यूपी-बिहार से सुप्रीम कोर्ट तक आधार विवादों में क्यों, यह कहां-कहां है जरूरी?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने आधार को जन्म प्रमाण पत्र मानने से इनकार कर दिया है. नियोजन विभाग ने सभी विभागों को पत्र लिखकर आगाह किया है. सरकार ने अपने पत्र में UIDAI के पत्र को आधार बनाया है. उधर, सुप्रीम कोर्ट में SIR को लेकर चल रही बहस में वरिष्ठ वकील कपिल […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 29 नवंबर 2025, 10:53 AM 10 मिनट read
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यूपी-बिहार से सुप्रीम कोर्ट तक आधार विवादों में क्यों, यह कहां-कहां है जरूरी?
Photo: UB India News Archive

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने आधार को जन्म प्रमाण पत्र मानने से इनकार कर दिया है. नियोजन विभाग ने सभी विभागों को पत्र लिखकर आगाह किया है. सरकार ने अपने पत्र में UIDAI के पत्र को आधार बनाया है. उधर, सुप्रीम कोर्ट में SIR को लेकर चल रही बहस में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने केरल एवं पश्चिम बंगाल राज्य सरकारों का पक्ष रखते हुए कहा कि आधार होने के बावजूद मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं. बिहार चुनाव के पहले SIR को लेकर चल रही बहस में आधार भी पार्टी बना था.

देश के किसी न किसी हिस्से में अक्सर आधार को लेकर कुछ न कुछ विवाद अक्सर सामने आते ही रहते हैं. देश का शायद ही कोई राज्य हो जहां इस मुद्दे पर बवाल न हुआ हो. सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद आधार को लेकर सभी पक्षों का रवैया ढुलमुल है. नतीजे में आए दिन सर्वोच्च अदालत में अभी भी इसे लेकर बहस होती ही रहती है. इस पूरे मामले को समझने के लिए आधार की उपयोगिता के साथ उसके कानूनी, तकनीकी और सामाजिक पहलुओं को एक साथ देखना जरूरी है. आधार अब लगभग पूरे देश की आबादी को कवर करने वाली पहचान प्रणाली है, इसलिए इसका असर भी हर राज्य और हर वर्ग पर पड़ता है. इसी वजह से विवाद खत्म नहीं होता बल्कि समयसमय पर अलगअलग रूप में पूरे देश में सामने आता रहता है.

आखिर क्यों नहीं थमता आधार को लेकर विवाद? क्या हैं इसे लेकर नियम-कानून? जानें 5 बड़ी वजह और यह भी कि आखिर कहां-कहां आधार का इस्तेमाल हो रहा है? आइए, विस्तार से समझते हैं.

1- हर राज्य में मौजूद, हर जगह सवाल

आधार को केंद्र सरकार ने पूरे देश में लागू किया है. सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मौकों पर आधार मामले में केंद्र के साथसाथ लगभग सभी बड़े राज्यों को भी पक्षकार बनाया. यानी व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो देश के लगभग सभी राज्यों में किसी न किसी रूप में आधार से जुड़े मुद्दे उठे चुके हैं. कहीं राशन वितरण में समस्या के रूप में, कहीं पेंशन या मनरेगा की मजदूरी रुकने के मामले में, तो कहीं स्कूलकॉलेज, बैंक और मोबाइल सिम से लिंकिंग को लेकर बहस के रूप में. इस तरह यह विवाद किसी एकदो राज्यों तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ मुद्दा है.

2- कानूनी पृष्ठभूमि और आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

आधार पर सबसे बड़ा विवाद इसका संवैधानिक और कानूनी दर्जा था. और यह कि क्या यह नागरिकों की निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है या नहीं? साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-जजों की बेंच ने जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में आधार कानून को अधिकांश रूप से संवैधानिक माना, लेकिन कुछ प्रावधानों को खारिज या सीमित कर दिया था. अदालत ने कहा कि आधार सब्सिडी और सरकारी लाभों की लक्षित डिलीवरी के लिए वैध कानून है. इसे मनी बिल के रूप में पारित करने पर बहुमत ने आपत्ति नहीं की, हालांकि जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसे असंवैधानिक माना.

Supreme Court seeks response on Rajasthan Conversion Act 2025

सुप्रीम कोर्ट

बैंक अकाउंट और मोबाइल सिम से अनिवार्य आधार लिंकिंग को खारिज कर दिया गया. निजी कंपनियों द्वारा आधार की अनिवार्य मांग (धारा 57) को भी बड़े हिस्से में अमान्य किया गया. इस फैसले ने विवाद को पूरी तरह खत्म नहीं किया, बल्कि एक सीमित रूप से वैध आधार ढांचे को स्वीकार करते हुए आगे की बहस के लिए जगह छोड़ दी. बाद में रिव्यू याचिकाओं को भी कोर्ट ने ज्यादातर खारिज कर दिया, पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने फिर असहमति जताई.

