इसमें कोई शक नहीं है कि एआई के असर का डर वास्तविक है ! ………..

पिछले दो हफ्तों में सबसे बुरे डर सच हो गए हैं। एआई की संभावनाओं और जोखिमों के बारे में वैज्ञानिक-विद्वान एलन ट्यूरिंग ने 70 साल पहले ही बता दिया था। ऐसा लगता है कि बाजार में वह क्षण आ गया है, जब डर सच हो जाता है। दो हफ्ते से भी कम समय में भारत […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 19 फरवरी 2026, 03:39 AM 6 मिनट read
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इसमें कोई शक नहीं है कि एआई के असर का डर वास्तविक है ! ………..
Photo: UB India News Archive

पिछले दो हफ्तों में सबसे बुरे डर सच हो गए हैं। एआई की संभावनाओं और जोखिमों के बारे में वैज्ञानिक-विद्वान एलन ट्यूरिंग ने 70 साल पहले ही बता दिया था। ऐसा लगता है कि बाजार में वह क्षण आ गया है, जब डर सच हो जाता है। दो हफ्ते से भी कम समय में भारत के आईटी शेयरों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई और डर बना हुआ है कि टीसीएस व इंफोसिस जैसी बड़ी आईटी कंपनियों का बाजार पूंजीकरण एक-तिहाई कम होकर 2022-23 के स्तर पर आ जाएगा। यह सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया भर में, सॉफ्टवेयर और सेवा प्रदाता कंपनियों के बाजार मूल्य में खरबों डॉलर का नुकसान हुआ है।

2023 की तेजी, जब विश्लेषकों ने निवेशकों को सॉफ्टवेयर के शेयर खरीदने के लिए उकसाया था, की जगह अब मंदी वाले ‘एआई डिस्काउंट’ ने ले ली है। सिद्धांत अक्सर ध्यान और ठोस सबूत का इंतजार करते हैं। 2017 की शुरुआत में, कंप्यूटर वैज्ञानिक आशीष वासवानी ने अपने सात साथियों के साथ मिलकर दुनिया को बताया, ‘ध्यान देने की सबसे ज्यादा जरूरत है।’ इसी ‘अटेंशन मैकेनिज्म’ की अवधारणा से चैटजीपीटी लॉन्च हुआ। असल में, शब्द-दर-शब्द पढ़ने के बजाय, मशीनें पूरे वाक्य पढ़ सकती हैं और इसलिए संदर्भ समझकर नतीजा निकाल सकती हैं।

सॉफ्टवेयर सेवाओं में ह्यूमन इंटरफेस का खतरा हमेशा बना रहता है। फिर भी, कोई पुराने दिग्गजों के खिलाफ दांव नहीं लगाता, क्योंकि आखिर, उम्मीद पर ही दुनिया कायम है। अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपनी पुस्तक द ओल्ड मैन एंड द सी में लिखा था, ‘उम्मीद न करना मूर्खता है।’ क्लाउड कोड के आने से उम्मीद की जगह निराशा और डर ने ले ली, जिससे वैल्यूएशन में एकतरफा रास्ता बन गया। पीटर स्टीनबर्गर का बनाया एआई एजेंट ओपन क्लॉ, चैटजीपीटी या डीपसीक जैसे मॉडल पर काम कर सकता है, व्हाट्सएप जैसी मैसेजिंग सर्विस के साथ संवाद कर सकता है, फाइलें प्रबंधित करने, सफाई करने या ब्राउज करने जैसे काम कर सकता है और ई-मेल का जवाब दे सकता है।

ये सफलताएं 2017 की गणितीय सफलता की ताकत दिखाती हैं। ह्यूमन इंटरफेस का कम होना एक संरचनात्मक बदलाव दिखाता है। यह बदलाव (पहले के ऑटोकंप्लीट युग से ऑटोमेटेड इंजीनियर युग में) हर तरह से ढांचागत है। पहले मशीन किसी प्रक्रिया में सह-भागीदार थी, जिससे तेज कोडिंग हो पाती थी। अब मशीन खुद कोड चलाती है, गलती देखती है और तब तक खुद को ठीक करती रहती है, जब तक वह काम न कर जाए। सीपीयू से जीपीयू-आधारित कोडिंग में स्थानांतरण, हर घंटे की बिलिंग से परिणाम के शुल्क में बदलाव को तेज करता है।

इस हफ्ते शेयरों की कीमतों में गिरावट सुर्खियों में है, पर यह बड़ी खबर नहीं है। आईटी और आईटी से जुड़ी सेवा देने वाली कंपनियां भारत की सबसे बड़ी निर्यातक हैं, जो लगभग 300 अरब डॉलर का राजस्व लाती हैं। आईटी क्षेत्र हाल तक सबसे बड़ा औपचारिक नियोक्ता भी था और सभी क्षेत्रों में खपत भी बढ़ाता है। सिर्फ सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में ही 50 लाख से अधिक लोग काम करते हैं। भर्तियों में कमी और रोजगार के नुकसान के चलते अब जोखिम दोगुना है। जेनरेटिव एआई आने के तुरंत बाद, एक सर्वे से पता चला कि 80 प्रतिशत सीईओ न केवल सेवा क्षेत्र में, बल्कि विनिर्माण क्षेत्र में भी एआई इस्तेमाल करने की योजना बना रहे थे। मशीनों की काम पूरा करने की क्षमता ने अलग-अलग क्षेत्रों में हजारों प्रवेश स्तर की नौकरियां खत्म कर दी हैं।

