सिंधु जल संधि विवाद दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दों में बदलता दिखाई दे रहा है !………………

दशकों पुरानी सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अब ज्यादा खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। इसके बाद शुरू हुआ विवाद अब खुली जुबानी जंग में बदल गया है। हाल ही में, पाकिस्तान […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 2 जुलाई 2026, 08:19 AM 4 मिनट read
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सिंधु जल संधि विवाद दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दों में बदलता दिखाई दे रहा है !………………
Photo: UB India News Archive

दशकों पुरानी सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अब ज्यादा खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। इसके बाद शुरू हुआ विवाद अब खुली जुबानी जंग में बदल गया है। हाल ही में, पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री, मुसादिक मलिक ने यह चेतावनी देकर तनाव और बढ़ा दिया कि इस्लामाबाद उन हाथों को ‘काट देगा’, जो सिंधु जल में पाकिस्तान के हिस्से पर दावा करने की कोशिश करेंगे। ऐसी भड़काऊ बयानबाजी बताती है कि कई युद्धों के बावजूद कायम रहा जल बंटवारा समझौता अब परमाणु हथियार संपन्न दोनों पड़ोसी देशों के तनावपूर्ण रिश्तों में नए टकराव का कारण बनता जा रहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने भी चेतावनी दी थी कि यदि भारत के कदमों से पाकिस्तान की जल सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, तो इस्लामाबाद युद्ध जैसे विकल्प पर भी विचार कर सकता है। यह चेतावनी तब आई, जब भारत ने कूटनीतिक संकेतों से आगे बढ़कर अपने राजनीतिक इरादों को बुनियादी ढांचे से जुड़े कामों में बदलना शुरू कर दिया।

इसी दिशा में चिनाब नदी से जुड़ी दो बड़ी परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश में चिनाब-ब्यास लिंक सुरंग और जम्मू-कश्मीर के सलाल बांध पर सेडिमेंट बाईपास सुरंग शामिल हैं। पाकिस्तान की धमकियां और पश्चिमी नदियों के पानी का अधिकतम इस्तेमाल करने का भारत का पक्का इरादा, दोनों संकेत देते हैं कि सिंधु बेसिन भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया अखाड़ा बन रहा है। भारत जल ढांचे के विकास को तेजी से बढ़ा रहा है। जो कदम शुरुआत में सीमित दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा था, वह अब हाइड्रो-स्ट्रैटेजिक (जल-रणनीति) बढ़त हासिल करने की एक बड़ी नीति बन गया है। संदेश स्पष्ट है कि नई दिल्ली उन जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना चाहती है, जो अब तक सीमित इस्तेमाल के बाद पाकिस्तान की ओर बह जाते थे। भारत के भीतर, चिनाब-ब्यास लिंक सुरंग को ऐसी विकास परियोजना के रूप में देखा जा रहा है, जिससे हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान को लाभ मिलेगा। इससे पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है और करीब 4,000 मेगावाट की अतिरिक्त पनबिजली क्षमता पैदा हो सकती है।

पाकिस्तान समझता है कि भारत के पास अभी सिंधु नदी प्रणाली के पानी को पूरी तरह रोकने की क्षमता नहीं है। हालांकि, वह यह भी मानता है कि भारत लगातार ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है, जिससे पानी के भंडारण, बहाव के समय और दिशा बदलने पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि उस पर उसकी गहरी निर्भरता है। उसकी लगभग 80 से 90 प्रतिशत खेती सीधे या परोक्ष रूप से सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। पंजाब और सिंध सिंचाई की योजना बनाने, बुआई चक्र और बाढ़ प्रबंधन के लिए इन नदियों पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। जल संबंधी आंकड़ों के आदान-प्रदान में रुकावट आने से पाकिस्तान के पानी के हिसाब-किताब में पहले ही अनिश्चितता आ गई है। यह अनिश्चितता लोगों और व्यवस्था पर मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करती है।

हालांकि, भारत की नई जल रणनीति के सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं। बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए हिमालय का इलाका दुनिया की सबसे मुश्किल जगहों में से एक है। पर्यावरणीय मंजूरियां, पारिस्थितिकी से जुड़े मुद्दे और स्थानीय स्तर पर होने वाला विरोध इन परियोजनाओं की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। वहीं, सलाल बांध से जुड़ी नई परियोजना का उद्देश्य वर्षों से खो चुकी संचालन क्षमता को फिर से हासिल करना है। नदियों को आसानी से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह तैयार होने में वर्षों लग जाते हैं। पानी का अत्यधिक हथियारीकरण मानवीय संकट, अंतरराष्ट्रीय आलोचना और भू-राजनीतिक प्रतिक्रिया का जोखिम पैदा करता है। इसके बावजूद, पाकिस्तान की चेतावनी संकेत है कि सिंधु बेसिन अब ऐसा रणनीतिक क्षेत्र बन चुका है, जहां इंजीनियरिंग, कूटनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और शक्ति संतुलन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

कभी सिंधु जल संधि को निलंबित करने की बात को एक कूटनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाता था। आज, जब भारत नया इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है और पाकिस्तान युद्ध की भाषा बोल रहा है, तब यह विवाद दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दों में बदलता दिखाई दे रहा है।

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