केंद्र और चुनाव आयोग ने इलेक्शन नियमों में बड़ा बदलाव किया है। इसके मुताबिक अब पोलिंगबूथ के सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक नहीं होंगे। कांग्रेस ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई है। पार्टी का कहना है कि इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होगी। कांग्रेस ने इस फैसले को चुनाव आयोग के नए नियमों को कोर्ट में चुनौती देने का फैसला भी किया है। ये नियम चुनाव से जुड़े दस्तावेजों और रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक करने से संबंधित हैं। उधर, चुनाव आयोग ने कहा कि सुरक्षा कारणों से यह कदम उठाया गया है।
‘इलेक्शन प्रक्रिया की पारदर्शिता को कम कर रहा EC’
कांग्रेस का कहना है कि इलेक्शन कमीशन चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता कम कर रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने इस संबंध में एक ट्वीट किया। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में भारत के चुनाव आयोग द्वारा मैनेज किए जाने वाले चुनावी प्रक्रिया में तेजी से कम होती सत्यनिष्ठा से संबंधित हमारे दावों का जो सबसे स्पष्ट प्रमाण सामने आया है, वह यही है। पारदर्शिता और खुलापन भ्रष्टाचार और अनैतिक कार्यों को उजागर करने और उन्हें खत्म करने में सबसे अधिक मददगार होते हैं और जानकारी इस प्रक्रिया में विश्वास बहाल करती है।
वोटिंग नियमों में बदलाव को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मोदी सरकार ने चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता पर हमला किया है।
रविवार सुबह X पर पोस्ट में उन्होंने कहा- पहले मोदी सरकार ने CJI को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल से हटा दिया था और अब वे चुनावी जानकारी को जनता से छिपाना चाह रहे हैं। यह सरकार की सोची-समझी साजिश है।
जब भी कांग्रेस ने इलेक्शन कमीशन को वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने और EVM में ट्रांसपेरेंसी के बारे में लिखा, तो ECI ने अपमानजनक लहजे में जवाब दिया और हमारी शिकायतों को भी स्वीकार नहीं किया।
दरअसल, केंद्र सरकार ने 20 दिसंबर को पोलिंग स्टेशन के CCTV, वेबकास्टिंग फुटेज और उम्मीदवारों की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे कुछ इलेक्ट्रॉनिक डॉक्यूमेंट्स को पब्लिक करने से रोकने के लिए चुनाव नियमों में बदलाव किया था।
अधिकारियों ने बताया कि AI के इस्तेमाल से पोलिंग स्टेशन के CCTV फुटेज से छेड़छाड़ करके फेक नरेटिव फैलाया जा सकता है। बदलाव के बाद भी ये कैंडिडेट्स के लिए उपलब्ध रहेंगे। अन्य लोग इसे लेने के लिए कोर्ट जा सकते हैं।
जयराम रमेश ने फैसले पर उठाए सवाल
जयराम रमेश ने कहा कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस तर्क पर सहमति व्यक्त करते हुए चुनाव आयोग को सभी जानकारी साझा करने का निर्देश दिया। ऐसा जनता के साथ करना कानूनी रूप से आवश्यक भी है। लेकिन चुनाव आयोग फैसले का अनुपालन करने के बजाय, जो साझा किया जा सकता है उसकी लिस्ट को कम करने के लिए कानून में संशोधन करने में जल्दबाजी करता है। चुनाव आयोग पारदर्शिता से इतना डरता क्यों है? आयोग के इस कदम को जल्द ही कानूनी चुनौती दी जाएगी।
चुनाव आयोग (EC) की सिफारिश पर कानून मंत्रालय ने 20 दिसंबर को द कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल- 1961 के नियम 93(2)(A) में बदलाव किया है। नियम 93 कहता है- “चुनाव से जुड़े सभी दस्तावेज पब्लिकली उपलब्ध रहेंगे।” इसे बदलकर “चुनाव से जुड़े सभी दस्तावेज ‘नियमानुसार’ पब्लिकली उपलब्ध रहेंगे” कर दिया गया है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक केस में हरियाणा विधानसभा चुनाव से जुड़े दस्तावेज याचिकाकर्ता से साझा करने का निर्देश दिया था। इसमें CCTV फुटेज को भी नियम 93(2) के तहत माना गया था। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा था कि इस नियम में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल नहीं है। इस अस्पष्टता को दूर करने के लिए नियम में बदलाव किया गया है।
EC बोला- इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पब्लिक करने का नियम नहीं EC ने बताया कि नामांकन फॉर्म, चुनाव एजेंटों की नियुक्ति, चुनाव रिजल्ट और इलेक्शन अकाउंट स्टेटमेंट जैसे दस्तावेजों का उल्लेख कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल में किया गया है। आचार संहिता के दौरान उम्मीदवारों के CCTV फुटेज, वेबकास्टिंग फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज इसके दायरे में नहीं आते हैं।
EC के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पोलिंग स्टेशन की CCTV कवरेज और वेबकास्टिंग कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल के तहत नहीं की जाती, बल्कि यह ट्रांसपेरेंसी के लिए होती है।
