साल 1990. बिहार में चुनावी गर्मी जोर पर थी. लोकदल से मोकामा से रौबदार मूंछों वाले उम्मीदवार को मैदान में उतारा. दलफनामा दाखिल हुआ तो उस पर 11 केसों की लिस्ट मौजूद थी. नाम था दुलारचंद. मोकामा में दुलार का उतरना कोई नहीं बात नहीं थी. वह दबंगई का वो दौर था जो मोकामा के […]
By UB India News • Patna, Bihar शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025, 02:04 AM • 12 मिनट read
साल 1990. बिहार में चुनावी गर्मी जोर पर थी. लोकदल से मोकामा से रौबदार मूंछों वाले उम्मीदवार को मैदान में उतारा. दलफनामा दाखिल हुआ तो उस पर 11 केसों की लिस्ट मौजूद थी. नाम था दुलारचंद. मोकामा में दुलार का उतरना कोई नहीं बात नहीं थी. वह दबंगई का वो दौर था जो मोकामा के नाम के साथ आज तक चस्पा है. मगर, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले लाल यादव के करीबी रह चुके और जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव की मोकामा में हत्या ने बवाल मचा दिया है. बिहार के मोकामा विधानसभा क्षेत्र में जनसुराज पार्टी के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में प्रचार के दौरान दुलारचंद यादवकी हत्या कर दी गई. इस हत्याकांड को लेकर मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह के समर्थकों पर हत्या के आरोप लगे हैं.
कैसे हुई दुलारचंद की हत्या?
बाहुबली का उदय: टाल क्षेत्र का ‘दबंग’
दुलारचंद यादव का शुरुआती जीवन और पहचान मोकामा के टाल क्षेत्र में उनकी दबंगई और आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़ी थी. 80 और 90 के दशक में, जब बिहार में बाहुबलियों का बोलबाला था, दुलारचंद यादव ने इस क्षेत्र में अपना एकछत्र राज स्थापित किया. उन पर हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, रंगदारी और आर्म्स एक्ट सहित कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे. 1991 के कांग्रेस नेता सीताराम सिंह हत्याकांड में भी उनका नाम आया, जिसने उनकी ख्याति को और बढ़ा दिया. अपनी इस “दबंग” छवि के बावजूद, या शायद इसी वजह से, वे अपने समाज, खासकर यादव समुदाय के बीच एक मजबूत आधार बनाने में सफल रहे, जहां उन्हें एक संरक्षक और “न्याय दिलाने वाले” व्यक्ति के रूप में देखा जाता था.
राजनीति में प्रवेश: दलदल से दल तक
दुलारचंद यादव ने अपनी क्षेत्रीय दबंगई और मजबूत सामाजिक आधार को राजनीतिक शक्ति में बदलने की कला बखूबी सीखी. 90 के दशक में, जब लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का उदय हुआ, तब दुलारचंद यादव ने उनके साथ हाथ मिलाया. वह लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी और भरोसेमंद माने जाते थे, जिन्होंने मोकामा और बाढ़ के टाल इलाके में RJD की राजनीतिक जमीन मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा, हालांकि उन्हें जीत हासिल नहीं हुई. यह उनका राजनीति में पहला औपचारिक कदम था, जिसने उन्हें दलदल की दुनिया से दल की दुनिया तक पहुंचाया.
