हममें से जो लोग घूम-घूमकर आम भारतीयों से बातचीत करते हैं, वे काफी समय से पश्चिम एशिया के संकट को लेकर जिन चिंताओं की बात कर रहे थे, वे अब असल में दिखाई पड़ने लगी हैं। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी संकट की गंभीरता को देखते हुए देशवासियों से ईंधन की खपत कम […]
By UB India News • Patna, Bihar गुरुवार, 21 मई 2026, 07:05 AM • 8 मिनट read
हममें से जो लोग घूम-घूमकर आम भारतीयों से बातचीत करते हैं, वे काफी समय से पश्चिम एशिया के संकट को लेकर जिन चिंताओं की बात कर रहे थे, वे अब असल में दिखाई पड़ने लगी हैं। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी संकट की गंभीरता को देखते हुए देशवासियों से ईंधन की खपत कम करने, सार्वजनिक परिवहन और वर्क फ्रॉम होम (घर से काम करना) को बढ़ावा देने की अपील की। विदेशी मुद्रा भंडार की रक्षा के लिए उन्होंने एक वर्ष तक सोना न खरीदने और गैर-जरूरी विदेश यात्राओं पर रोक लगाने का अनुरोध किया। साथ ही, खाद्य तेल और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की अपील की, ताकि आयात और सब्सिडी का बोझ कम हो सके। उन्होंने स्वदेशी उत्पादों को अपनाने पर भी जोर दिया और इन कदमों को वैश्विक संकटों के खिलाफ भारत की ‘आर्थिक आत्मरक्षा’ बताया।
प्रधानमंत्री की अपील ने मुझे राजस्थान के भरतपुर में किसानों से हुई बातचीत की याद दिला दी। दस बीघा जमीन वाले एक गेहूं उत्पादक किसान ने कहा कि उसे उर्वरकों की कमी का डर है और वह सरसों तथा आने वाले खरीफ मौसम के लिए पहले से उर्वरक का ‘भंडारण’ कर रहा है। उसने कहा, ‘पता नहीं कि आगे क्या होने वाला है।’ उसे हर चीज की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी का डर सता रहा था। इस वर्ष अप्रैल में, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो प्रेरणा गांधी के एक लेख में यह बात सामने आई कि तेल की तुलना में दूसरे रास्तों से गैस की आपूर्ति ज्यादा मुश्किल है। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू रिफाइनरियों को फिर से व्यवस्थित करके घरेलू एलपीजी उत्पादन में लगभग 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि, एलएनजी पर निर्भरता अब भी बनी हुई है, क्योंकि सिटी गैस वितरण, उर्वरक संयंत्रों और कांच/सिरेमिक उद्योगों का एक बड़ा हिस्सा एलएनजी पर ही निर्भर है। भारतीय उर्वरक संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाली 86 फीसदी एलएनजी पश्चिम एशिया से आती है। इसकी आपूर्ति में बाधा खरीफ की फसल को खतरे में डाल सकती है। भारत अब जॉर्डन और मिस्र से फॉस्फेट आयात कम करके मोरक्को, सेनेगल और रूस की ओर रुख कर रहा है। साथ ही, अमोनिया की जरूरतों का लगभग 60 फीसदी हिस्सा तथा सल्फर आधारित उर्वरकों का 70 फीसदी सऊदी अरब व ओमान से खरीदता है। ये दोनों ही किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
प्रधानमंत्री ने संयम बरतने की यह अपील तब की है, जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं पहले से ही कमजोर बनी हुई हैं और लाल सागर क्षेत्र में जारी बाधाओं ने माल ढुलाई की लागत व महंगाई को बढ़ा दिया है। पहले ही मानसून की अनिश्चितता और खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे ग्रामीण परिवार इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे। ऐसे में, छोटे किसानों और करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों की सुरक्षा के लिए लक्षित सहायता उपाय जरूरी हैं। इसमें जैविक कृषि इनपुट को बढ़ावा देना, स्थानीय स्तर पर उर्वरक उत्पादन और चरणबद्ध तरीके से सब्सिडी सुधार शामिल हो सकते हैं। बेशक स्थिति गंभीर है, पर निराशा विकल्प नहीं है।
अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री की अपील के मद्देनजर चुने हुए प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी खुद मिसाल कायम करते दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों से वर्क फ्रॉम होम अपनाने की अपील की है, लेकिन हर कोई घर से काम नहीं कर सकता। ऐसे में गिग वर्कर्स, डिलीवरी कर्मियों, निर्माण मजदूरों और किसानों का क्या होगा? हर संकट में, सबसे ज्यादा मार गरीबों पर ही पड़ती है। भारत की अर्थव्यवस्था असंगठित क्षेत्र पर टिकी है, जिसमें लाखों दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के अनुसार, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में सामने आया कि 2024 में आत्महत्या करने वालों में 31 फीसदी दिहाड़ी मजदूर थे, जो पिछले एक दशक में सर्वाधिक है। 2024 में कुल 52,910 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की। हालात पहले से ही ठीक नहीं थे, युद्ध ने और उसे भी बदतर बना दिया।
इसमें संदेह नहीं कि भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, पर वह युवाओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा नहीं कर पा रही। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग में स्नातक बेरोजगारी दर लगभग 40 फीसदी और 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग में करीब 20 फीसदी है। भारत की जनता बड़े-बड़े संकटों को झेलती आई है, लेकिन वर्तमान स्थितियों को देखते हुए उनमें भरोसा कायम करना जरूरी है।
25 लाख लोग गरीबी के मुहाने पर !
