संसद के शीतकालीन सत्र में अब चर्चा संविधान से हटकर अंबेडकर के अपमान और मुसलमानों के आरक्षण के मुद्दे पर केंद्रित होती दिख रही है. बीजेपी की ओर से मुसलमानों को आरक्षण देने की मंशा पर कांग्रेस को जमकर घेरा जा रहा है. कांग्रेस की सरकारों के समय मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए थे, बीजेपी इसे ही मुद्दा बना रही है. इस पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई बीजेपी नेता इस मुद्दे को चुनावी रैलियों में उठाते रहे हैं. इस लेख में हम आपको बताएंगे कि मुस्लिम आरक्षण के लिए कांग्रेस की ओर से अब तक क्या-क्या कोशिशें की गई हैं.
कांग्रेस की सरकारों में मुसलमानों को आरक्षण
यह बात 1993-1994 की है, जब आंध्र प्रदेश विभाजित नहीं हुआ था और तेलंगाना उसी का हिस्सा था. उस समय राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके मुख्यमंत्री के. विजय भास्कर रेड्डी थे. तत्कालीन सीएम ने एक अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया, जिसके बाद इस आयोग की रिपोर्ट पर मुसलमानों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐलान किया गया. इस आदेश में 14 अन्य जातियों को भी शामिल किया गया था. हालांकि, यह आरक्षण नीति राज्य में लागू नहीं हो सकी क्योंकि कांग्रेस 1994 का चुनाव हार गई और फिर 1999 में हुए विधानसभा चुनाव में भी वापसी नहीं कर सकी.
साल 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की और मुख्यमंत्री बने वाईएस राजशेखर रेड्डी. कांग्रेस ने चुनाव में ही मुसलमानों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया था और सरकार में आते ही इसे लागू भी कर दिया. राज्य सरकार के इस कदम का केंद्र में उस समय सत्ता पर काबिज कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन यूपीए का भी पूरा समर्थन था.
हालांकि, राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ कई लोग हाईकोर्ट पहुंच गए. अदालत ने आदेश दिया कि आरक्षण को 4 प्रतिशत तक सीमित किया जाए क्योंकि यह 50 प्रतिशत तय सीमा को पार कर गया था. इसके पक्ष में तर्क देने वालों का कहना था कि यह आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि पिछड़े वर्गों के लिए दिया गया था. सच्चाई यह है कि इसमें पूरे मुस्लिम समुदाय को शामिल नहीं किया गया था और 50 प्रतिशत की लिमिट को पार किए बिना आरक्षण अलग से दिया गया था.
आंध्र प्रदेश में उस समय विपक्ष की भूमिका निभा रही तेलुगू देसम पार्टी ने कांग्रेस सरकार के उस फैसले का विरोध किया. पार्टी की दलील थी कि धर्म के आधार पर आरक्षण गैर-कानूनी है और इसका असर एससी-एसटी समुदाय और अन्य पिछड़ी जातियों पर पड़ेगा.
साल 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए मुसलमानों को मिले 4 प्रतिशत आरक्षण पर रोक लगा दी. हालांकि, इस आदेश में उन 14 जातियों को आरक्षण जारी रखा गया, जिन्हें मुसलमानों के साथ ही आरक्षण मिला था. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया था, और मामला अभी तक लंबित है.
मुसलमानों के आरक्षण पर कांग्रेस का रुख
साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में पूरे देश में मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा किया था. इस आरक्षण को लागू करने के लिए ओबीसी को मिल रहे 27 प्रतिशत कोटे में एक नई श्रेणी बनाने की योजना थी.
घोषणापत्र में लिखा था, “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह से अटल है. लोकसेवाओं में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को काफी हद तक बढ़ाया गया है और सरकार उनके कल्याण के लिए हमेशा कार्यरत रही है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का रास्ता खोजा है. हम इस नीति को पूरे देश में लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”
इससे पहले, साल 2004 में यूपीए सरकार ने धार्मिक-भाषाई अल्पसंख्यक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया था, जिसे रंगनाथ मिश्रा कमीशन भी कहा जाता है. इस आयोग को धार्मिक और भाषाई आधार पर अल्पसंख्यकों के बीच सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग का अध्ययन करना था. रंगनाथ मिश्रा आयोग ने मुसलमानों को 10 प्रतिशत और अन्य अल्पसंख्यकों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की थी. इसके लिए ओबीसी कोटा के भीतर एक उप-कोटा लागू करने का भी सुझाव दिया गया था.
फिर यूपीए सरकार ने क्या किया?
साल 2011 में यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग द्वारा ओबीसी कोटे के तहत 8.4 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें 6 प्रतिशत मुसलमानों को देने की बात थी. यह प्रस्ताव रंगनाथ आयोग की सिफारिशों के आधार पर था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 4.5 प्रतिशत कर दिया गया, जिसके पीछे मंडल आयोग की सिफारिशों को आधार बनाया गया.
उत्तर प्रदेश में साल 2012 में विधानसभा चुनाव होने थे. यूपीए सरकार ने 27 प्रतिशत ओबीसी कोटे के तहत 4.5 प्रतिशत आरक्षण लागू करके मुसलमानों को आरक्षण देने का ऐलान किया. यह एक चुनावी रणनीति थी ताकि यूपी में मुसलमानों के वोट बटोरे जा सकें. इस घोषणा के तहत मुसलमानों की करीब 24 जातियों को आरक्षण देने का वादा किया गया था.