बदलती निष्ठाएं और चुनावी शतरंज
समय के साथ, दुलारचंद यादव की राजनीतिक निष्ठाएं बदलती रहीं, जो बिहार की सत्ता की बदलती समीकरणों को दर्शाती हैं. दुलारचंद यादव की राजनीतिक यात्रा केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं रही. सत्ता और प्रभाव बनाए रखने के लिए उन्होंने समय-समय पर अपनी निष्ठाएं बदलीं, जो बिहार की अवसरवादी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा रही है: उन्होंने लोकदल के बाद RJD के साथ एक लंबा राजनीतिक सफर तय किया, और लालू परिवार के संकट के समय भी वे उनके साथ खड़े रहे. 2017 के बाद, वे जनता दल यूनाइटेड (JDU) और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भी करीब आए. 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्हें JDU की रैलियों में प्रचार करते देखा गया, जो उनके राजनीतिक लचीलेपन को दर्शाता था. 2022 के मोकामा उपचुनाव में उन्होंने बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी (तब RJD उम्मीदवार) का समर्थन किया, जो उनके राजनीतिक समीकरणों को साधने की क्षमता को दर्शाता है. अपनी मृत्यु के समय, वह प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के स्थानीय उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के लिए सक्रिय रूप से प्रचार कर रहे थे, जब उनकी दुखद हत्या हुई.
अनंत सिंह के समर्थकों पर हत्या का आरोप
हत्या का आरोप जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह के समर्थकों पर लगे हैं . दुलारचंद यादव की हत्या के मामले में अनंत सिंह समेत पांच लोगों के खिलाफ पुलिस ने नामजद दर्ज की है. मृतक दुलारचंद यादव के पोते के बयान पर पुलिस ने अनंत सिंह उनके दो भतीजों रणवीर और कर्मवीर समेत पांच लोगों पर हत्या की प्राथमिकी दर्ज की. मृतक के परिजनों का आरोप है कि अनंत सिंह के लोगों ने पहले गोली मारी और फिर गाड़ी चढ़ाकर दुलार चांद की हत्या कर दी. हालांकि जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह ने हत्या के आरोपों से इनकार किया. उन्होंने कहा कि जब वह चुनाव प्रचार कर लौट रहे थे तो आगे निकल गए. पीछे रह गई उनके काफिले की गाड़ियों को जान स्वराज पार्टी समर्थकों ने घेर लिया और पत्थर से हमला कर दिया था. अनंत सिंह ने इसे राजद नेता सूरजभान सिंह की साजिश बताया है. वही सूरजभान ने अनंत सिंह के आरोपों पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया. अनंत सिंह ने यह भी कहा कि झगड़े की पहल दुलारचंद यादव ने की थी. अनंत सिंह की ओर से दर्ज प्राथमिकी में पीयूष प्रियदर्शी सहित पांच व्यक्तियों को नामजद एवं अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया गया है.
मोकामा टाल के ‘मिस्टर दबंग’
दुलारचंद यादव और अनंत सिंह की अदावत का किस्सा समझने के लिए हमें थोड़ा फ्लैशबैक में चलना होगा. यह बात 1990 के दशक से पहले की है. मोकाम से सटा बड़हिया है. जी हां आप बिल्कुल ठीक समझ रहे हैं वहीं बड़हिया जहां का स्पंजी रसगुल्ला काफी फेमस है. रसगुल्ले की बात किसी और दिन करेंगे, आज बात मोकामा की हो रही है तो उसी पर टिकते हैं.
बड़हिया के एक भूमिहार परिवार से निकले श्याम सुंदर सिंह धीरज कांग्रेस के बड़े नेता हुआ करते थे. श्याम सुंदर सिंह धीरज को घरवालों ने पढ़ने के लिए
पटना यूनिवर्सिटी भेजा. यहां आकर वह NSUI से जुड़े और छात्र राजनीति में कूद गए. कुछ समय के अंदर ही श्याम सुंदर सिंह धीरज ने संजय गांधी तक अपनी पहुंच बना ली और बिहार के चर्चित और पावरफुल नेता बन गए. उस दौर में श्याम सुंदर सिंह धीरज बिहार यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे. यानी धीरज के पास वो ताकत थी, जिसकी जरूरत हर बड़े नेता को होती. जिस किसी बड़े कांग्रेसी नेता को रैलियों में भीड़ जुटाने की जरूरत होती या पटना में धरना-प्रददर्शन करने की, उस दौर में उन्हें श्याम सुंदर सिंह धीरज का ही मुंह ताकना पड़ता. यही वजह थी कि
बिहार में उस वक्त् की राजनीति में श्याम सुंदर सिंह धीरज का एक अपना कद था.
