सरकार यूसीसी को राज्यों के जरिए क्यों लाना चाहती है?

संविधान पर चर्चा के दौरान कल यानी 17 दिसंबर को राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समान नागरिक संहिता से लेकर अपना स्पष्ट नजरिया रखा. उन्होंने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि अनुच्छेद 44 के तहत, हमारा संविधान समान नागरिक संहिता की बात करता है. यह देश में वास्तविकता नहीं बन पाई […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 19 दिसंबर 2024, 06:49 AM 13 मिनट read
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सरकार यूसीसी को राज्यों के जरिए क्यों लाना चाहती है?
Photo: UB India News Archive

संविधान पर चर्चा के दौरान कल यानी 17 दिसंबर को राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समान नागरिक संहिता से लेकर अपना स्पष्ट नजरिया रखा. उन्होंने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि अनुच्छेद 44 के तहत, हमारा संविधान समान नागरिक संहिता की बात करता है. यह देश में वास्तविकता नहीं बन पाई क्योंकि भारत के पहले प्रधानमंत्री (जवाहरलाल नेहरू) मुस्लिम पर्सनल लॉ ले आए थे.

शाह ने कहा कि मैं कांग्रेस से पूछता हूं कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में, क्या सभी समुदायों के लिए एक कानून नहीं होना चाहिए? उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस यूसीसी नहीं ला सकती क्योंकि वह तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर नहीं उठ सकती. हमारी सरकार ने उत्तराखंड में यूसीसी को लागू किया है. ठीक उसी तरह हम बीजेपी शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता को लागू करेंगे.

केंद्रीय मंत्री अमित शाह के इस बयान के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का दौर तेज हो गया कि क्या यूसीसी को एक केंद्रीय कानून के रूप में लागू करने की योजना को हटा दिया गया है?

इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि केंद्रीय कानून बनाने के बजाए राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात क्यों कर रहे हैं अमित शाह?

विधानसभा के रास्ते आगे बढ़ने की प्लानिंग

साल 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था कि अगर राज्य में उनकी सरकार आती है तो वो वहां यूसीसी को लागू करेंगे. चुनाव के बाद वादे के मुताबिक सीएम ने यूसीसी के लिए पहले पांच सदस्यीय एक कमेटी बनाई और उसकी सिफारिशों के आधार पर यूसीसी को लागू किया.

इसके अलावा असम में भी बीजेपी सरकार इस बिल को विधानसभा में लाने की तैयारी कर रही है. कुछ दिन पहले ही यहां के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने का एलान किया था. इसके अलावा राजस्थान सरकार भी अपने राज्य में यूसीसी लाने का एलान कर चुकी है.

वर्तमान में यूपी, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम, गोवा, गुजरात, ओडिशा, त्रिपुरा, मणिपुर, छत्तीसगढ़,  महाराष्ट्र और अरुणांचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार है. इनमें से गोवा में पहले से ही यह कानून लागू है. ऐसे में अगर भारतीय जनता पार्टी अपने राज्यों में भी अगर यूसीसी लागू करने में कामयाब होती है तो देश के बड़े हिस्से में यूसीसी लागू हो जाएगा.

यूसीसी के बारे में संविधान में क्या कहा गया है

भारतीय संविधान में यूसीसी के बारे में धारा 44 में बताया गया है, जो अनुच्छेद 44 (Directive Principles of State Policy) के तहत आता है. यह अनुच्छेद कहता है: “राज्य नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा.”

यह धारा भारतीय राज्य को प्रेरित करती है कि वह अपने नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करे, लेकिन यह केवल एक कानून लागू करने की सलाह है, न कि एक बाध्यकारी आदेश. इसका मतलब यह है कि राज्य सरकारें इसे लागू करने के लिए मजबूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें इसे अपनाने का निर्णय लेना होता है.

केंद्रीय स्तर के बजाय राज्य-स्तरीय पहल क्यों, 3 कारण 

1. संविधान में राज्यों को मिली स्वायत्तता

चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (सीएनएलयू), पटना के कुलपति और कानूनी विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा का मानना है कि राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे यूसीसी को लागू करें. उदाहरण के लिए, अगर उत्तराखंड राज्य चाहता है कि वह अपने राज्य में यूसीसी लागू करे, तो उसे यह अधिकार है. वह अपनी स्थानीय परिस्थितियों, यानी राज्य के लोगों की जरूरतों और समाज की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय ले सकता है.

