अरब सागर के निकट पोरबंदर में दो अक्तूबर, 1869 को जब मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ, उस वक्त किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि यह बच्चा अस्सी साल तक इस ग्रह की यात्रा करेगा। गांधी जी ने भारत को जिस तरह एकजुट किया, वैसा कोई नहीं कर सका। इसके लिए उन्होंने हिंसा के बजाय अहिंसक मार्ग अपनाया। दक्षिण अफ्रीका में उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ, लेकिन वह विचलित नहीं हुए। वह जानते थे कि उनके अंदर की आध्यात्मिक ताकत और दृढ़ विश्वास ही उस सत्ता के पहाड़ को हटा सकता है, जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता था।
गांधी जी के बारे में अल्बर्ट आइंस्टीन ने ठीक ही कहा था, ‘आने वाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर विश्वास करेंगी कि ऐसा कोई व्यक्ति कभी इस धरती पर आया था।’ महान साहित्यकार लियो टॉल्स्टॉय ने गांधीजी को पत्र लिखा था, ‘मैंने आपकी पुस्तक (हिंद स्वराज) बहुत रुचि के साथ पढ़ी, क्योंकि मुझे लगता है कि आपने इसमें जिन प्रश्नों पर विचार किया है, वे न केवल भारतीयों के लिए, बल्कि पूरी मानव जाति के लिए महत्वपूर्ण हैं।’
महान फ्रांसीसी लेखक रोमां रोलां ने अपनी पुस्तक, महात्मा गांधी : द मैन हू बिकेम वन विद द यूनिवर्सल बीइंग में लिखा है, ‘महान आत्मा के अदम्य तप और जादू ने काम किया और जीत हासिल की : वीरतापूर्ण सौम्यता के आगे बल को झुकना पड़ा।’ गांधी जी के आदर्श आज की दुनिया में उनके जीवनकाल से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। आज पूरी दुनिया में व्याप्त आतंकवाद, अंतहीन हिंसा और प्रतिहिंसा को देखते हुए पश्चिम के इतिहासकार सभ्यताओं के संघर्ष की दोषपूर्ण अवधारणाएं पेश कर रहे हैं, यह सिर्फ बयानबाजी है। न तो सभ्यताएं हैं और न ही उनके बीच युद्ध की कोई संभावना है।
ऐसे सवाल जानबूझकर उठाए जाते हैं, ताकि केवल पश्चिम के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए महाशक्तियों द्वारा अन्य राष्ट्रों पर एकतरफा हमले को उचित ठहराया जा सके। दुनिया भर में व्याप्त आतंकवाद के मूल कारण की खोज किए बिना, पश्चिमी शक्तियों ने बिना सोचे-समझे एक के बाद एक राष्ट्रों पर हमले किए हैं, जिससे आतंकवाद को और बढ़ावा मिला है।
इराक के पतन के बाद भी आज दुनिया सुरक्षित नहीं है। स्पेन, इंडोनेशिया और अब मिस्र की घटनाएं दर्शाती हैं कि आतंक और प्रति-आतंकवाद एक अंतहीन दुष्चक्र है, जिसे बलपूर्वक नहीं रोका जा सकता, चाहे वह कितना भी प्रबल क्यों न हो। सांप्रदायिक मुद्दों के आधार पर बनाई गई इस भागीदारी से पहले और बाद में भारतीय उपमहाद्वीप को सबसे भयानक अत्याचारों का सामना करना पड़ा।
गांधी जी विश्व बंधुत्व और एक विश्व, केवल एक सभ्यता (मानव सभ्यता) के सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखते थे। यदि आज वह जीवित होते, तो युद्ध सभ्यताओं के बीच नहीं, बल्कि निहित स्वार्थों तथा बेईमान व अतिमहत्वाकांक्षी राजनेताओं के बीच होता। गांधी जी ऐसे समाज से घृणा करते थे, जो हिंसा के जरिये स्वतंत्रता के लिए प्रयास करता है और साथ ही उस राजनीतिक इकाई से भी, जो बलपूर्वक अपनी राय थोपती है। उन्होंने एक ऐसा रास्ता खोजा, जिससे लोग लालच और भय के गुलाम न बनें तथा किसी भी अमानवीय शक्ति के आगे अपना सिर न झुकाएं। उनका मुख्य उद्देश्य एक अहिंसक समाज और सभी गलत व अधार्मिक चीजों का अहिंसक प्रतिरोध था। उनका मानना था कि किसी भी देश की आजादी हर व्यक्ति को भय, लोभ और भूख से मुक्त किए बिना नहीं मिल सकती।
