दुनिया कोई कूड़े का ढेर नहीं कि कोई मुर्गा दे बांग और बन जाए मसीहा……………………

एक विपक्षी नेता अपने आपको आश्वस्त कर रहे हैं कि एक दिन ‘जेन-जी’ आएंगे…हम उनको समझाएंगे…वे इस सत्ता को उखाड़ फेकेंगे। दूसरे कह रहे हैं कि अगर एक बार ‘जेन-जी’ को गुस्सा आ गया, तो इनको निपटा देगी। इन दिनों ऐसे ही सुर सुने जा रहे हैं कि कोई बस आए और हमारा काम कर […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 4 जून 2026, 03:50 AM 6 मिनट read
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दुनिया कोई कूड़े का ढेर नहीं कि कोई मुर्गा दे बांग और बन जाए मसीहा……………………
Photo: UB India News Archive

एक विपक्षी नेता अपने आपको आश्वस्त कर रहे हैं कि एक दिन ‘जेन-जी’ आएंगे…हम उनको समझाएंगे…वे इस सत्ता को उखाड़ फेकेंगे। दूसरे कह रहे हैं कि अगर एक बार ‘जेन-जी’ को गुस्सा आ गया, तो इनको निपटा देगी। इन दिनों ऐसे ही सुर सुने जा रहे हैं कि कोई बस आए और हमारा काम कर जाए, यानी हमें कुर्सी पर बिठा जाए। विपक्ष अपना ‘आत्मविश्वास’ इस कदर खो बैठा है कि गहन ‘आत्ममंथन’ करने और अपना रास्ता आप बनाने की जगह, वह आए दिन किसी नए ‘उद्धारकर्ता’ को खोजता फिरता है और उससे गुहार करता रहता है कि ‘हे मुक्तिदाता आओ और हमें बचाओ।’ पिछले दिनों से विपक्ष अपनी हार को स्वीकार करने की जगह आरोप लगाता रहता है कि हम हारे नहीं हैं, हराए गए हैं, कि चुनाव आयोग और सत्ता ने मिलकर एसआईआर के जरिये वोट चोरी की है, कि हमारी तयशुदा जीत को चुराया गया है, कि समूची सरकारें चुराई हैं, कि ये चुराया है, वो चुराया है। आप कहें कि पुलिस में चोरी की शिकायत करो, अदालत जाओ, तो कहते हैं कि सब मिले हुए हैं, कि इनके लोग सभी संस्थानों में घुस गए हैं, कि सभी ‘कंप्रोमाइज्ड’ हैं, न्याय व्यवस्था भी ‘कंप्रोमाइज्ड’ है, कि सब बिके हुए हैं।

इसीलिए, विपक्ष के कई नेता ‘सेमुअल बेकेट’ के ‘ऐब्सर्ड’ नाटक वेटिंग फॉर गोडो के ‘दो नायकों’ की तरह कभी ‘जेन-जी’ का और आजकल ‘कॉकरोचों’ का इंतजार करते रहते हैं कि हे ‘गोडो’ रूपी ‘जेन-जी कॉकरोच जी’ आप अवतारो और हमारा उद्धार करो, इस निरंकुशता और फासिज्म को कुर्सी से हटाओ और हमें बिठाओ, लेकिन मुआ ‘गोडो’ है कि आता ही नहीं…क्योंकि ‘गोडो’ हो, तो आए? कारण, ‘गोडो’ तो एक ‘विचार’ था, एक ‘आइडिया’ था, एक ‘फैंटेसी’ था, एक ‘मिथक’ था, जो स्वयं ‘क्षणभंगुर’ था। पिछले दिनों तो अपना विपक्ष इस कदर ‘मुत्युवादी’ हुआ है कि उसे हर चीज ‘डेड’, निर्जीव और ‘मृत’ नजर आने लगी। उसके अनुसार, देश में सब कुछ ‘डेड’ है, जैसे कि ‘इकोनॉमी डेड’, ‘संविधन डेड’,‘जनतंत्र डेड’ और ‘जनता डेड’। यह ‘जीवन साधना’ या ‘समाज साधना’ या ‘देश साधना’ या ‘राष्ट्र साधना’ नहीं है, बल्कि यह तो शुद्ध ‘शव साधना’ है, ‘मसान’ जगाना है। इस ‘शून्यवादी’ मानसिकता के आगे ‘मसानवाद’ ही आता है और लगता है कि अपना विपक्ष ‘डेड’ का भी ‘डैडी’ बन गया है। इस चक्कर में हमारे विपक्ष की ‘राजनीति’ भी ‘डेड’ हो गई है। उसमें एक ‘मरणेच्छा’, एक ‘डेथविश’ समा गई है या कहें एक ‘आत्महंता भाव’ समा गया है।

शायद इसीलिए, ‘आत्म विश्वास’ से रहित ऐसे कई विपक्षी नेता विदेश जाकर आह्वान कर चुके हैं कि आइए प्रभु! जनतंत्र बचाइए, यानी हमें बचाइए। कभी ‘जेन-जी’ का आह्वान करते, तो कभी ‘कॉकरोच पार्टी’ का। विपक्ष के कुछ नेताओं को देख ऐसा लगता है, जैसे कुछ डूबते लोग ‘तिनके का सहारा’ ढूंढ रहे हैं। इसीलिए, जो सामने पड़ जाता है, वे उसी के आगे ‘साष्टांग’ होते दिखते हैं। कुछ पहले कहते थे कि ‘जेन-जी प्रभु’ आप आओ और हमें बचाओ। अब कह रहे हैं कि ‘डिजिटल कॉकरोच जनता पार्टी’ आओ और हमें ‘फासिज्म’ से बचाओ। एक बड़े विपक्षी नेता तो ‘कॉकरोच पार्टी’ को देख ‘कॉकरोच मेनिफेस्टो’ जैसा बनाकर कहने लगे कि ‘दुनिया के कॉकरोचों एक हो’।

