मिथिला की भाषा और संस्कृति को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. दरअसल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के पाठ्यक्रम में अब मैथिली भाषा को भी स्थान मिलेगा. इसको लेकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर जानकारी साझा की है. उन्होंने इस फैसले को मिथिला की सांस्कृतिक विरासत […]
By UB India News • Patna, Bihar सोमवार, 25 मई 2026, 11:25 AM • 6 मिनट read
मिथिला की भाषा और संस्कृति को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. दरअसल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के पाठ्यक्रम में अब मैथिली भाषा को भी स्थान मिलेगा. इसको लेकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर जानकारी साझा की है. उन्होंने इस फैसले को मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई गौरव के लिए ऐतिहासिक बताया है.
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि CBSE के सिलेबस में कक्षा 1 से माध्यमिक स्तर तक मैथिली भाषा को मातृभाषा विषय के रूप में मान्यता मिलना मिथिलांचल के लोगों के लिए गर्व की बात है. उन्होंने लिखा कि यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों को अपनी मातृभाषा, संस्कृति और जड़ों से जोड़ने का मजबूत माध्यम बनेगा.
‘भारतीय भाषाओं को मिल रही नई ताकत’
मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन को लगातार नई मजबूती मिल रही है. मैथिली को CBSE पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला इसी दिशा में एक बड़ा कदम है.
मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को मिलेगा बढ़ावा
मैथिली भाषा लंबे समय से मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान रही है. साहित्य, लोकगीत, कला और परंपरा में मैथिली की समृद्ध विरासत रही है. अब CBSE जैसे राष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड में इसे जगह मिलने से भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान और सम्मान मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.
छात्रों को मिलेगा मातृभाषा में पढ़ाई का मौका
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चों की समझ और सीखने की क्षमता बेहतर होती है. ऐसे में मैथिली भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करने से मिथिला क्षेत्र के लाखों छात्रों को सीधा लाभ मिलेगा. साथ ही नई पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से और मजबूती से जुड़ सकेगी.
एनडीए सरकार में मैथिली का बढ़ता गया सम्मान
मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भाषाई गौरव और सदियों पुरानी पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सम्मान मिला है . केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत मैथिली भाषा को अपने आधिकारिक पाठ्यक्रम में शामिल करने का बड़ा फैसला किया है . आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से सीबीएसई के स्कूलों में कक्षा 1 से लेकर माध्यमिक (नौवीं-दसवीं) स्तर तक मैथिली को मातृभाषा और एक स्वतंत्र विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा . केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी द्वारा दरभंगा के सांसद गोपाल जी ठाकुर को भेजे गए आधिकारिक पत्र से इस ऐतिहासिक निर्णय का खुलासा हुआ है . इस फैसले के बाद पूरे बिहार, विशेषकर मिथिला क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है.
आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का मजबूत माध्यम
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस निर्णय का पुरजोर स्वागत करते हुए इसे मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताया है . शिक्षाविदों का मानना है कि यह कदम आने वाली युवा पीढ़ियों को अपनी समृद्ध मातृभाषा, कालजयी साहित्य और प्राचीन जड़ों से जोड़ने का एक बेहद मजबूत माध्यम बनेगा . लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर के स्कूलों में मैथिली को स्थान देने की मांग की जा रही थी, जिसे नई शिक्षा नीति के मातृभाषा आधारित शिक्षण के सिद्धांत के तहत अब पूरा कर लिया गया है.
लालकृष्ण आडवाणी की पहल और अटल सरकार की मुहर
मैथिल समाज के लिए इस भाषाई अधिकार की लड़ाई सदियों पुरानी है. साल 2003 में तत्कालीन एनडीए (NDA) सरकार के समय देश के उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मैथिली के भाषाई महत्व को समझा और इसे संविधान की मुख्य धारा में लाने की पुरजोर पहल की थी. इसके बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने पर अंतिम मुहर लगाई थी. वाजपेयी सरकार के उसी फैसले के कारण मैथिली को एक संवैधानिक भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ, जिससे आज सीबीएसई जैसी राष्ट्रीय संस्था में इसके लिए रास्ते खुले हैं.
मोदी सरकार के वो बड़े फैसले जिन्होंने बढ़ाया मैथिली का मान
साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने मैथिली भाषा और मिथिला की संस्कृति को वैश्विक पटल पर ले जाने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले किए हैं:
- यूपीएससी (UPSC) मुख्य परीक्षा में स्थान: मोदी सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में मैथिली को एक वैकल्पिक विषय (Optional Subject) के रूप में पूरी मजबूती से बनाए रखा, जिससे प्रतिवर्ष दर्जनों छात्र आईएएस और आईपीएस अधिकारी बन रहे हैं.
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में विशेष महत्व: पीएम मोदी की नई शिक्षा नीति के तहत ही क्षेत्रीय भाषाओं को स्कूली स्तर पर अनिवार्य और वैकल्पिक विषय के रूप में लागू करने का प्रावधान किया गया, जो आज इस सीबीएसई आदेश का मुख्य आधार बना है.
- साहित्य अकादमी में निरंतर प्रोत्साहन: केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत मैथिली साहित्य और कवियों को बढ़ावा देने के लिए अनुवाद और युवा पुरस्कारों की श्रेणियों का विस्तार किया गया है.
- डिजिटल और तकनीकी समावेशन: मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान के तहत गूगल ट्रांसलेट और सरकारी पोर्टलों पर मैथिली लिपि (तिरहुता) और भाषा के तकनीकी समावेशन को लगातार गति दी गई है .
इन पहलों के साथ ही मैथिली भाषा को केवल आठवीं अनुसूची तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि अब भारतीय संविधान का आधिकारिक मैथिली संस्करण भी जारी किया जा चुका है. 26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मैथिली और संस्कृत में संविधान की प्रति का विमोचन किया था. इसे मिथिला की भाषा और सांस्कृतिक पहचान के लिए ऐतिहासिक कदम माना गया. हालांकि, यहां यह स्पष्ट कर दें कि यह “संविधान का आधिकारिक अनुवाद” है, लेकिन संविधान का प्रामाणिक विधिक पाठ (authoritative legal text) अभी भी हिंदी और अंग्रेजी ही माने जाते हैं. दरअसल, मैथिली संस्करण नागरिकों की भाषा में संविधान को समझाने और पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किया गया है.
राष्ट्रीय पहचान के दौर में मैथिली भाषा की यात्रा
बहरहाल, अब नये दौर में भी मैथिली भाषा के उत्थान की स्वर्णिम यात्रा जारी है, और अब सीबीएसई पाठ्यक्रम में मैथिली को शामिल करने का फैसला केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता, भाषाई गौरव और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है . संविधान के मैथिली संस्करण से लेकर नई शिक्षा नीति और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ती मौजूदगी तक, मैथिली अब राष्ट्रीय पहचान के नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है .