बदलते सियासी पदचिह्न: विपक्ष को रणनीतियों पर पुनर्विचार की जरूरत, बढ़ रही भाजपा की वैचारिक स्वीकार्यता

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल व पुदुचेरी में विधानसभा चुनावों के नतीजे भारतीय राजनीति के नक्शे को फिर से आकार देने वाले तो हैं ही, इन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक धाराओं के दिशासूचक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें भाजपा अपनी पैठ वहां तक बढ़ा रही है, जहां उसके राजनीतिक पदचिह्न अब तक नहीं […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 5 मई 2026, 02:52 AM 6 मिनट read
लाइव टेक्स्ट हाइलाइटिंग के साथ सुनें
शेयर करें:
WhatsAppFacebookXTelegram
बदलते सियासी पदचिह्न: विपक्ष को रणनीतियों पर पुनर्विचार की जरूरत, बढ़ रही भाजपा की वैचारिक स्वीकार्यता
Photo: UB India News Archive

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल व पुदुचेरी में विधानसभा चुनावों के नतीजे भारतीय राजनीति के नक्शे को फिर से आकार देने वाले तो हैं ही, इन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक धाराओं के दिशासूचक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें भाजपा अपनी पैठ वहां तक बढ़ा रही है, जहां उसके राजनीतिक पदचिह्न अब तक नहीं पड़े थे, जबकि विपक्षी दलों के लिए अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने की जरूरत स्पष्ट दिख रही है। पश्चिम बंगाल को ही लें, जहां एक दशक पहले तक भाजपा  हाशिये की पार्टी थी, पर 2016 की तुलना में उसके वोट प्रतिशत में करीब 35 फीसदी का भारी उछाल और पहली बार राज्य की सत्ता पर काबिज होना कभी वामपंथ और फिर तृणमूल के अभेद्य दुर्ग माने जाने वाले इस राज्य में उसकी वैचारिक स्वीकार्यता का ही प्रमाण है। ममता की हार के पीछे पंद्रह वर्षों का सत्ता विरोधी रुझान तो था ही, कानून-व्यवस्था की कमजोरी, महिलाओं की असुरक्षा, उद्योग धंधों का बंद होना और एक खास तबके के प्रति तुष्टिकरण की नीति भी मुख्य कारण रहे। लेकिन इसका श्रेय प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली भाजपा के उस माइक्रो मैनेजमेंट को भी जाता है, जिसकी बदौलत 2014 के बाद से पहले उसने उत्तर व मध्य भारत में अपने आधार को ताकत दी तथा अब वह पूर्वी व पूर्वोत्तर भारत में परिवर्तन का चेहरा बनकर उभर रही है। पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व जीत और असम में लगातार तीसरी बार वापसी भाजपा को एक तरह से मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाती है, जिसने यह मिथक तोड़ दिया कि वह पूर्वी भारत के सांस्कृतिक-राजनीतिक ढांचे में स्थायी जगह नहीं बना सकती। हालांकि, असम में मिली जीत का श्रेय हिमंत बिस्वा सरमा को भी जाता है, जिनकी पहचान, सुरक्षा, विकास और क्षेत्रीय अस्मिता आधारित रणनीति ने विपक्ष को हाशिये पर धकेल दिया। केरल में हालांकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को जीत मिली है, पर चाहे तमिलनाडु हो, महाराष्ट्र हो, उत्तर प्रदेश हो या फिर बिहार, सभी जगहों पर क्षेत्रीय सहयोगियों पर उसकी निर्भरता देख यही लगता है कि वह अपने पुराने राजनीतिक वैभव का अक्स मात्र ही रह गई है। तमिलनाडु में द्रमुक और असम में कांग्रेस का प्रदर्शन विपक्षी दलों की रणनीतियों पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जहां इनके नेतृत्वकर्ता ही अपनी सीट नहीं बचा सके। ये नतीजे भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तो बढ़ाएंगे ही, विपक्ष को भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करेंगे। इसका फायदा भाजपा को अगले वर्ष यूपी, उत्तराखंड और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में तो मिलेगा ही, इस जीत की गूंज राष्ट्रीय राजनीति में भी यकीनन सुनाई देगी।

2021 से मिले सबक, जिनसे बीजेपी ने बदली रणनीति और ढहा दिया ‘दीदी का किला’

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि रणनीतिक बदलाव की कहानी भी है. 2021 में मिली करारी हार के बाद बीजेपी ने आत्ममंथन किया, अपनी कमजोरियों को पहचाना और उसी के आधार पर नई चुनावी रणनीति तैयार की. इस बार पार्टी ने आक्रामकता से ज्यादा संतुलन, चेहरों से ज्यादा संगठन और नारों से ज्यादा जमीनी मुद्दों पर भरोसा किया, जिसका नतीजा सीधे तौर पर नजर आया.