आसान शब्दों में कहें तो संविधान ने राज्य सरकारों को समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार दिया है, लेकिन यह कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है. यदि कोई राज्य इसे लागू करना चाहता है, तो उसे अपनी स्थानीय स्थिति और समाज के हालात को देखते हुए यह कदम उठाने का अधिकार है.

फैजान मुस्तफा ने एक न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा, “अगर उत्तराखंड जैसी राज्य सरकार यूसीसी लागू करने का निर्णय लेती है, तो यह राज्य के भीतर लागू होगा, लेकिन इसे पूरे देश में लागू करना अलग बात है.

राज्यों को अपनी विधानसभाओं में ऐसे कानून बनाने का अधिकार है, जो उनके क्षेत्राधिकार में आते हैं.” उनके अनुसार, राज्यों के पास इस मामले में एक तरह से “पार्शल स्वायत्तता (partial autonomy)” है, और यह सरकारों के लिए एक उपयुक्त तरीका हो सकता है कि वे यूसीसी को पहले बीजेपी शासित  सरकार में धीरे-धीरे लागू करें, और फिर देखे कि इसका प्रभाव क्या होता है.

2. सामाजिक और धार्मिक विविधता का ध्यान रखना

भारत की विविधतापूर्ण सामाजिक और धार्मिक संरचना को ध्यान में रखते हुए, समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने की प्रक्रिया हमेशा ही एक संवेदनशील मुद्दा रहा है. खासकर मुस्लिम समुदाय में इसको लेकर गहरे विरोध की भावनाएं हैं. फैजान मुस्तफा का यह मानना है कि यूसीसी में धार्मिक पहलुओं को पहले नहीं छुआ जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, अगर यूसीसी के तहत किसी धर्म से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है, तो इसे पहले उस समुदाय के भीतर विचार-विमर्श करके लागू करना चाहिए. इसका मतलब है कि धार्मिक सुधार या विधायिका में कोई भी बदलाव उस समाज के भीतर एक व्यापक सहमति से किया जाए.

अमित शाह के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार नहीं चाहती कि यूसीसी को एक साथ पूरे देश में लागू किया जाए, क्योंकि इससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है. इसलिए राज्यों को यह अधिकार देना कि वे अपनी स्थिति के अनुसार इस कानून को लागू करें, यह कहीं न कहीं स्थानीय समुदायों के बीच सहमति बनाने में सहायक हो सकता है.

3. हिंदू लॉ कोड 1941 का संदर्भ

भारत में एक समान नागरिक संहिता के लागू होने के लिए जब भी कोई प्रस्ताव आता है, तो अतीत में हुए प्रयासों की यादें ताजा हो जाती हैं. साल 1941 में, हिंदू लॉ कोड के रूप में हिंदू पर्सनल लॉ में कुछ सुधारों का प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें महिलाओं के संपत्ति अधिकार और विधवा महिलाओं के अधिकारों को बेहतर बनाने का प्रयास किया गया था. हालांकि, उस वक्त यह कानून पारित नहीं हो सका, क्योंकि इसे हिंदू समाज ने अपनी परंपराओं और संस्कृति के खिलाफ मान था. लेकिन उसी वक्त यह समझा जा चुका था कि समाज के भीतर बिना सहमति के ऐसे सुधार लागू करना संभव नहीं है.

यह इतिहास हमें यह समझने में मदद करता है कि समान नागरिक संहिता का सवाल एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, जिसे किसी भी समाज में जल्दबाजी में लागू नहीं किया जा सकता.

राज्यों में लागू यूसीसी से क्या होगा फायदा?

अमित शाह के बयान में जो तर्क दिया गया है, वह यह है कि अगर यूसीसी पहले कुछ राज्यों में लागू होता है और उसके परिणाम सकारात्मक होते हैं, तो इसे बाकी देश में भी लागू किया जा सकता है. फैजान मुस्तफा का भी यही मानना है कि कुछ राज्यों में यूसीसी के प्रभावी रूप से लागू होने के बाद, इसके प्रभावों का अध्ययन किया जा सकता है और अगर यह सफलता प्राप्त करता है, तो इसे राष्ट्रव्यापी लागू करने पर विचार किया जा सकता है.