लोग गांधी जी के सिद्धांतों की आलोचना करते थे, लेकिन उन्होंने अहिंसा के मार्ग से डिगे बिना आजादी हासिल कर स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहासों में एक नया इतिहास रच दिया। गांधी जी के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सिद्धांत कहीं अधिक मौलिक और क्रांतिकारी प्रकृति के हैं। राष्ट्र की नींव को कुतरने वाली कुप्रथा, अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका संघर्ष, ग्रामीण पुनर्निर्माण और ग्राम गणराज्य की उनकी अवधारणा और बच्चों के लिए बुनियादी प्राथमिक शिक्षा के उनके विचार आज भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श में छाए हुए हैं।
गांधी जी ने समाज को जोड़ने का काम किया। समाज के सबसे निचले स्तर के लोगों की मुक्ति के लिए उन्होंने हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण तथा ‘अंत्योदय’ या सबसे गरीब लोगों के उत्थान के लिए मौजूदा सरकार द्वारा संचालित योजनाओं में भी गांधी जी के आदर्शों की झलक मिलती है। आर्थिक विकास के बारे में गांधी जी का एक अनूठा दृष्टिकोण था, जो वैश्वीकरण की वर्तमान बयानबाजी के विपरीत है। उन्होंने छोटे-छोटे गांवों के विकास और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया, जहां जीवन की सभी मूलभूत जरूरतें पूरी होती हों। आधुनिक अर्थशास्त्री भी इसे सही मानते हैं।
गांधी जी ने छोटे और लघु ग्राम उद्योगों पर जोर दिया, जो सभी ग्रामीणों को साल भर उत्पादक कार्यों में नियोजित करके स्थानीय धन का सृजन करते, लेकिन औद्योगीकरण ने इस अवधारणा को अव्यावहारिक और अप्रचलित करार दिया है। गांधी जी कहते थे कि शिक्षा सामाजिक और आर्थिक उत्थान का एक उपयोगी साधन होनी चाहिए और केवल अमूर्त ज्ञान तक सीमित न रहे। वर्तमान में, शैक्षिक सुधार पर एक नया विमर्श सामने आया है और शिक्षा पर गांधी जी की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है। यह एक शुभ संकेत है और इस पर अमल जरूरी है।
आज का विश्व सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से गांधी जी के सिद्धांतों से कोसों दूर है। हम एक विभाजित वैश्विक समाज हैं। पश्चिमी संस्कृति, इस्लामी संस्कृति, यहूदी संस्कृति आदि का उपयोग विभाजन को बनाए रखने के लिए किया जाता है, ताकि कमजोर देशों पर आर्थिक और राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। अब समय आ गया है कि हम गांधीवादी विचारों और सिद्धांतों का पुनः स्मरण करें, उनका पुनर्मूल्यांकन करें और उन्हें पुनः सक्रिय करें तथा विश्व के राष्ट्रों को शांति, अहिंसा और सार्वभौमिक भाईचारे के एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करें। यदि आज गांधी जी जीवित होते, तो बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत स्थायी शांति, सौहार्द और गरीबी व निरक्षरता को दूर करते हुए तीव्र आर्थिक विकास का आनंद ले रहे होते।