डायरेक्ट अटैक से परहेज, नैरेटिव की नई रणनीति

2021 के चुनाव में बीजेपी का कैंपेन काफी हद तक ममता बनर्जी पर केंद्रित था. ‘दीदी vs बीजेपी’ का सीधा मुकाबला बनाकर पार्टी ने चुनाव को व्यक्तित्व आधारित बना दिया था, जिसका फायदा टीएमसी को मिला. लेकिन 2026 में बीजेपी ने इस रणनीति को पूरी तरह बदला. इस बार ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत हमलों से दूरी बनाई गई और फोकस सरकार की नीतियों, प्रशासनिक विफलताओं और स्थानीय असंतोष पर ज्यादा रखा गया. इससे चुनाव का नैरेटिव व्यक्ति से हटकर मुद्दों पर शिफ्ट हो गया, जो बीजेपी के लिए ज्यादा अनुकूल साबित हुआ.

VIP चेहरे नहीं, जमीनी कार्यकर्ताओं पर दांव

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कई हाई-प्रोफाइल चेहरों और दल-बदलुओं को टिकट दिया था, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष उपजा था. इस बार (2026) की चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए, पार्टी ने VIP चेहरों के बजाय जमीनी कार्यकर्ताओं (Grassroots Workers) पर दांव लगाया है. इसका दोहरा फायदा हुआ. एक तरफ कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर चुनावी मैनेजमेंट ज्यादा प्रभावी हुआ.

आंतरिक कलह पर सख्ती, एकजुटता पर जोर

बीजेपी की एक पुरानी रणनीति रही है कि चुनाव के समय संगठन के भीतर विरोध को पनपने नहीं दिया जाता. 2021 में यह संतुलन कुछ हद तक बिगड़ा था, लेकिन 2026 में पार्टी ने इसे अपनी प्राथमिकता बनाया. टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक, हर स्तर पर असंतोष को तुरंत संभाला गया. वरिष्ठ नेतृत्व ने लगातार मॉनिटरिंग की, जिससे पार्टी एकजुट नजर आई. यह एकजुटता चुनावी मैदान में सीधे तौर पर असर डालती दिखी.

लोकल मुद्दों पर सीधा हमला

इस बार बीजेपी ने राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय समस्याओं को अपना हथियार बनाया. पंचायत स्तर से लेकर शहरी इलाकों तक, बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, कटमनी, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया गया. इस रणनीति ने बीजेपी को बाहरी पार्टी के टैग से बाहर निकलने में मदद की और उसे एक लोकल विकल्प के रूप में स्थापित किया.

महिला सुरक्षा बना बड़ा चुनावी मुद्दा

महिला सुरक्षा इस चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे प्रभावी मुद्दों में से एक बनकर उभरा. पार्टी ने संदेशखाली और आरजी कर जैसे मामलों को लगातार उठाया और इसे कानून-व्यवस्था की विफलता से जोड़ा. सबसे अहम बात यह रही कि बीजेपी ने सिर्फ मुद्दा उठाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पीड़ित महिलाओं को चुनावी प्रक्रिया में शामिल किया. उन्हें टिकट दिया और मंच पर जगह दी. इससे पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह महिलाओं की आवाज को सीधे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलना चाहती है.

‘पीड़िता से प्रत्याशी’ संदेश की ताकत

संदेशखाली से लेकर आरजी कर तक, जिन महिलाओं ने अत्याचार झेला, उन्हें या उनके परिजनों को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारा. यह कदम प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक भी था. इससे बीजेपी ने एक मजबूत भावनात्मक और नैतिक नैरेटिव तैयार किया कि वह सिर्फ विरोध नहीं कर रही, बल्कि बदलाव का मंच भी दे रही है. इसका असर महिला वोटर्स पर खास तौर पर देखने को मिला.

रणनीति बदली, समीकरण बदले

2021 की हार से सीखे गए सबक. जैसे ओवर-अटैक से बचना, संगठन को मजबूत करना, लोकल मुद्दों पर फोकस और सही उम्मीदवार चुनना. इन सभी ने मिलकर बीजेपी की जीत की नींव रखी.

UB India News

UB India News

बिहार और देश-दुनिया की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं की निष्पक्ष व सटीक रिपोर्टिंग।

संबंधित खबरें (Related Stories)

9 Articles loaded
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत: एक संबोधन से आगे, भारत की पहचान और वैश्विक विमर्श की बड़ी परीक्षा……………..
राष्ट्रीय

न्यूयॉर्क में मोहन भागवत: एक संबोधन से आगे, भारत की पहचान और वैश्विक विमर्श की बड़ी परीक्षा……………..