अमेरिका में युवा कामगार (22-27 साल) के लिए बेरोजगारी दर 7.8 फीसदी से अधिक है। भारत में, शीर्ष पांच आईटी कंपनियां 2025 के पहले नौ महीनों में अपनी संयुक्त भूमिकाओं में सिर्फ 17 नए लोगों को जोड़ पाईं। यह सच है कि एआई नौकरियां पैदा कर सकता है, पर इसमें व्यवसाय मॉडल की कई परतों को खत्म करने की भी क्षमता है। इससे भर्ती में देरी और बढ़ेगी तथा खपत में एक खास आर्थिक मंदी शुरू हो सकती है। वर्ष 2022 में चैटजीपीटी की शुरुआत के बाद से, दुनिया में 1.1 अरब से अधिक एआई उपयोगकर्ता जुड़े हैं, जिनमें से बीस फीसदी से अधिक चैटजीपीटी पर हैं।

अमेरिका का ऑटोमेशन की तरफ बढ़ने का एक भू-राजनीतिक मकसद भी है। 9/11 के बाद, अमेरिका ने ऊर्जा स्वतंत्रता के लिए नीतियों को फिर से तैयार किया। 2007 के ऊर्जा स्वतंत्रता एवं सुरक्षा अधिनियम ने अनुसंधान के लिए 25 अरब डॉलर का कोष बनाया और 2017 तक, अमेरिका शीर्ष तेल उत्पादक बन गया। स्वचालन और स्वायत्तता प्रक्रिया पर उसने अचानक ध्यान केंद्रित नहीं किया है। यह ‘आयातित श्रम’ और आप्रवासन पर निर्भरता कम करने का रास्ता है। 2016 में, अमेरिकी नेशनल सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी सेंटर ने एआई इंस्टीट्यूट के एक नेटवर्क के जरिये ‘एआई की अगली पीढ़ी में निवेश’ के लिए एक रणनीतिक योजना पेश की। 2017 के टैक्स कट्स एंड जॉब्स एक्ट ने कंपनियों को 100 फीसदी छूट देकर निवेश करने की गुंजाइश दी, जिससे इन्सानों की जगह चिप और लार्ज लैंग्वेज एआई मॉडल्स में निवेश बढ़ा।

इस हफ्ते, भारत सरकार एआई इंपैक्ट समिट की मेजबानी कर रही है। अतिथियों की सूची तो शानदार है, लेकिन फोकस क्या है? अनुमान है कि भारत डाटा जेनरेट करने वाली शीर्ष अर्थव्यवस्था में से एक है-144 करोड़ लोगों का हर क्लिक डाटा है। सरकार इस ताकत, घरेलू अर्थव्यवस्था के पैमाने और हुनरमंद कार्यबल का इस्तेमाल करके देश के लिए क्या करने की योजना बना रही है? क्या यह शिखर सम्मेलन पूरे भारत में एआई-सक्षम समाधान के लिए भागीदारी को मुमकिन बनाएगा?

इसमें बहुत अधिक संभावना है। उदाहरण के लिए, भारत निवारक स्वास्थ्य की खातिर एक प्लेटफॉर्म बनाने के लिए गूगल के साथ भागीदारी कर सकता है। शिक्षक की जगह एआई शिक्षक बन सकता है। भारत की अंतरिक्ष और भू-स्थानिक क्षमताएं जानी-मानी हैं। इन्हें एआई एप्स के साथ मिलाकर किसानों को मिट्टी और मौसम की स्थिति का अंदाजा लगाने, मांग का अनुमान लगाने और मौसम के हिसाब से फसल चुनने में मदद की जा सकती है। एआई ट्रैफिक के आधार पर सड़कों व मेट्रो की योजना बनाने में भी शहरों की मदद कर सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि एआई के असर का डर वास्तविक है। इसके लिए नीतियों पर फिर से सोचने की जरूरत है। भारतीय समस्याओं तथा भारतीय संदर्भ के हिसाब से एआई का इस्तेमाल करने से नौकरियां पैदा होंगी और करोड़ों भारतीयों के लिए जिंदगी आसान होगी। इससे अच्छी सेहत, बेहतर आय, सांस लेने के लिए बेहतर हवा और जीडीपी में बेहतर वृद्धि होगी। ऐसा करते समय, यह याद रखना उपयोगी होगा कि ‘ध्यान देना’ मायने रखता है।

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