भारत के सीमावर्ती जिले, जो देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास हैं, आर्थिक रूप से कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. इन इलाकों में गरीबी कम करने की गति धीमी है और निर्यात का आंकड़ा भी कमजोर है. सरकार के सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) के तहत मिलने वाला पैसा भी हाल के वर्षों में कम हुआ है. हालांकि, गुजरात के सीमावर्ती जिले इस मामले में एक अपवाद हैं, जहां गरीबी कम करने और निर्यात बढ़ाने में अच्छी प्रगति हुई है. लेकिन पश्चिमी और पूर्वी सीमावर्ती जिलों में स्थिति चिंताजनक है. इन क्षेत्रों में बाहरी कारक जैसे क्षेत्रीय तनाव, भौगोलिक समस्याएं और सरकारी फंड की कमी विकास को प्रभावित कर रही हैं.
भारत के सीमावर्ती जिलों में गरीबी कम करने की प्रक्रिया बहुत धीमी रही है. पश्चिमी सीमा पर, जिसमें जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान शामिल हैं, कम से कम 50% सीमावर्ती जिलों में गरीबी की दर राज्य के औसत की तुलना में धीमी गति से कम हुई है. यह आंकड़ा 2015-16 से 2019-21 के बीच का है. पूर्वी सीमा पर स्थिति और भी खराब है. असम में 75% सीमावर्ती जिलों में गरीबी कम करने की गति राज्य के औसत से कम रही. मेघालय में यह आंकड़ा 86%, मणिपुर, त्रिपुरा और नगालैंड में 60% या उससे अधिक, और अरुणाचल प्रदेश व पश्चिम बंगाल में 50% से ज्यादा रहा. लेकिन गुजरात के सीमावर्ती जिले इस मामले में अलग हैं. यहां सभी सीमावर्ती जिलों में गरीबी की दर राज्य के औसत से तेजी से कम हुई. यह दिखाता है कि गुजरात में कुछ खास नीतियां या स्थानीय परिस्थितियां बेहतर परिणाम दे रही हैं.
निर्यात के मामले में भी सीमावर्ती जिले (गुजरात को छोड़कर) बहुत पीछे हैं. पश्चिमी सीमा पर, गुजरात को छोड़कर, निर्यात पहले से ही बहुत कम था और यह 2022 से 2025 के बीच केवल 0.3% पर स्थिर रहा. यानी इसमें कोई वृद्धि नहीं हुई. पूर्वी सीमा के 71 जिलों का कुल निर्यात हिस्सा भी बहुत कम है, मात्र 0.3%, जो गुजरात के तीन सीमावर्ती जिलों के निर्यात से 10 गुना कम है. पूर्वी जिलों का निर्यात हिस्सा 0.5% से नीचे स्थिर रहा है. दूसरी ओर, गुजरात के पश्चिमी सीमावर्ती जिलों ने शानदार प्रदर्शन किया है. यहां भारत के कुल निर्यात में इन जिलों का हिस्सा 2022 में 1.9% से बढ़कर 2024 में 3% हो गया. यह एक बड़ा अंतर है और दिखाता है कि गुजरात के इन जिलों में कुछ खास रणनीतियां काम कर रही हैं.
इन क्षेत्रों की आर्थिक समस्याओं के पीछे कई बाहरी कारक हैं. पश्चिमी सीमा पर, खासकर जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के 19 जिलों में, पड़ोसी देश से लगातार खतरा और तनाव आर्थिक विकास को रोक रहे हैं. हाल के भारत-पाकिस्तान तनाव और नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर गोलीबारी ने इन इलाकों में आर्थिक गतिविधियों को और प्रभावित किया है.पूर्वी सीमा पर भौगोलिक समस्याएं बड़ी बाधा हैं. पूर्वोत्तर राज्य समुद्र से घिरे नहीं हैं, जिसके कारण निर्यात के लिए सामान हवाई या समुद्री मार्ग से बाहर भेजा जाता है. इससे लागत बढ़ती है और निर्यात की वृद्धि रुक जाती है. इसके अलावा, हाल ही में बांग्लादेश द्वारा लगाए गए लैंड पोर्ट प्रतिबंधों ने इस साल निर्यात को और प्रभावित किया है.
सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) इन इलाकों के विकास के लिए शुरू किया गया था, खासकर पश्चिमी सीमा के लिए. लेकिन महामारी के बाद इस कार्यक्रम के लिए मिलने वाला सरकारी फंड काफी कम हो गया है. पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमाओं पर 2020 के बाद से केंद्रीय फंड में कमी देखी गई है. खासकर पश्चिमी राज्यों में यह कमी ज्यादा स्पष्ट है. इस फंड की कमी ने बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को प्रभावित किया है. उदाहरण के लिए, सड़क, बिजली, पानी और स्कूल जैसी सुविधाएं बनाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं मिल रहा, जिससे इन इलाकों का विकास रुक गया है.
पश्चिमी सीमा पर 22 जिले और पूर्वी सीमा पर 71 जिले सीमावर्ती जिलों के रूप में चिह्नित किए गए हैं. इनमें से ज्यादातर जिलों में आर्थिक विकास की गति धीमी है. गरीबी कम करने और निर्यात बढ़ाने में गुजरात के सीमावर्ती जिले एकमात्र सकारात्मक उदाहरण हैं. इन जिलों की सफलता से यह सवाल उठता है कि वहां ऐसा क्या हो रहा है जो अन्य जिलों में नहीं हो पा रहा. शायद वहां की स्थानीय नीतियां, बेहतर बुनियादी ढांचा या अन्य अनुकूल परिस्थितियां इसकी वजह हैं।. इनसे अन्य सीमावर्ती जिलों के लिए सबक लिया जा सकता है.
सीमावर्ती जिलों की समस्याओं को हल करने के लिए कई कदम उठाने की जरूरत है. सबसे पहले, बीएडीपी के लिए फंड बढ़ाना होगा ताकि बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए जा सकें. सड़क, रेल, बिजली और टेलीकॉम जैसी बुनियादी सुविधाएं इन इलाकों के विकास के लिए जरूरी हैं. साथ ही, स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर देने के लिए उद्योग और आधुनिक खेती को बढ़ावा देना होगा. क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी जरूरी हैं, खासकर पश्चिमी सीमा पर. पूर्वी सीमा पर निर्यात को बढ़ाने के लिए लैंड पोर्ट प्रतिबंधों को हल करने और परिवहन सुविधाओं को बेहतर करने की जरूरत है. इसके अलावा, सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाकर स्थानीय लोगों को विकास योजनाओं में शामिल करना होगा.
गुजरात के सीमावर्ती जिलों की सफलता से यह साफ है कि सही नीतियां और संसाधन उपलब्ध होने पर तेजी से प्रगति संभव है. इन जिलों में गरीबी कम करने और निर्यात बढ़ाने में जो सफलता मिली, उसका अध्ययन करके अन्य जिलों में भी ऐसी रणनीतियां लागू की जा सकती हैं. उदाहरण के लिए, वहां की स्थानीय सरकारें शायद बुनियादी ढांचे पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं या निजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही हैं. इन पहलुओं को समझकर अन्य सीमावर्ती जिलों में भी इन्हें लागू किया जा सकता है.
कुल मिलाकर, भारत के सीमावर्ती जिले कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. गरीबी कम करने की धीमी गति, कमजोर निर्यात प्रदर्शन और सरकारी फंड की कमी ने इन इलाकों को देश के अन्य हिस्सों से पीछे रखा है. बाहरी कारक जैसे क्षेत्रीय तनाव और भौगोलिक समस्याएं इन चुनौतियों को और बढ़ा रही हैं. लेकिन गुजरात के सीमावर्ती जिलों की सफलता यह दिखाती है कि सही दृष्टिकोण और संसाधनों के साथ बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. इन इलाकों के विकास के लिए सरकार को फंड बढ़ाना होगा, बुनियादी ढांचे पर काम करना होगा और स्थानीय लोगों को योजनाओं में शामिल करना होगा. साथ ही, क्षेत्रीय तनाव और व्यापारिक बाधाओं को कम करने के लिए कूटनीतिक और प्रशासनिक कदम उठाने होंगे. तभी इन सीमावर्ती जिलों का समग्र विकास संभव होगा.