न्यूयॉर्क की धरती पर जब किसी भारतीय नेता या विचारक की आवाज गूंजती है, तो वह केवल एक शहर के सभागार तक सीमित नहीं रहती। न्यूयॉर्क दुनिया की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक राजधानी जैसा महत्व रखने वाला शहर है। यहां कही गई बात भारत में भी सुनी जाती है और दुनिया के अनेक हिस्सों में […]

UB India News29 अग॰
अजीत डोभाल का चीन दौरा क्यों अहम?
खास खबर

अजीत डोभाल का चीन दौरा क्यों अहम?

भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में काफी ज्यादा उतार-चढ़ाव आया है. एक ओर दोनों देश व्यापार, वैश्विक मंचों और बहुपक्षीय संगठनों में साथ दिखते हैं तो दूसरी ओर हिमालयी सीमा पर तनाव ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है. ऐसे वक्त में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए अजीत डोभाल […]

UB India News27 अग॰
पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान के बयान के बाद किराना हिल्स क्यों चर्चा में है…………
खास खबर

पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान के बयान के बाद किराना हिल्स क्यों चर्चा में है…………

पूर्व सीडीएस जनरल अनिल जौहान के एक बयान के बाद पाकिस्तान के किराना हिल्स की चर्चा जोरों पर है. भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि बीते साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उस किराना हिल्स पर कोई हमला नहीं किया गया. बल्कि भारत ने ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के सरगोधा इलाके में तैनात […]

UB India News26 अग॰
‘दिमागी नक्सल’ से इतने आहत क्यों है कांग्रेस के नेता ……………….
खास खबर

‘दिमागी नक्सल’ से इतने आहत क्यों है कांग्रेस के नेता ……………….

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीति को ऐसे-ऐसे शब्द दिए हैं, जो उनके समर्थकों को जितना पसंद आते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके विरोधियों को बेधते हैं। शब्द की पहुंच और सफलता को इन दोनों ही परिस्थितियों से समझा जा सकता है। दिल्ली के 2020 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने पहली बार आंदोलनजीवी शब्द का […]

UB India News24 अग॰
भाजपा की रणनीति को कितनी धार देगी नितिन की नई टीम…………..
राष्ट्रीय

भाजपा की रणनीति को कितनी धार देगी नितिन की नई टीम…………..

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा घोषित नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश समेत अगले वर्ष विधानसभा चुनावों वाले राज्यों को जिस तरह प्रतिनिधित्व दिया गया है, उससे साफ है कि भाजपा ने संगठनात्मक पुनर्संरचना के बहाने आने वाले चुनावों की राजनीतिक बिसात भी बिछानी शुरू कर दी है। दरअसल, भाजपा की […]

UB India News19 अग॰
जनगणना 2027: आंकड़ों की लड़ाई या सत्ता के नए समीकरण को लेकर क्यों मचा है घमासान………………….
राष्ट्रीय

जनगणना 2027: आंकड़ों की लड़ाई या सत्ता के नए समीकरण को लेकर क्यों मचा है घमासान………………….

जनगणना को लेकर इस समय जो सियासी घमासान है, उसकी जड़ सिर्फ जनसंख्या की गिनती नहीं, बल्कि जातिगत आंकड़े, आरक्षण, सामाजिक न्याय और भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हुई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनगणना 2027 में पहली बार स्वतंत्र भारत में व्यापक जाति-गणना शामिल की जा रही है। केंद्र सरकार ने 30 […]

UB India News19 अग॰
नितिन नवीन की नई टीम का एलान, 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आठ महामंत्री बनाए गए…………
राष्ट्रीय

नितिन नवीन की नई टीम का एलान, 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आठ महामंत्री बनाए गए…………

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को पार्टी के नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों के नामों का एलान कर दिया। पार्टी की ओर से जारी सूची के मुताबिक, नई टीम में कई वरिष्ठ नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं। नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। नई टीम में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री […]

UB India News17 अग॰
वंदे मातरम् पर सियासी घमासान: राष्ट्रगीत से राजनीति तक
राष्ट्रीय

वंदे मातरम् पर सियासी घमासान: राष्ट्रगीत से राजनीति तक

भारत की स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ का अवसर देश के लिए गौरव, स्मरण और आत्ममंथन का दिन होना चाहिए था। लेकिन इस बार स्वतंत्रता दिवस के आसपास राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों […]

UB India News16 अग॰
79 साल की लोकतांत्रिक यात्रा में भारत ने काफी दूरी तय की है…..
राष्ट्रीय

79 साल की लोकतांत्रिक यात्रा में भारत ने काफी दूरी तय की है…..

आजादी सिर्फ सत्ता या व्यवस्था से मुक्ति का नाम नहीं, बल्कि हर नागरिक के अपने हिस्से की स्वतंत्रता, सम्मान और बेहतर जीवन की तलाश है. 79 साल की लोकतांत्रिक यात्रा में भारत ने भूख, गरीबी, अशिक्षा और अभावों से काफी दूरी तय की है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए आजादी के मायने अब बदल गए […]

UB India News15 अग॰