भारत पिछले कुछ वर्षों से दुनिया के सामने खुद को तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के तौर पर पेश कर रहा है. नीति आयोग (NITI Aayog) के मुताबिक बीते करीब 9 साल में 25 करोड़ से ज्यादा लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं. गांवों में बिजली, मुफ्त राशन, बेहतर सड़कें और डिजिटल योजनाओं ने करोड़ों परिवारों की जिंदगी बदली है. लेकिन अब पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव इस पूरी कहानी को बड़ा झटका दे सकता है. ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर के बाजारों को चिंता में डाल दिया है. सबसे बड़ा डर कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है. अगर ब्रेंट क्रूड 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है तो भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देश के लिए मुश्किलें तेजी से बढ़ सकती हैं. इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाने पीने की चीजों से लेकर रोजगार तक हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है.
भारत में बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जो हाल के वर्षों में गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर पहुंचे हैं. उनकी आमदनी अभी भी बहुत मजबूत नहीं मानी जाती. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी (UNDP) पहले ने चेतावनी दी है कि गरीबी दर में मामूली बढ़ोतरी भी लाखों लोगों को फिर संकट में धकेल सकती है. UNDP के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो भारत में गरीबी दर 23.9% से बढ़कर 24.2% हो सकती है. इसका मतलब है कि करीब 25 लाख और लोग गरीबी रेखा के नीचे आ सकते हैं. इससे देश में कुल गरीबों की संख्या 35.4 करोड़ तक पहुंच सकती है. अगर महंगाई तेजी से बढ़ती है तो सबसे पहले असर इन्हीं परिवारों पर पड़ता है. रसोई गैस, दूध, सब्जी, ट्रांसपोर्ट और किराए का खर्च बढ़ते ही उनका पूरा बजट बिगड़ जाता है. यानी जिन परिवारों ने अभी हाल में आर्थिक राहत महसूस की थी, वे दोबारा मुश्किल हालात में पहुंच सकते हैं.
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. ऐसे में पश्चिम एशिया में कोई भी बड़ा संकट सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है. अगर तेल महंगा होता है तो ट्रक, ट्रेन और शिपिंग का खर्च बढ़ता है. इसका असर नमक, आटा, दाल, सब्जी, सीमेंट और कपड़ों तक हर चीज पर दिखाई देता है. विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में लगातार उछाल सरकार के लिए भी बड़ा सिरदर्द बन सकता है. सरकार को गरीबों के लिए राशन और सब्सिडी पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है. इससे इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं के लिए उपलब्ध बजट पर दबाव बढ़ेगा.
इंडस्ट्रियल हब में बढ़ सकता है तनाव
नोएडा, मानेसर, तिरुपुर और सूरत जैसे इंडस्ट्रियल इलाकों में पहले से लागत बढ़ने का दबाव महसूस किया जा रहा है. कंपनियां महंगे कच्चे माल और कमजोर डिमांड के बीच खर्च घटाने की कोशिश कर रही हैं. कई जगह ओवरटाइम कम किए जा रहे हैं और बोनस रोकने की चर्चा है. ऐसे हालात लंबे समय तक बने रहे तो श्रमिक असंतोष बढ़ सकता है. इससे उत्पादन और सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा. भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ के लिए यह बड़ा खतरा माना जा रहा है.
आम आदमी की जेब पर डबल मार
महंगाई का सबसे बड़ा असर आम आदमी की खरीद क्षमता पर पड़ता है. जो पैसा पहले लोग मोबाइल, कपड़े, बाइक या बाहर खाने पर खर्च करते थे, वह अब पेट्रोल और जरूरी सामान में चला जाता है. इससे बाजार में मांग घटती है. जब मांग कम होती है तो फैक्ट्रियां उत्पादन घटाती हैं. उत्पादन घटने पर रोजगार पर असर पड़ता है. यही स्थिति धीरे-धीरे आर्थिक दुष्चक्र का रूप ले सकती है, जहां कमाई और खर्च दोनों कमजोर होने लगते हैं.
भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं
पश्चिम एशिया का संकट अब सिर्फ भू राजनीति या कूटनीति का मुद्दा नहीं रह गया है. भारत के लिए यह सीधा आर्थिक और सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है. सरकार ने पिछले कई सालों में गरीबी कम करने, मिडिल क्लास बढ़ाने और खपत मजबूत करने पर बड़ा जोर दिया है. लेकिन अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो इसका असर भारत की विकास दर, रोजगार और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति पर साफ दिखाई दे सकता है.