केवल मिसाइल और ड्रोन तक सीमित नहीं है।
  • डिजिटल दुनिया में भी छोटे समूह बड़ी परेशानी खड़ी कर सकते हैं। किसी पुराने सॉफ्टवेयर की कमजोरी का पता लगाकर पानी या बिजली जैसी जरूरी व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसके लिए किसी बड़ी सेना या विशाल सैन्य बजट की जरूरत नहीं होगी।
  • यही भविष्य की सबसे बड़ी चिंता है। युद्ध अब केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रह गया है। जानकारी और तकनीक भी युद्ध का मैदान बन चुकी हैं। बड़ी शक्तियां अभी भी बेहद ताकतवर हैं और उनके पास दुनिया की सबसे उन्नत सैन्य प्रणालियां हैं। लेकिन नए हथियारों और तकनीक ने छोटे खिलाड़ियों को ऐसी क्षमता जरूर दी है, जो पहले उनके पास नहीं थी।
  • यही ताकत के बदलते खेल की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है। ट्रंप का ईरानी नेतृत्व पर गुस्सा और युद्ध को लेकर उनकी बेचैनी भी इसी बदलती स्थिति की ओर संकेत करती है। अब युद्ध में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि किसके पास सबसे ज्यादा ताकत है। असली सवाल यह है कि कौन अपनी ताकत का सबसे सटीक, कम खर्चीला और प्रभावी इस्तेमाल कर सकता है।

हिज्बुल्ला और यूक्रेन ने क्या बदलती तस्वीर दिखाई?

यही बदलाव हिज्बुल्ला और यूक्रेन के संघर्षों में भी दिखाई देता है। हिज्बुल्ला ने अमेरिकी हथियारों से लैस इस्राइली सैन्य व्यवस्था और इस्राइली समुदायों को नुकसान पहुंचाया है। यूक्रेन ने सैन्य ताकत के मामले में अपने से कहीं बड़े रूस को भी गंभीर चुनौती दी है। इन उदाहरणों से यह संकेत मिलता है कि युद्ध में अब केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किस देश के पास कितने सैनिक, टैंक, विमान या महंगे हथियार हैं।

यह भी देखना होगा कि कोई पक्ष उपलब्ध तकनीक और जानकारी का कितना प्रभावी इस्तेमाल कर सकता है। बड़ी ताकत के लिए युद्ध की कीमत लगातार बढ़ सकती है, जबकि छोटे खिलाड़ी सीमित संसाधनों से भी बड़ा असर पैदा कर सकते हैं। इस स्थिति का सबसे अहम पहलू यही है कि छोटे खिलाड़ी युद्ध जीतने के बजाय बड़ी शक्ति को जीतने से रोकने की रणनीति अपना सकते हैं। दूसरी ओर बड़ी शक्ति को निर्णायक जीत चाहिए होती है। यही लक्ष्य का अंतर युद्ध को लंबा और महंगा बना सकता है।

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