भरत तिवारी एनकाउंटर केस में मानवाधिकार आयोग का एक्शन

भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर केस में बड़ा अपडेट सामने आया. पटना से मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है. मुख्य सचिव और एसपी से मामले की रिपोर्ट तलब की गई है. चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देनी होगी. 13 जुलाई को मामले की समीक्षा की जाएगी. मामूल हो कि भरत तिवारी के एनकाउंटर को फेक […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
मंगलवार, 23 जून 2026, 09:12 AM 11 मिनट read
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भरत तिवारी एनकाउंटर केस में मानवाधिकार आयोग का एक्शन
Photo: UB India News Archive

भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर केस में बड़ा अपडेट सामने आया. पटना से मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है. मुख्य सचिव और एसपी से मामले की रिपोर्ट तलब की गई है. चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देनी होगी. 13 जुलाई को मामले की समीक्षा की जाएगी. मामूल हो कि भरत तिवारी के एनकाउंटर को फेक बताया जा रहा है. आरोप है कि सरेंडर करने के बाद युवक को पुलिस ने गोली मारी, और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई.

भोजपुर के भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर का मामला तूल पकड़ चुका है। सीनियर एडवोकेट विशाल तिवारी और नरेंद्र मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की है। जिसमें इसे ‘फर्जी एनकाउंटर’ बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

बिहार के भोजपुर जिले में पुलिस एनकाउंटर में भरत तिवारी की मौत को लेकर मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। एक वकील मुकेश कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने निष्पक्ष जांच और एनकाउंटर के लिए जिम्मेदार पाए गए पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। याचिकाकर्ता ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने मामले की फौरन सुनवाई का अनुरोध किया है।

भरत तिवारी एनकाउंटर पर पटना HC में जनहित याचिका

पटना हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका में भरत तिवारी की मौत के कारणों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। याचिका के मुताबिक, एनकाउंटर से पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें भरत तिवारी पिस्तौल लिए हुए दिखाई दे रहे थे। याचिकाकर्ता ने सवाल किया है कि अगर भरत वाकई हथियारबंद था, तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया या पिस्टस जब्त क्यों नहीं की। भरत तिवारी का परिवार लगातार आरोप लगा रहा है कि पूरा एनकाउंटर ही फर्जी था। उनके अनुसार, घटना के समय वह सरेंडर कर चुका था और निहत्था था।

घरवालों पर FIR को लेकर भी आपत्ति

विरोध प्रदर्शनों के बाद मृतक के पिता, भाई और कई ग्रामीणों के खिलाफ पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने पर भी आपत्ति जताई गई है। भोजपुर पुलिस का कहना है कि भरत तिवारी ने ऑपरेशन के दौरान पुलिस टीम पर 10 से 12 गोलियां चलाईं। पुलिस के अनुसार, अधिकारियों ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की, जिसके परिणामस्वरूप वह घायल हो गया। घायल भरत को पहले आरा सदर अस्पताल ले जाया गया और बाद में पटना के पीएमसीएच रेफर कर दिया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। बिहार सरकार ने घटना की न्यायिक जांच की घोषणा कर दी है। जांच एक सेवानिवृत्त हाई कोर्ट के जज द्वारा किए जाने की उम्मीद है।

  • पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
  • भरत तिवारी एनकाउंटर पर उठाए कई सवाल
  • निहत्थे के एनकाउंटर पर घिरी सम्राट सरकार
  • कैमूर से गोपालगंज तक विरोध प्रदर्शन

जनहित याचिका में उठाए गए सवाल

हालांकि, याचिकाकर्ता ने बताया है कि सरकार द्वारा न्यायिक जांच की घोषणा तो कर दी गई है, लेकिन जांच से संबंधित औपचारिक अधिसूचना अभी तक जारी नहीं की गई है। प्रारंभिक प्रशासनिक कार्रवाई के तहत, इस मामले में चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है। खबरों के अनुसार, शाहपुर पुलिस स्टेशन के एसएचओ को भी निलंबित कर दिया गया है। जनहित याचिका में पीड़ित परिवार के लिए सुरक्षा की मांग की गई है और दोषी पाए जाने पर जवाबदेही तय करने की बात कही गई है।

कई जिलों में विरोध प्रदर्शन

इस घटना के बाद बिहार के कई जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। गोपालगंज में सैकड़ों नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के सदस्यों ने पोस्ट ऑफिस चौक से थाना चौक तक कैंडल मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि भरत तिवारी एनकाउंटर केस में कानूनी प्रक्रियाओं और मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है। कई प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि भरत तिवारी ने गोलीबारी से पहले आत्मसमर्पण कर दिया था और इस घटना को सुनियोजित हत्या बताया। कैमूर जिले में भी विरोध प्रदर्शन हुए, जहां राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने भभुआ नगर पालिका मैदान से एकता चौक तक आक्रोश मार्च निकाला। प्रदर्शन के दौरान, नेताओं ने दोषियों के लिए कड़ी सजा की मांग की।

क्या पुलिसवालों पर हत्या की FIR होगी, सुप्रीम कोर्ट क्या आदेश दे सकता है,

सवाल-1ः इस मामले में सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?