संजय गांधी से ग्रीन सिग्नल मिलने पर श्याम सुंदर सिंह धीरज ने महज 25 साल की उम्र में अपनी राजनीतिक पारी के लिए भूमिहार बाहुल्य सीट मोकामा को चुना और जीत भी दर्ज की. 1980 और 1985 के विधानसभा चुनाव में श्याम सुंदर सिंह धीरज कांग्रेस के इतने चर्चित नेता थे कि खुद संजय गांधी उनके लिए प्रचार करने मोकामा आए थे.
श्याम सुंदर सिंह धीरज पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए मोकामा के अलग-अलग पॉकेट में कुछ उत्साही युवकों को इलाके में पावर दिखाने की खुली छूट दे रखी थी. इसी कड़ी में भूमिहार बाहुल्य गांव लदमा से अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह निकले. जो श्याम सुंदर सिंह धीरज के लिए चुनाव में राइफल के दम पर बूथ तक लूटने के आरोप झेले.
वहीं दूसरी तरफ टाल क्षेत्र के यादव बाहुल्य तारतर गांव में श्याम सुंदर सिंह धीरज ने दुलारचंद यादव को बढ़ाया. मोकामा टाल की भौगोलिक स्थित को देखें तो तारतर गांव के आस-पास ज्यादातर कुर्मी और धानुक बाहुल्य गांव हैं. दुलारचंद यादव पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने राइफल का दम दिखाकर इस इलाके में धानुक और कुर्मी बिरादरी के कई किसानों की जमीनें अपने नाम लिखवा ली. इलाके के लोग बताते हैं कि दुलारचंद यादव ने कुछ ही सालों में मोकामा टाल में सैकड़ो बिगहा जमीन बना ली थी. आरोप लगते हैं कि दुलारचंद यादव ने उस इलाके में कुर्मी बिरादरी के बड़े जमींदार रहे बाबू सीताराम की सैंकड़ों एकड़ जमीन कबजाई.
कहते हैं उस दौर मे कुर्मीचक, खुशहालचक, रामपुर, चंदा-चक्रहीं, अकबरपुर, बसामनचक, प्रल्हादपुर, बकमा, अस्ताबाद, बदलूचक, सादिकपुर, लक्ष्मीपुर जैसे गांवों के किसान मोकामा टाल से अपनी फसल सुरक्षित खलियान तक लाने के बदले दुलारचंद यादव को रंगदारी देते थे. ठीक ठाक दौलत बनाने के बाद 2000 आते-आते दुलारचंद यादव ने तारतर के अपने पुश्तैनी मकान को छोड़कर बाढ़ शहर में अपना बेस बना लिया.
अनंत सिंह और दुलारचंद यादव के बीच अदावत की कहानी
कांग्रेसी और उस दौर में बिहार सरकार में मंत्री श्याम सुंदर सिंह धीरज ने एक बार पटना में दिलीप सिंह को कहा कि वह दिन के उजाले में उनसे मिलने ना आए. इसके बाद दिलीप सिंह खुद ही मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे और श्याम सुंदर सिंह धीरज को परास्त कर अपनी अलग राजनीतिक राह बना ली. कहा जाता है कि यहीं से दुलारचंद यादव और दिलीप सिंह के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई.
