किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO का शिखर सम्मेलन इस बार सिर्फ एक डिप्लोमैटिक फोटो-ऑप नहीं है. इस बार ये बैठक दुनिया की बदलती सियासी बिसात का आईना है. दरअसल, एक तरफ अमेरिका के भारी-भरकम टैरिफ का दबाव है तो दूसरी तरफ रूस और चीन से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश. ऐसे में विदेश नीतियों के जानकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा को कई मायनों में एक साथ कई मोर्चों को साधने की कवायद मान रहे हैं.
इस बार का SCO समिट खास क्यों है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल संगठन अपनी स्थापना के 25 साल पूरे कर रहा है. यही वजह है कि समिट की थीम 25 साल का SCO: 'साझा तौर पर स्थायी शांति, विकास और समृद्धि की ओर' रखी गई है'. बता दें भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और मध्य एशिया के कई देशों समेत यह संगठन अब दुनिया की करीब 40 फीसदी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे इस इस तरह के मंच पर भारत की मौजूदगी और सक्रियता का असर क्षेत्रीय राजनीति के साथ विश्व पटल पर भी गूंज रहा है.
मोदी-पुतिन की मुलाकात में क्या तय हुआ?
एक रिपोर्ट के मुताबिक समिट के बीच प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच द्विपक्षीय बातचीत हुई. विदेशी अखबारों के मुताबिक दोनों नेताओं की बातचीत में व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति, रक्षा सहयोग और आपसी भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल रहे. बताया जा रहा है कि पुतिन ने बैठक में भारत-रूस व्यापार में हुई बढ़ोतरी का जिक्र किया और दोनों देशों के बीच बढ़ते पर्यटन को भी सकारात्मक संकेत बताया. दूसरी ओर मोदी ने यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख फिर दोहराया और जंग का बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात कही है.
चीन के साथ रिश्तों में यह गर्माहट अचानक कहां से आई?
जानकारी के मुताबिक पिछले कुछ हफ्तों में भारत-चीन संबंधों में उल्लेखनीय नरमी देखी गई है. बता दें देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि स्तर की 25वें दौर की बातचीत हुई जिसमें दोनों पक्षों ने आठ सूत्रीय सहमति बनाई. इसे पूर्वी लद्दाख सीमा पर तनाव घटाने और रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. वहीं, चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग ने भी भी हाल ही में कहा था कि कजान और तियानजिन में हुई मोदी-शी की पिछली दो मुलाकातों ने दोनों देशों के रिश्तों को स्थिरता की राह पर लौटाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
अमेरिका के टैरिफ का इस पूरी तस्वीर से क्या कनेक्शन है?
इस समिट की टाइमिंग को समझने के लिए अमेरिका के साथ चल रहे व्यापारिक तनाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अमेरिका ने भारत पर भारी टैरिफ लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की है और ऐसे माहौल में भारत का रूस-चीन के साथ मंच साझा करना अमेरिका के लिए असहज करने वाला संकेत माना जा रहा है. पिछले साल तियानजिन में हुए ऐसे ही एक समिट के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर मोदी-पुतिन-शी की तस्वीर साझा करते हुए टिप्पणी की थी कि अमेरिका ने भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया है.
भारत को आखिर व्यावहारिक तौर पर क्या मिल सकता है?
रूस के साथ बातचीत का सीधा फायदा ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति में स्थिरता के रूप में दिख सकता है जो भारत की महंगाई और किसानों दोनों के लिए अहम है. चीन के मोर्चे पर सीमा पर बनी सहमति अगर आगे बढ़ती है तो इससे सैन्य तनाव घटाने के साथ-साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के रास्ते फिर खुलने की उम्मीद बनती है जो कोविड और गलवान झड़प के बाद से लगभग ठप जैसे पड़े थे.
क्या इससे भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ेगा?
अमेरिका की तरफ से भी इस पर नजर बनी हुई है. पिछले साल जब ऐसी ही तस्वीरें सामने आई थीं तो अमेरिकी दूतावास ने तुरंत बयान देकर भारत-अमेरिका संबंधों को 21वीं सदी के लिए निर्णायक बताया था. जानकारों की राय है कि भारत की कोशिश अमेरिका को नाराज करने की नहीं, बल्कि यह दिखाने की है कि टैरिफ जैसे दबाव की सूरत में भारत के पास और भी विकल्प मौजूद हैं.