जवाबः सुप्रीम कोर्ट के पास असाधारण संवैधानिक शक्तियां हैं। वह चाहे तो इस केस की खुद मॉनिटरिंग करने से लेकर जांच के आदेश तक दे सकता है। जानिए क्या-क्या हो सकता है…

  • CBI या SIT जांच का आदेश: चूंकि एनकाउंटर स्थानीय पुलिस (भोजपुर पुलिस और एसटीएफ) ने किया है, इसलिए स्थानीय पुलिस की जांच पर सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट इसकी जांच CBI या किसी अन्य राज्य की निष्पक्ष SIT को सौंप सकता है। हालांकि, सम्राट सरकार ने मीडिया और सोशल मीडिया पर आलोचना के बाद न्यायिक जांच का आदेश पहले ही दे दिया है। सरकार ने पटना हाईकोर्ट के रिटायर जस्टिस की निगरानी में जांच करने का आदेश दे दिया है।
  • पुलिसकर्मियों पर FIR का आदेश: कोर्ट सीधे तौर पर एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों, कमांडिंग ऑफिसर और डीएसपी के खिलाफ FIR करने का निर्देश दे सकता है। सरकार ने अब तक जांच कमेटी जरूर बनाई है, लेकिन उसने पुलिसवालों पर नामजद FIR नहीं की है। भरत की मां के आवेदन पर पुलिस ने पुलिसकर्मियों पर हत्या की FIR नहीं की है।
  • हथियारों की फॉरेंसिक जांच: कोर्ट मुठभेड़ में इस्तेमाल हुए पुलिसकर्मियों के हथियारों को तुरंत जब्त कर उनकी बैलिस्टिक और फॉरेंसिक जांच का आदेश दे सकता है, ताकि पता चल सके कि गोली कितनी दूरी से और किस परिस्थिति में चली।
  • पीड़ित परिवार को मुआवजा और सुरक्षा: भरत तिवारी के परिवार को अंतरिम वित्तीय मुआवजा देने और पुलिसिया उत्पीड़न से सुरक्षा देने का आदेश जारी कर सकता है।

सवाल-2ः क्या पुलिस वालों पर हत्या की FIR होगी?

जवाबः हां, बिल्कुल हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ऐसा कर सकता है। हैदराबाद का दिशा रेप केस एनकाउंटर उदाहरण…

  • 2019 में हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर के साथ वीभत्स गैंगरेप और हत्या हुई थी। पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया।
  • बाद में ‘सीन रिक्रिएशन’ के दौरान दावा किया कि आरोपियों ने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की, इसलिए पुलिस ने एनकाउंटर में चारों को मार गिराया। जनता ने शुरू में तालियां बजाईं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए जस्टिस वी.एस. सिरपुरकर कमीशन (रिटायर्ड एससी जज) का गठन किया।
  • कमीशन ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ कहा कि पुलिस का दावा पूरी तरह झूठा था। चारों आरोपियों को जानबूझकर गोली मारी गई थी।
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस एनकाउंटर में शामिल 10 पुलिसकर्मियों पर हत्या (IPC 302) और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया।

बिहार पुलिस को पहले भी लग चुकी है फटकार

2023 में बिहार पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर टिप्पणी की थी। सविता अली बनाम बिहार के मामले में पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पुलिस मुठभेड़ों या पुलिस कस्टडी में होने वाली मौतों को केवल ‘अस्वाभाविक मौत’ के रूप में दर्ज करके ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता।

अगर पीड़ित पक्ष या जांच टीम को प्रथम दृष्टया गड़बड़ी लगती है, तो नियमों के तहत सीधे दोषी पुलिसकर्मियों पर नियमित आपराधिक FIR (हत्या के तहत) दर्ज होनी चाहिए।

सवाल-3ः क्या बिहार में पहले पुलिस वालों पर हत्या की FIR हुई है?

जवाबः हां, बिहार पुलिस के एनकाउंटर पर पहले भी सवाल उठे हैं। पुलिसवालों पर हत्या की FIR हुई है। 2 उदाहरण…

1. बेगूसराय दयानंद एनकाउंटरः सदन में उठा मामला

  • 31 दिसंबर 2025 को नोनपुर गांव में वांछित माओवादी दयानंद मलाकार का एनकाउंटर किया गया। इसमें उसकी मौत हो गई। पुलिस ने दावा किया कि STF और जिला पुलिस पर फायरिंग के बाद मुठभेड़ में मारा गया।
  • परिवार और विपक्ष ने पुलिस पर हत्या का आरोप लगाया। विधान परिषद में विपक्ष ने इसे सुनियोजित ‘फर्जी मुठभेड़’ बताया। कहा-घर में घुस हत्या की। लेकिन मामले की जांच नहीं हुई।