दुलारचंद यादव के मन में एक कसक रह गई कि वह विधायक नहीं बन पाए. उन्होंने भी निर्दलीय मोकामा से भाग्य आजमाया, लेकिन सफलता नहीं मिली. उन्हें लगता रहा कि श्याम सुंदर सिंह धीरज ने अपनी भूमिहार जाति से आने वाले दिलीप सिंह को अंदरुनी बढ़ावा दिया और लालू प्रसाद यादव से करीबी बढ़ाने में मदद भी की, लेकिन यादव बिरादरी से होने के चलते दुलारचंद यादव को किसी ने सपोर्ट नहीं किया. दुलारचंद यादव ने अपने गांव तारतर में लालू यादव की कई रैलियां आयोजित की, लेकिन मोकामा और बाढ़ विधानसभा सीट में यादवों की आबादी निर्णायक नहीं होने के चलते कभी भी टिकट नहीं पा पाए.
दिलीप सिंह की असामायिक मौत के बाद अनंत सिंह ने 2005 में जेडीयू के टिकट पर अपनी राजनीतिक पारी शुरू की. अनंत सिंह ने भी अपना बेस बाढ़ को ही बनाया. एक दौर था जब बाढ़ शहर में अनंत सिंह और दुलारचंद यादव दोनों अपने अपने इलाके बांट रखे थे और कारोबारियो से रंगदारी, ठेला-टमटम (तांगा) वालों से हर फेरे पर रंगदारी, प्रोटेक्शन टैक्स जैसी वसूली का धंधा चलाते रहे. इस दौरान अनंत सिंह और दुलारचंद यादव के बीच यही जंग रहती कि बाढ़ का असली बाहुबली का कौन?
सत्ताधारी जेडीयू के टिकट पर लगातार विधायक बनते रहने के चलते अनंत सिंह का रुतबा बढ़ता चला गया. वहीं बिहार में आरजेडी के सत्ता से बाहर होने के चलते दुलारचंद यादव लाइमलाइट से गायब होते चले गए. दुलारचंद यादव ने विधानसभा और पार्षदी के कई चुनावों में अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने की कोशिश की, लेकिन हर बार नाकामी ही हाथ लगी.
इसी कसक में दुलारचंद यादव चुनाव दर चुनाव अनंत सिंह के खिलाफ काम करते रहे. इसके जरिए दुलारचंद यादव और अनंत सिंह के बीच मोकामा टाल में भूमिहार बनाम यादव के बीच एक छुपी जंग भी चलती रही. पिछले कुछ समय से दुलारचंद यादव अनंत सिंह की पत्नी और पूर्व विधायक नीलम देवी को लेकर कई आपत्तिजनक कॉमेंट भी कर रहे थे. इस बात को लेकर भी अनंत सिंह और उनका परिवार नाराज बताया जा रहा था.
कुर्मी-धानुक बाहुल्य गांवों में दुलारचंद का उतरना बना उनकी मौत की वजह?
बताया जा रहा है कि गुरुवार को दुलारचंद यादव जहां धानुक जाति से आने वाले जनसुराज प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के लिए वोट मांगने निकले थे. वहीं अनंत सिंह का भी काफिला इसी इलाके में था. यहां बता दें कि अनंत सिंह के बारे में कहा जाता है कि उन्हें मोकामा शहर या उसके आसपास के भूमिहारों पर उतनी पकड़ नहीं. जेडीयू में होने के चलते अनंत सिंह को मोकामा टाल क्षेत्र के कुर्मी, धानुक सहित अन्य ओबीसी जातियों का वोट मिलता रहा है. 2025 के चुनाव में आरजेडी के टिकट पर दूसरे बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी के मैदान में उतर गए हैं. धानुक बिरादरी से पीयूष प्रियदर्शी भी जनसुराज के टिकट पर मैदान में हैं. अनुमान है कि सूरजभान सिंह के मैदान में उतरने के चलते भूमिहार वोटों के बंटवारा हो सकता है. ऐसे में अनंत सिंह भी कुर्मी और धानुक बाहुल्य गांवों पर ज्यादा फोकस करते दिख रहे हैं. दुलारचंद यादव पीयूष प्रियदर्शी के लिए प्रचार करने निकले हुए थे. गुरुवार की तकरार में भी यह वजह मानी जा रही है.