3- आधार को लेकर विवाद की 5 बड़ी वजहें भी जानें

  • निजता और निगरानी की आशंका

आधार का मूल ढांचा बायोमेट्रिक डेटा, उंगलियों के निशान, आईरिस स्कैन और फोटो पर आधारित है. आलोचक कहते हैं कि इतना संवेदनशील डेटा अगर एक जगह इकट्ठा हो तो यह राज्य या किसी और के लिए बड़े पैमाने पर निगरानी का औज़ार बन सकता है. पुट्टस्वामी फैसले की बहस और फैसले का सार बताने वाले विश्लेषणों में यह चिंता साफ दिखती है कि कहीं आधार एक सर्विलांस स्टेट की दिशा में कदम न बन जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इन आशंकाओं को गंभीरता से परखा, हालांकि बहुमत ने कहा कि मौजूदा सुरक्षा प्रावधानों के चलते इसे निगरानी राज्य कहना सही नहीं होगा. फिर भी नागरिक समाज और तकनीकी विशेषज्ञों के बड़े हिस्से को लगता है कि डेटा सुरक्षा कानून, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और मजबूत जवाबदेही व्यवस्था के बिना यह खतरा बना रहेगा.

  • डेटा लीक और सुरक्षा को लेकर अविश्वास

समयसमय पर मीडिया समेत कुछ रिपोर्ट्स में आधार डेटा या आधार से जुड़ी जानकारी के लीक होने के दावे सामने आए हैं. यूआईडीएआई ने इन दावों को अक्सर खारिज किया या सीमित नुकसान बताया, लेकिन आम नागरिक के मन में यह धारणा बनी कि उसका डेटा पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. किसी भी डिजिटल पहचान व्यवस्था की साख उसी पर टिकती है कि लोग इसे सुरक्षित मानें. जब भी डेटा सुरक्षा से जुड़ी कोई खबर आती है, विवाद फिर उभर कर सामने आ जाता है.

  • लाभ से वंचित होने और तकनीकी खामियों के मामले

आधार को गरीबों और हाशिये के लोगों तक सब्सिडी और योजनाओं का रिसाव रोकने के नाम पर लाया गया. लेकिन कई राज्यों से ऐसी खबरें आईं कि फिंगरप्रिंट मैच न होने या नेटवर्क न चलने की वजह से लोगों को राशन, पेंशन या मजदूरी नहीं मिल पाई. जमीनी रिपोर्टें बताती हैं कि बुज़ुर्गों, मजदूरों और आदिवासी इलाकों में यह समस्या ज्यादा गंभीर रही. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी स्वीकार किया गया कि तकनीकी असफलता की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी है, ताकि कोई भी व्यक्ति महज़ आधार प्रमाणीकरण फेल होने के कारण अपने अधिकार से वंचित न हो.

  • कानूनी दायरे और असल व्यवहार में फर्क

कोर्ट ने साफ किया है कि बैंक अकाउंट खोलने, मोबाइल सिम लेने, स्कूल में दाखिले या कई निजी सेवाओं के लिए आधार अनिवार्य नहीं किया जा सकता. आधार मुख्य रूप से सरकारी सब्सिडी, लाभ और सेवाओं के लिए इस्तेमाल होगा. इसके बावजूद कई जगहों पर स्कूल, अस्पताल, हाउसिंग सोसाइटी, नौकरी देने वाले संस्थान या प्राइवेट कंपनियां आधार को अनिवार्य दस्तावेज की तरह मांगती हैं. जहां कानून इसे मना करता है, वहां भी व्यवहार में नो आधार, नो सर्विस जैसी मानसिकता दिखती है. यह अंतर लोगों के बीच भ्रम पैदा करता है. नतीजा, देश भर में आधार के दुरुपयोग या अतिउपयोग की शिकायतें आम हैं.

  • लोकतांत्रिक बहस और तकनीकी जटिलता का टकराव

आधार एक टेक्नोलॉजीड्रिवन प्रोजेक्ट है लेकिन इसका असर लोकतांत्रिक अधिकारों, गोपनीयता, सामाजिक न्याय और फेडरल ढांचे तक जाता है. संसद में इसे मनी बिल के रूप में पारित किए जाने पर भी बड़ा विवाद रहा. जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने असहमति वाले मत में इसे संविधान के बुनियादी ढांचे, खास तौर पर राज्यसभा की भूमिका के खिलाफ बताया. इस पूरे विवाद ने यह सवाल उठाया कि क्या इतनी व्यापक प्रभाव वाली डिजिटल पहचान योजना पर पर्याप्त लोकतांत्रिक बहस, संसदीय जांच और जनसुनवाई हुई या नहीं. जो लोग मानते हैं कि यह प्रक्रिया अधूरी रही, वे आधार को एक तरह से ऊपर से थोपे गए प्रोजेक्ट की तरह देखते हैं, जिससे असहमति बनी रहती है.