दूसरे ज्ञानी जी भी ‘कॉकरोच कल्चर’ के बारे में हमारे जैसे ‘कॉकरोचों’ को समझाने लगे कि ‘कॉकरोच पार्टी’ न ‘पार्टी’ है, न ‘जनता’ है, न यह ‘कम्युनिटी’ है, न ‘भीड़’ है। यह न ‘आंदोलन’ है, है तो एक ‘क्षण’ है और इसीलिए इसके ‘मानी’ हैं। यह एक अवसर है, एक झलक है। यह ‘लहर’ नहीं, एक ‘अंडरकरेंट’ है। यह भावनाओें का ‘पुंज’ है। यह वह दुर्लभ ‘ऊर्जा’ है, जो ‘अथॉरिटेरियन हमले’ से ग्रस्त ‘गणतंत्र’ को ‘रिक्लेम’ कर सकती है। लेकिन, यह कुल मिलाकर ‘सोशल मीडिया’ का ‘आभासी जगत’ ही है, जो ‘जमीनी’ नहीं है। यह ‘कॉकरोच विचार’ एक प्रकार का ‘सिंक्रोनाइज्ड आउटरेज’, यानी ‘एक साथ गुस्सा’ तो पैदा कर सकता है, पर, जमीनी आंदोलन नहीं बन सकता। यही इसका अंतर्विरोध है। यही ‘आभासी दुनिया’ और ‘पंचतत्व’ से बनी ‘दुनिया’ के बीच का फर्क है। ‘कॉकरोच विचार’ इसी तरह का विचार है, जो एक ‘आभासी क्षण’ तो बनाता है, लेकिन जमीन पर नहीं दिखता। ध्यान रहे, ‘कॉकरोच’ नाली का प्राणी है और ऐसा प्राणी नाली में ही जीता है। इस तर्क से, ‘कॉकरोच’ का ‘विचार’ नाली में ही ले जाएगा! सवाल उठता है कि क्या विपक्ष के पास अब यह ‘नाली’ या ‘कॉकरोच विचार’ ही बचा है! ऐसा ‘कॉकरोच विचार’ मूलतः और अंततः ‘सोशल मीडिया’ के ‘आभासी जगत’ का विचार है।

यह ‘आभासी जगत’ परंपरागत नेता की जगह ‘डिजिटल इन्फ्लुएंसर’ तो बना सकता है, जो किसी भी बात पर किसी ‘उत्तेजना’ को ‘एक्टिवेट’ कर सकता है, लाखों-करोड़ों ‘फॉलोअर्स’ बना सकता है, जो बहुतों को ‘क्रांतिकारी’ लग सकता है, पर ये ‘फॉलोअर्स’ कितने ‘सच’ हैं, कितने ‘फेक’ या ‘पेड’ हैं, यह नहीं बताया जाता। ‘कॉकरोच कल्चर’ के विशेषज्ञ बताते हैं कि ‘कॉकरोच’ स्वभाव से ‘शरारती’ होते हैं, वे दूसरे का मजाक उड़ा सकते हैं, लेकिन सत्ता नहीं पलट सकते। यही ‘कॉकरोच कल्चर’ का अंतर्विरोध है। ‘कॉकरोच कल्चर’ ताकतवर का मजाक उड़ा सकती है, ‘जोकर’ को ‘इन्फ्लुएंसर’ बना सकती है, पर कुछ क्षण के लिए ही। अधिकतम वह किसी क्षण, किसी ‘प्रतिक्रिया’ को ‘ट्रिगर’ तो कर सकती है, उसे ‘समेट’ नहीं सकती।

जैसे कोई ‘स्टैंडअप कॉमेडियन’ कुछ फीस के बदले अपने ‘मजाकों’ से लोगों को हंसाकर, उन्हें थोड़ी देर के लिए ‘खुश’ रख सकता है, लेकिन हर ऐसी बनाई गई ‘हंसी’ हर हंसने वाले के मन में एक ‘खला-सी’ पैदा कर देती है, जिसे भरने के लिए और बड़ी हंसी, और बड़ी ताली चाहिए, जिसके लिए और अधिक कीमत चाहिए। ‘कॉकरोच पार्टी’ इसी तरह की ‘शरारत’ भरी है। यह जितनी ‘स्वतःस्फूर्त’ है, उतनी ही ‘बनाई गई’ है। इसके ‘फॉलोअर्स’ भी ‘बनाए गए’ हैं। एक दिन एक बड़े चैनल के नामी एंकर ने अपने डिबेट शो में इसी बात का खुलासा किया कि चर्चित कॉकरोच पार्टी के फॉलोअर्स किस तरह से कुछ ही दिनों में बाईस लाख के आसपास हो गए। इतने फॉलोअर्स इतनी जल्दी अपने आप नहीं बनते। इनमें से अधिकांश फॉलोअर्स भारत से बाहर के कुछ देशों से हैं, जिनमें पाकिस्तान, फलस्तीन, ब्राजील और मलयेशिया के ‘फोलोअर्स’ शामिल हैं। ‘कॉकरोच पार्टी’ के ऐसे ‘आकुल आवाहनों’ को देख हमें मुक्तिबोध की यह लाइनें याद आती हैं जो कहती हैं-‘दुनिया कोई कूड़े का ढेर नहीं/कि कोई मुर्गा दे बांग/ और बन जाए मसीहा…’ स्पष्ट है कि आभासी दुनिया से जमीनी ताकत नहीं मिलती!

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