वहीं, आयोग के एक अधिकारी ने कहा कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां नियमों का हवाला देकर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मांगे गए। संशोधन यह सुनिश्चित करता है कि नियमों में बताए गए कागजात ही सार्वजनिक हों। अन्य दस्तावेज जिनका नियमों में जिक्र नहीं है, उसे पब्लिक करने की अनुमति न हो।
ऐसे शुरू हुआ पूरा मामला
मौजूदा नियमों में चुनाव आयोग के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि वो ये सब सार्वजनिक करे। कुछ रिकॉर्ड कोर्ट के आदेश पर सार्वजनिक किए जा सकते हैं। शुक्रवार को इलेक्शन कमीशन ने नियमों में संशोधन किया। इस संशोधन में सेक्शन 93 के सब-सेक्शन (2) के खंड (a) में ‘पेपर्स’ शब्द के बाद जोड़ा गया है। इसका मतलब है कि सिर्फ वही दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सार्वजनिक होंगे जो नियमों में दिए गए हैं। CCTV फुटेज और वीडियोग्राफी इनमें शामिल नहीं है।
चुनाव आयोग ने नियमों में किया बदलाव
चुनाव आयोग के सूत्रों ने इस बदलाव का बचाव किया है। उनका कहना है कि CCTV फुटेज सार्वजनिक करने से गड़बड़ी हो सकती है और मतदाताओं की सुरक्षा को खतरा है। एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी ने कहा कि CCTV फुटेज शेयर करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, खासकर जम्मू-कश्मीर, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों जैसे संवेदनशील इलाकों में जहां गोपनीयता महत्वपूर्ण है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए मतदाताओं का जीवन जोखिम में है।
पोलिंग बूथ के सीसीटीवी फुटेज और ई-रिकॉर्ड्स कैंडिडेट को नहीं मिल सकेंगे
चुनाव आयोग का कहना है कि सभी चुनावी कागजात और दस्तावेज वैसे भी जनता देख सकती है। उम्मीदवारों के पास सभी दस्तावेजों, कागजातों और रिकॉर्ड तक पहुंच होती है। अधिकारी ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता भी अपने क्षेत्र के सभी रिकॉर्ड देख सकता था। ईसी के सूत्रों ने कहा कि नियम में चुनावी पेपर्स दस्तावेजों का जिक्र था, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का नहीं। एक चुनाव अधिकारी ने कहा कि इस अस्पष्टता को दूर करने के लिए और एक व्यक्ति द्वारा AI का उपयोग करके मतदान केंद्र के अंदर के CCTV फुटेज के संभावित दुरुपयोग को ध्यान में रखते हुए, नियम में संशोधन किया गया है।
नए नियमों में क्या है जानिए
केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर चुनाव संबंधी नियमों में बदलाव किया है। इससे अब पोलिंग बूथ के CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स तक आम लोगों की पहुंच सीमित हो गई है। यह बदलाव पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश के कुछ ही दिन बाद आया है जिसमें इलेक्शन कमीशन को चुनाव संबंधी फुटेज शेयर करने का निर्देश दिया गया था। कांग्रेस ने इस कदम को चुनाव पारदर्शिता के खिलाफ बताया है और इसे चुनौती देने की बात कही है।
बदलाव से क्या होगा असर
चुनाव आयोग ने चुनाव संचालन नियम, 1961 के रूल 93 (2)(ए) में संशोधन किया है। इस संशोधन के बाद इलेक्शन कमीशन अब CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स देने से मना कर सकता है। 9 दिसंबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान एक पोलिंग बूथ के वीडियोग्राफी, CCTV फुटेज और वोटों से जुड़े कागजात की कॉपी वकील महमूद प्राचा को देने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद ही केंद्र सरकार ने चुनाव नियमों में यह बदलाव किया है।
नए संशोधन से क्या होगा
नए संशोधन के अनुसार, ‘चुनाव से संबंधित अन्य सभी कागजात, जैसा कि इन नियमों में बताया गया है, सार्वजनिक निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे।’ नियमों में केवल नामांकन फॉर्म, चुनाव एजेंटों की नियुक्ति, नतीजे और चुनाव खर्चों की डिटेल्स जैसे डॉक्यूमेंट्स का जिक्र है। हालांकि, हाल ही में CCTV फुटेज, वेबकास्टिंग फुटेज और आदर्श आचार संहिता के दौरान उम्मीदवारों की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी अन्य चुनाव आयोग के गतिविधियों की जानकारी भी नियम 93(2)(a) का हवाला देकर मांगी जा रही थी, जिनका 1961 के नियमों में जिक्र नहीं है।
यह संशोधन ‘चुनाव पत्र’ शब्द से जुड़ा है
चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि यह संशोधन ‘चुनाव पत्र’ शब्द को लेकर अस्पष्टता दूर करने और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स/CCTV फुटेज के संभावित दुरुपयोग की गंभीर चिंताओं को देखते हुए किया गया है। इलेक्शन कमीशन के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने महमूद प्राचा बनाम ECI मामले में हरियाणा चुनाव से संबंधित सभी दस्तावेज शेयर करने का निर्देश दिया था। इसमें CCTV फुटेज को भी चुनाव नियमों के नियम 93(2) के तहत माना गया था। नियम में चुनाव पत्रों का जिक्र है। चुनाव पत्रों और दस्तावेजों में विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उल्लेख नहीं है।