Aadhaar

आधार कार्ड

4- आधार कहां-कहां इस्तेमाल होता है और क्या हैं नियम?

कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आधार के इस्तेमाल का मोटामोटा ढांचा इस तरह बनता है. सरकारी सब्सिडी और लाभ. खाद्यान्न सब्सिडी, केरोसिन, उर्वरक जैसी योजनाएं. मनरेगा की मजदूरी, विधवा पेंशन, छात्रवृत्ति आदि. इन मामलों में सरकार आधार को पहचान और प्रमाणीकरण के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकती है, बशर्ते विकल्प उपलब्ध हों और तकनीकी विफलता की स्थिति में किसी का हक नहीं कटे.

आयकर और पैन से लिंक: आयकर कानून में किए गए संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना, इसलिए पैनआधार लिंकिंग को बरकरार रखा गया. तर्क यह दिया गया कि टैक्स कंप्लायंस और फर्जी पहचान रोकने के लिए यह जरूरी है.

Banking Sector

बैंकिंग और मोबाइल सेवाएं: शुरू में आधार से बैंक और सिम लिंकिंग को बहुत आक्रामक तरीके से बढ़ाया गया. साल 2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बहुमत बेंच ने मोबाइल सिम और बैंक अकाउंट के लिए अनिवार्य आधार लिंकिंग को असंवैधानिक ठहराया क्योंकि यह न तो अनुपातिक था न ही पर्याप्त कानूनी आधार पर टिका था यानी नियम के स्तर पर यह अनिवार्य नहीं रह गया, हालांकि व्यवहार में अभी भी कई जगह केवाईसी के नाम पर इसे जोर देकर मांगा जाता है.

शिक्षा और बच्चों से जुड़े प्रावधान: कोर्ट ने कहा कि सीबीएसई, यूजीसी, नीट जैसी परीक्षाओं के लिए आधार अनिवार्य नहीं किया जा सकता. प्राथमिक शिक्षा को अधिकार माना गया है, इसलिए यहां आधार की अनिवार्यता पर कोर्ट ने रोक लगाने जैसे निर्देश दिए. बच्चों के आधार के लिए मातापिता की सहमति जरूरी मानी गई और वयस्क होने पर आधार से बाहर निकलने का सैद्धांतिक अधिकार स्वीकार किया गया.

निजी क्षेत्र में इस्तेमाल: आधार कानून की धारा 57 के तहत निजी कंपनियों को भी आधार के इस्तेमाल की गुंजाइश दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने इसे बड़े पैमाने पर पढ़कर घटा दिया और कहा कि निजी संस्थान महज़ कॉन्ट्रैक्ट के जरिए आधार की मांग कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं कर सकते. भविष्य में संसद चाहे तो अलग कानून के जरिए कुछ खास सेक्टर में आधार का इस्तेमाल बढ़ा सकती है, लेकिन तब भी उसे गोपनीयता और अनुपातिकता की कसौटियों पर खरा उतरना होगा.

5- विवाद होता तो है, पर निर्णायक नहीं बन पाता

इस मामले में लोगों की मिलीजुली धारणा है. एक तरफ़ बहुत से लोग आधार को आसानी और सुविधा का साधन मानते हैं. एक ही आईडी से बैंक, सब्सिडी, मोबाइल, सब काम हो जाते हैं. दूसरी तरफ़ अधिकारसमर्थक समूह, वकील, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ इसकी खामियों और खतरों पर जोर देते हैं.

आम मतदाता के लिए यह रोज़मर्रा की सुविधा बनाम अमूर्त निजता और संवैधानिक सवालों के बीच का मामला बन जाता है, जिसमें सुविधा का पक्ष ज़्यादा दिखता है. चुनावों में अक्सर रोज़गार, महंगाई, जातीय समीकरण, स्थानीय विकास आदि मुद्दे प्राथमिक रहते हैं. आधार पर बहस मीडिया, अदालतों और विशेषज्ञों के बीच अधिक दिखती है, आम चुनावी विमर्श में यह उतनी तेज़ नहीं रह पाती.

वैकल्पिक मॉडल की है कमी

गरीबीरहित लक्षित सब्सिडी, फर्जी लाभार्थी, लीकेज रोकने जैसे लक्ष्यों को लेकर अधिकतर दल सहमत हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद आधार के बदले बेहतर, व्यावहारिक और व्यापक रूप से स्वीकार्य वैकल्पिक मॉडल अभी तक सामने नहीं आ पाया है. इसलिए विपक्ष भी अधिकतर इसके क्रियान्वयन और गोपनीयता से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाता है, न कि पूरे प्रोजेक्ट को जड़ से खत्म करने की मांग को अपने एजेंडा का केंद्र बनाता है.

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