दरअसल, इसके पीछे कांग्रेस की बड़ी उम्मीद भी थी. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं. पार्टी को लगा कि इस ऐलान से यूपी विधानसभा में अच्छी-खासी सीटें मिल सकती हैं. चुनाव के दौरान की गई इस घोषणा पर चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया और चुनाव होने तक इस पर रोक लगा दी.
सलमान खुर्शीद का विवाद
यूपीए सरकार में कानून मंत्री रहे सलमान खुर्शीद ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया. यूपी चुनाव के दौरान उन्होंने ऐलान किया कि यदि पार्टी यूपी की सत्ता में वापस लौटी, तो पिछड़े मुसलमानों को 9 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जाएगा. चुनाव आयोग ने सलमान खुर्शीद पर चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन के कारण प्रचार करने से रोक लगा दी.
हालांकि, सलमान खुर्शीद यहीं नहीं रुके. उन्होंने इस कार्रवाई के खिलाफ चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून मंत्री पर कैसे प्रतिबंध लगाया जा सकता है. नतीजा यह रहा कि तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को पत्र लिखकर शिकायत कर दी. राष्ट्रपति ने इस पत्र को पीएम मनमोहन सिंह के पास भेज दिया.
सलमान खुर्शीद के सुर ठंडे पड़ गए और बाद में उन्होंने कहा कि यह मामला बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और वह अपने बयान को वापस लेते हैं. उन्होंने वाईएस कुरैशी से कहा कि वह चुनाव आयोग का सम्मान करते हैं और इस तरह की स्थिति दोबारा न होने का ध्यान रखेंगे. चुनाव आयोग ने भी बयान जारी करके सलमान खुर्शीद के खिलाफ किसी भी तरह की आगे की कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया.
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का निर्णय
साल 2012 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मुसलमानों को दिए गए 4.5 प्रतिशत आरक्षण को खत्म कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि यह आरक्षण पूरी तरह से धार्मिक आधार पर था. राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन वहां भी उसे हार मिली.
अब कर्नाटक में क्या हुआ
साल 2023 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में राज्य की बीजेपी सरकार ने मुस्लिमों को दिए जा रहे 4 फीसदी आरक्षण को खत्म करके सामान्य कैटगरी में शामिल कर दिया. जहां पर 10 फीसदी आरक्षण आर्थिक आधार पर लागू है. अब वहां पर कांग्रेस की सरकार है और बीते महीने ही मुसलमानों के लिए 4 फीसदी वाला आरक्षण फिर से लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है. बीजेपी इसका खुलकर विरोध कर रही है.
कर्नाटक में सरकारी नौकरियों और शिक्षा में मुसलमानों के लिए सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन आधारित आरक्षण आमतौर पर एचडी देवगौड़ा के सीएम रहते शुरू किया था. हालांकि, उस समय जनता दल सरकार के बनाए गए “2B” श्रेणी के मुसलमानों के लिए यह फैसला जब मैसूर रियासत के शासन के समय किए गए सर्वे का आधार था.
बीजेपी कांग्रेस पर पूरी तरह से हमलावर
गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को कांग्रेस पर “आरक्षण विरोधी” होने का आरोप लगाया और कहा कि वह ओबीसी के कल्याण के पक्ष में कभी नहीं रही है.और मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए 50% कोटा सीमा बढ़ाने की वकालत कर रही है. शाह ने कहा, “आज, मैं आपको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस वास्तव में आरक्षण विरोधी है. उसकी शब्द और कार्य पूरी तरह से विरोधाभासी हैं. साल 1995 में, काका साहेब कालेलकर आयोग का गठन ओबीसी को आरक्षण देने के लिए किया गया था. उसकी रिपोर्ट कहाँ है? इसे भुला दिया गया क्योंकि ओबीसी को आरक्षण मिल जाता.
शाह ने आगे कहा,’कोई भी रिपोर्ट जो आती है, उसे कैबिनेट के सामने पेश होना होता है, लेकिन इसे संसद में लाने के बजाय, इसे अभिलेखागार में रखा गया. यदि काका साहेब कालेलकर की रिपोर्ट को स्वीकार की गई होती, तो 1980 का मंडल आयोग रिपोर्ट की जरूरत नहीं थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी घेर चुके हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान में एक चुनावी में कहा था कि 2004 में सत्ता संभालने के बाद कांग्रेस सरकार की पहली प्राथमिकताओं में से एक “SC और ST के लिए आरक्षण को कम करना” और इसे अल्पसंख्यकों को देना था.
पीएम मोदी ने कहा’ यह एक पायलट परियोजना थी जिसे कांग्रेस पूरे देश में आजमाना चाहती थी. 2004 से 2010 के बीच, कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में चार बार मुस्लिम आरक्षण लागू करने की कोशिश की लेकिन कानूनी बाधाओं और सुप्रीम कोर्ट की जागरुकता की वजह इसे पूरा नहीं कर सकी’.
‘बीजेपी मौजूद है धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं’
झारखंड विधानसभा चुनावों के दौरान, अमित शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए दावा किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण तब तक लागू नहीं होगा जब तक बीजेपी मौजूद है. मंगलवार को संसद में भी अमित शाह ने इस बयान को दोहराया है.
कैसे शुरु हुई बहस
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी बार-बार सुप्रीम कोर्ट से निर्धारित 50% से अधिक आरक्षण बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं और बीजेपी उनकी मंशा पर सवाल उठा रही है.








