बिहार में सम्राट सरकार, प्रशांत किशोर और तेजस्वी यादव के ‘डबल अटैक’ से दबाव में है? मुख्यमंत्री भले सम्राट चौधरी हैं लेकिन जदयू की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। जानकारों का कहना है कि नीतीश शासनकाल की तुलना में मौजूदा सरकार के ‘इकबाल’ में कमी आयी है। मौजूदा सरकार सवालों से घिरी हुई है। आखिर, एनडीए सरकार की शासकीय दक्षता कैसे बहाल होगी? क्या नीतीश कुमार ही बिहार एनडीए को संकट से उबारेंगे? क्या नीतीश सचमुच ‘सुपर सीएम’ हैं? आखिर भाजपा का कोई बड़ा नेता इस मुश्किल घड़ी में बिहार आकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश क्यों नहीं कर रहा?
सम्राट सरकार को डरा हुआ बताने की कोशिश में PK
प्रशांत किशोर चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर लगातार हमलावर हैं। वे यह नैरेटिव सेट कर रहे हैं कि बांकीपुर में हारने के बाद मुख्यमंत्री डर गये हैं और इसी डर की वजह से वे विकास की बातें कर रहे हैं। उन्होंने कहा, जब से बांकीपुर का रिजल्ट आया तब से सम्राट चौधरी एनकाउंटर शब्द बोलना भूल गये हैं। यही वोट की ताकत है। इसकी वजह से मुख्यमंत्री की भाषा बदल गयी।
बिहार की सियासत में जनसुराज का माइंड गेम
पीके के मुताबिक, पहले वे (मुख्यमंत्री) हाफ एनकाउंटर, फुल एनकाउंटर, गमछा का रंग देख कर पकड़ने की बात करते थे। लेकिन अब ये सब छोड़ कर फैक्ट्री, रोजगार मेला और पढ़ाई की बात करने लगे हैं। आपने (जनता) भाजपा के 30 साल पुराने किले को ढहा दिया तो अब सरकार को भी समझ में आ गया कि जनता अपने बच्चों के भविष्य के नाम पर वोट देती है, एनकाउंटर के नाम पर नहीं। अभी जनसुराज माइंड गेम खेलने में भाजपा से आगे है।
प्रशांत किशोर को जवाब क्यों नहीं दे पा रही भाजपा?
भाजपा, प्रशांत किशोर को जवाब क्यों नहीं दे पा रही? अगर यही हाल रहा तो विपक्षी, सम्राट सरकार को किसी रचनात्मक कार्य का क्रेडिट नहीं लेने देंगे। सरकार की किसी भी उपलब्धि पर वे यही कहेंगे, सरकार की मंशा नहीं थी लेकिन विपक्ष के दबाव या डर के कारण उसे यह काम करना पड़ा। यह स्थिति तो किसी भी सरकार की अथॉरिटी (प्राधिकार) के लिए नुकसानदेह है। आखिर सम्राट सरकार के पास इस माइंड गेम को काटने का क्या उपाय है?
NDA सरकार की साख बहाल करने के लिए नीतीश की यात्रा!
कहा जा रहा है कि बिहार में एनडीए सरकार की साख को बहाल करने के लिए ही नीतीश कुमार ने अक्टूबर से यात्रा निकालने की योजना बनायी है। जनता से सीधा संवाद कर के ही कोई सरकार अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता कायम रख सकती है। विरोधी लाख कुप्रचार करें लेकिन अगर जनता साथ है तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला। 2025 के चुनाव में विरोधियों ने नीतीश कुमार के स्वास्थ्य पर सवाल उठा कर उनकी अंतिम पारी का जोरदार नैरेटिव चलाया था। लेकिन जनसमर्थन के बल पर नीतीश कुमार ने विरोधियों को करारा जवाब दिया था।
नीतीश की यात्रा से सम्राट सरकार को फायदा मिलने की संभावना
नीतीश कुमार की प्रस्तावित यात्रा, भाजपा के लिए दोधारी तलवार है। फायदा भी है और नुकसान भी। इस यात्रा से भाजपा के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को ताकत मिल सकती है। जो सामाजिक समीकरण अभी ढीला पड़ रहा है, वो लव-कुश की एकता से मजबूत होगा। कहा जाता है कि नीतीश कुमार (लव) ने इसी एकता को ध्यान में रख कर सम्राट चौधरी (कुश) को मुख्यमंत्री बनने में सहयोग दिया था। नीतीश कुमार की यात्रा से अतिपिछड़ी जातियों में एक बार फिर जोश पैदा होगा, जो सरकार के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं।
नीतीश कुमार की यात्रा का साइड इफेक्ट भी जान लीजिए
लेकिन, नीतीश कुमार की यात्रा का एक असर ये हो सकता है कि लोकप्रियता की दौड़ में जदयू, भाजपा से आगे निकल जाए। यात्रा की सफलता से इस अवधारणा को बल मिलेगा कि नीतीश कुमार सचमुच ‘सुपर सीएम’ हैं। जदयू के कई नेता आज भी मानते हैं कि सिर्फ नीतीश कुमार ही बिहार चला सकते हैं, कोई और नहीं। अगर, ये जनभावना फिर पैदा हुई तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की छवि प्रभावित होगी। करीब 46 साल बाद भाजपा को बिहार में शासन चलने का जो अवसर मिला है, वो निरर्थक हो जाएगा।
भाजपा के बड़े नेता क्यों नहीं आ रहे बिहार?
भाजपा के बड़े नेता बिहार आकर स्थिति को क्यों नहीं संभाल रहे? पहला कारण तो ये है कि नीतीश कुमार के रहते भाजपा के केन्द्रीय नेता सीधे सक्रिय नहीं हो सकते। इससे बिहार एनडीए में गलत संदेश जाएगा। नीतीश कुमार भले राज्यसभा सदस्य बन कर दिल्ली चले गए हैं लेकिन बिहार सरकार के वास्तविक ‘मेंटर’ वही हैं। उन्हीं की नीतियों पर सम्राट सरकार चल रही है। इसलिए, भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व का मानना है कि इस तात्कालिक संकट का समाधान भी वही निकालेंगे। अभी फायदा नुकसान सोचने का समय नहीं, सबसे ज्यादा जरूरी है सम्राट सरकार के ‘प्रताप’ को कायम रखना।