2. पटना छात्र एनकाउंटरः पदक के लिए 3 स्टूडेंट्स की हत्या

  • 28 दिसंबर 2002 को 3 निर्दोष कॉलेज छात्रों विकास, प्रशांत, हिमांशु का एनकाउंटर किया गया। पुलिस ने दावा किया कि तीनों कुख्यात ‘अशोक नटवा’ डकैत गिरोह के सदस्य थे।
  • बवाल बढ़ा तो सरकार ने पहले CID जांच बैठाई और फिर CBI ने जांच की। जांच में सच्चाई सामने आई कि एसएचओ शमशेर ने पदक के लिए गोली मारी थी। 2014 में विशेष अदालत ने एसएचओ को फांसी दी। 2015 में हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

3. गया बाराचट्टी हत्याकांडः जबरन वसूली के लिए मार दी गोली

  • 5 दिसंबर 1993 को व्यवसायी राजेश धवन और उनके 2 कर्मचारियों की मौत एनकाउंटर में हुई। पुलिस ने दावा किया कि अपराधियों के गोली चलाने पर आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग हुई, जिसमें उनकी मौत हुई। मामले पर बवाल बढ़ा।
  • जांच हुई तो पता चला कि पुलिस ने जबरन वसूली के लिए गोली मारी थी। निचली कोर्ट ने 1996 में 6 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई। 1998 में सुप्रीम कोर्ट दो की सजा उम्रकैद में बदल दी।

सवाल-4ः बिहार पुलिस क्या एनकाउंटर के नियमों का पालन करती है?

जवाबः नहीं। बीते 7 महीने (20 नवंबर 2025) के एनकाउंटर के आंकड़े को देखें तो पता चलता चलता है कि बिहार पुलिस सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह ही नहीं करती है।

बीते 7 महीने में 29 एनकाउंटर हुए, जिसमें 8 लोगों की मौत हुई है। लेकिन किसी भी एनकाउंटर में पुलिस ने कोर्ट की गाइडलाइन का पालन नहीं किया। ना FIR हुई है और ना ही जांच हुई है।

2014 के पुचेल बनाम महाराष्ट्र राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट ने देश में एनकाउंटर से जुड़ा सबसे बड़ा ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने 16 सूत्रीय गाइडलाइंस तय की थीं…

  1. एनकाउंटर में मौत होने पर तुरंत FIR दर्ज होगी।
  2. जांच उसी पुलिस स्टेशन की पुलिस नहीं करेगी, बल्कि CID या किसी दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम करेगी, जिसका नेतृत्व एक सीनियर अफसर करेगा।
  3. घटना की मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य है।
  4. एनकाउंटर के तुरंत बाद पुलिसकर्मियों को कोई आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जा सकता।
  5. शामिल पुलिस अधिकारियों को अपने हथियार फॉरेंसिक जांच के लिए सौंपने होंगे।
  6. जब भी पुलिस को कोई गुप्त सूचना मिले, तो उसे तुरंत लिखित रूप में (केस डायरी में) या इलेक्ट्रॉनिक रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
  7. एनकाउंटर में हुई मौत की जानकारी तुरंत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) या राज्य मानवाधिकार आयोग को भेजी जानी चाहिए ताकि घटना की पारदर्शी समीक्षा हो सके।
  8. यदि मुठभेड़ के दौरान कोई अपराधी या संदिग्ध घायल हो जाता है, तो पुलिस उसे तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराएगी। एक मजिस्ट्रेट या डॉक्टर के सामने उसका बयान दर्ज किया जाना चाहिए।
  9. घटनास्थल से जुड़े सभी भौतिक साक्ष्यों (जैसे- फिंगरप्रिंट, गोलियों के खोखे, वाहन, खून के नमूने आदि) को तुरंत सुरक्षित किया जाएगा ताकि सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके।
  10. मृतक का पोस्टमार्टम दो डॉक्टरों की टीम करेगी, जिसमें से एक जिला अस्पताल का कानून-विशेषज्ञ होना चाहिए। पूरी पोस्टमार्टम प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य है।
  11. एनकाउंटर में मारे गए या घायल हुए व्यक्ति के परिजनों को घटना की सूचना बिना किसी देरी के तुरंत दी जाएगी।
  12. DGP को हर छह महीने में (1 जनवरी और 1 जुलाई को) NHRC को अपने राज्य में हुए सभी पुलिस एनकाउंटरों की विस्तृत रिपोर्ट भेजनी होगी।
  13. यदि जांच में पाया जाता है कि एनकाउंटर फर्जी था या उसने कानून का उल्लंघन किया था, तो उसके खिलाफ तुरंत FIR (हत्या की धारा के तहत) दर्ज कर उसे सस्पेंड किया जाएगा और विभागीय कार्रवाई शुरू की जाएगी।
  14. यदि पीड़ित परिवार पुलिसकर्मियों के खिलाफ अदालत जाता है, तो आरोपी पुलिसकर्मियों को कानूनी सहायता का अधिकार होगा, लेकिन वे जांच को प्रभावित नहीं कर सकते।
  15. जांच एजेंसी की मांग पर, एनकाउंटर में शामिल पुलिस अधिकारियों को जांच के उद्देश्य से अपने व्यक्तिगत या आधिकारिक हथियार तुरंत सरेंडर करने होंगे।
  16. मारे गए व्यक्ति के आश्रितों को कानूनी प्रावधानों के तहत उचित अंतरिम मुआवजा दिया जाएगा।
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