इसके अलावा, यह तरीका राज्यों को अपने स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में फैसला लेने की स्वतंत्रता भी देता है. अगर कोई राज्य अपनी सामाजिक संरचना और धार्मिक संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए यूसीसी लागू करता है, तो इससे उसे बेहतर परिणाम मिल सकते हैं, और अगर इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की जरूरत महसूस होती है, तो इसके लिए एक मजबूत आधार तैयार होगा.

यूसीसी लागू करना क्या भारत में संभव है?

भारत एक ऐसा देश है जहां अलग अलग धर्म, जाति और समुदाय के लोग एक साथ रहे हैं. ऐसे विविध और विशाल देश में समान नागरिक क़ानून को एकीकृत करना बेहद मुश्किल है. उदाहरण के तौर हिंदू समाज को ही ले लीजिये. इस धर्म के लोग भले ही व्यक्तिगत क़ानूनों का पालन करते हैं लेकिन वो अलग अलग राज्यों में अलग समुदायों की प्रथाओं और रीति-रिवाजों को भी मानते हैं.

वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ भी एक समान नहीं हैं. उदाहरण के लिए बोहरा मुसलमान को ही ले लीजिये इस समुदाय के लोग उत्तराधिकार के मामले में हिंदू क़ानूनों के सिद्धांतों का पालन करते हैं. इतना ही नहीं संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में अलग अलग राज्यों में अलग क़ानून हैं.

पूर्वोत्तर भारत के ईसाई बहुल राज्यों में (नागालैंड,मिज़ोरम) में पर्सनल लॉ है. इस राज्यों में लोग अपनी प्रथाओं का पालन करते हैं न कि धर्म का. विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के फ़ेलो आलोक प्रसन्ना कुमार ने एबीपी से बात करते हुए कहा कि, ” सबसे बड़ सवाल यही है कि यूसीसी को लागू करते वक्त आप कौन-सा सिद्धांत लागू करेंगे- हिंदू, मुस्लिम या फिर ईसाई?”

उन्होंने कहा कि यूसीसी को कुछ बुनियादी सवालों का समाधान करना होगा, जैसे कि देश में विवाह और तलाक के मानदंड क्या होंगे? गोद लेने की प्रक्रिया और उसके परिणाम क्या होंगे? तलाक के मामलों में गुज़ारा भत्ता और संपत्ति के बंटवारे का अधिकार क्या होगा? अंत में, संपत्ति के उत्तराधिकार के नियम कैसे होंगे?

समान नागरिक संहिता क्या है?

भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का जिक्र है. इसमें कहा गया है कि भारत के पूरे क्षेत्र में देश के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास किया जाएगा. इस कोड का आशय सामाजिक मसलों से संबंधित कानून से है जो शादी, तलाक, भरण-पोषण, बच्चा गोद लेने और विरासत आदि के संबंध में सभी समुदायों के लिए समान रूप से लागू होगा.

क्या उत्तराखंड में बीजेपी का यूसीसी अधूरा है?

उत्तराखंड भले ही गोवा के बाद यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बन गया है लेकिन, यहां यह कानून आदिवासी समुदायों को बाहर रखते हुए लागू किया गया है. आदिवासी समुदायों को इसमें शामिल न करने का कारण उनकी संस्कृति, परंपरा और स्वायत्तता की सुरक्षा है. हालांकि, यह कदम कुछ लोगों द्वारा अधूरा और विवादास्पद माना जा सकता है, क्योंकि समाज के सभी वर्गों को समान कानूनी अधिकार मिलना चाहिए.

दरअसल उत्तराखंड में आदिवासी समुदाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और उनकी संस्कृति, परंपराएं और जीवनशैली दूसरों से अलग होती है. आदिवासी समुदायों के लिए पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक कानूनों का पालन किया जाता है, जो अक्सर राज्य के सामान्य नागरिक कानूनों से अलग होते हैं. ऐसे में आदिवासी समुदाय की विशिष्टताओं और परंपराओं को ध्यान में रखते हुए, यूसीसी के तहत उन्हें पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया है.

आदिवासी समुदायों के बीच अक्सर पारंपरिक विवाह, भूमि अधिकार, और अन्य सामाजिक मामलों में स्वायत्तता होती है, और इन मामलों में बाहरी हस्तक्षेप से उनकी पहचान और परंपराओं को खतरा हो सकता है.  इसलिए, राज्य सरकार ने आदिवासी समुदाय के मामलों को यूसीसी से बाहर रखने का फैसला लिया है.

इसके नियमों में एक प्रावधान होगा जिसके तहत सूबे में आदिवासी समुदाय का कोई सदस्य सेल्फ डिक्लरेशन के जरिये यूसीसी के दायरे में आने का विकल्प चुन सकता है.

‘कॉमन’ और ‘यूनिफॉर्म’ का मतलब क्या है?

कानून विशेषज्ञ प्रोफेसर फैजान मुस्तफा ने मीडिया से बातचीत करते हुए यूसीसी की बारीकिया बताते हुए कहा कि ”कॉमन” का मतलब होगा कि सबके लिए ‘समान’ हो. ‘यूनिफॉर्म’ का मतलब यह है कि जो एक से लोग हैं, उनके लिए एक सा कानून हो.”

उन्होंने कहा कि समानता का जो अधिकार है वह यह  नहीं कहता के पूरे देश में एक जैसे कानून होने चाहिये, वो कहता है कि जो पसंद हैं, उनके साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए. यानी जो एक से लोग हैं, उनके लिए एक सा कानून हो, यानी अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार की बात करता है, वो यह कहता है कि एक वर्ग के अंदर जितने लोग एक समान हैं, उनके ऊपर एक कानून हो.”

मुस्तफा ने उदाहरण देते हुए समझाया कि ”अगर प्रोफेसर है तो प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर एक नहीं होंगे. वो अलग-अलग हैं. दोनों की सैलरी बराबर नहीं होगी. प्रोफेसर बहुत कम पढ़ाएगा और असिस्टेंट प्रोफेसर बहुत ज्यादा लेकिन सैलरी प्रोफेसर की ज्यादा होगी क्योंकि प्रोफेसर का एक वर्ग है, असिस्टेंट प्रोफेसर का एक दूसरा वर्ग है… जो अलग हैं, उनके लिए अलग कानून होना, समानता के अधिकार का हिस्सा है, जो एक से हैं, उनके लिए एक कानून.”

फैजान आगे कहते हैं कि, ”कॉमन सिविल कोड अगर शब्द होता तो फिर यह सबके लिए एक कानून हो जाता लेकिन क्योंकि इसमें ‘यूनिफॉर्म’ शब्द भी आता है तो जिसका मतलब है कि क्लासिफिकेशन की गुंजाइश है कि उसमें अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कानून हो सकते हैं.”

सिविल का मतलब

वकील आनंद यादव के अनुसार “सिविल” का मतलब है व्यक्तिगत अधिकारों और दावों से जुड़ा हुआ मामला. जब कोई व्यक्ति दूसरे से पैसे का दावा करता है या किसी अन्य व्यक्तिगत विवाद का समाधान चाहता है, तो उसे सिविल लॉ के तहत देखा जाता है. उदाहरण के तौर पर, अगर आपने मुझसे पैसे उधार लिए और लौटाये नहीं, तो यह एक सिविल मामला होगा, जिसे कोर्ट में हल किया जाएगा. सिविल मामलों में आमतौर पर जेल नहीं होती, बल्कि मुआवजा या कंपनसेशन दिया जाता है.

कोड का मतलब

“कोड” का मतलब यह नहीं है कि एक ही कानून हो, बल्कि यह एक समूह या संग्रह होता है जिसमें कई अलग-अलग कानून होते हैं. उदाहरण के लिए, इंडियन पीनल कोड (IPC) एक क्रिमिनल कोड है, जिसमें मर्डर, डकैती जैसी अपराधों से संबंधित कानून होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारे क्रिमिनल कानून एक ही जगह होते हैं. अलग-अलग कानून एक साथ मिलकर एक कोड बना सकते हैं, जैसे हिंदू कोड बिल, जिसमें हिंदू विवाह, गार्जियनशिप और गोद लेने से जुड़े अलग-अलग कानून होते हैं.

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