नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत के राजनीति में आने की संभावना को लेकर बिहार के सियासी गलियारे में आकलन होने लगे हैं. इसके नफा-नुकसान के मायने तलाशे जा रहे हैं. इस संभावना पर सत्ताधारी एनडीए के घटक दलों का स्वर भी सकारात्मक है. विपक्ष की ओर से भी इस पर प्रतिक्रिया आने लगी है. हालांकि इस खबर का कोई आधिकारिक ऐलान अभी तक नहीं हुआ है. यह मीडिया द्वारा कड़ी से कड़ी जोड़ने से तैयार हुआ अनुमान मात्र है. भोजपुरी के इस कहावत से यह पूरा प्रकरण मेल खाता है- गाछे कटहल, ओठे तेल.
नीतीश व निशांत ने कुछ नहीं कहा
निशांत के राजनीति में आने की चर्चा पहले भी कभी कभार होती रही है. पर, उनकी ओर से या उनके पिता नीतीश कुमार की ओर से अभी तक कोई संकेत नहीं दिखा है. इसी महीने 17 तारीख को नीतीश ने अपने पिता की जयंती मनाई तो कार्यक्रम में निशांत भी शामिल हुए. उसी समय उन्होंने मीडिया के माध्यम से अपने पिता के लिए विधानसभा चुनाव में लोगों से वोट करने की अपील की. उसके बाद से ही कयास लगने लगे कि निशांत की राजनीति में एंट्री होने वाली है. वे नीतीश कुमार के सियासी उत्तराधिकारी बनेंगे. हालांकि, उनकी कोई प्रतिक्रिया इस पर अभी तक सामने नहीं आई है. अभी तक न निशांत ने इस बाबत कोई संकेत दिया है और न नीतीश कुमार ने ही कुछ कहा है.
निशांत को लेकर संशय की वजहें हैं
निशांत की राजनीति में एंट्री को लेकर संशय इसलिए पैदा होता है कि नीतीश कुमार राजनीति में वंशवाद के कट्टर विरोधी रहे हैं. राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने के लिए नीतीश कुमार आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव का विरोध भी करते रहे हैं. नीतीश समाजवादियों की उस विचारधारा के लोगों में शुमार किए जाते हैं, जो यह मानते रहे हैं कि रानी के पेट से अब राजा पैदा नहीं होगा. जिस कर्पूरी ठाकुर को नीतीश कुमार अपना आदर्श मानते रहे हैं, वे अक्सर अपने संबोधनों में यह वाक्य दोहराते थे. खैर, चर्चाओं के बारे में एक बड़ी तर्कसंगत उक्ति है- धुआं उठा है तो आग भी कहीं न कहीं जरूर होगी.
नीतीश ने खेली है लंबी सियासी पारी
वर्ष 1975 की इमरजेंसी के पहले 1974 में हुए राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन से बिहार के जो कुछ नामचीन राजनीतिज्ञ निकले, उनमें नीतीश कुमार भी हैं. 1977 से उन्होंने संसदीय राजनीति में एंट्री की कोशिशें शुरू कीं. शुरुआती असफलता के बाद वे विधानसभा के सदस्य चुने गए. फिर लोकसभा पहुंचे. केंद्र में मंत्री रहे और 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के शासन की विफलताएं बता कर नीतीश ने राजनीति में अपनी मुकम्मल जगह बना ली. आश्चर्य यह कि भाजपा के साथ रह कर भी उन्होंने उसकी नीतियों के बजाय अपनी विचारधारा को तवज्जो दी. नीतीश ने केंद्र के बजाय बिहार की राजनीति की राह 2005 में चुनी और अब तक उनका सारा ध्यान बिहार पर ही रहा है. लालू-राबड़ी राज में खस्ताहाल हो चुकी सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के मामले में नीतीश ने उल्लेखनीय काम किए हैं. लंबे समय तक सीएम रहने वाले ज्योति बसु, नवीन पटनायक जैसी सख्शियतों में नीतीश कुमार की गिनती होने लगी है. लगातार 19 साल से वे बिहार के सीएम हैं.
निशांत आएं तो आगाज अच्छा होगा
बहरहाल, मान लीजिए कि तमाम किंतु-परंतु के बावजूद निशांत अगर राजनीति में आते हैं तो यह उनके लिए कैसा रहेगा. यह उनके आरंभ का अच्छा अवसर हो सकता है. इसके लिए नीतीश कुमार को कुछ सतर्कतामूलक कदम उठाने होंगे. नीतीश अगर जेडीयू को निशांत के मुद्दे पर अपने साथ इंटैक्ट रख पाए तो यह उनके बेटे के लिए अच्छा आगाज होगा. इसके लिए नीतीश कुमार को मौजूदा कार्यकाल में ही चुनाव घोषणा से छह महीने पहले निशांत को गद्दी सौंपनी होगी. जाहिर है कि तब निशांत और नीतीश ही चुनाव का नेतृत्व करेंगे. कामयाबी मिल गई तो निशांत की वास्तविक ओपनिंग दमदार हो सकती है. इसलिए कि उन्हें नीतीश कुमार के किए कामों से तैयार हुए वोट बैंक का लाभ तो मिलेगा ही, सहानुभूति का लाभ भी मिल जाएगा.
निशांत वोट बटोरने वाले साबित होंगे
भारत में भावनाओं को भुना कर भी चुनाव लड़े जाते रहे हैं. इंदिरा गांधी की हत्या का भावनात्मक लाभ राजीव गांधी को चुनाव में मिला था. उन्होंने लोकसभा में 400 से अधिक सीटें बटोरने का जो रिकार्ड बनाया, वह अभी तक नहीं टूटा है. भाजपा भी लाख कोशिशों और नरेंद्र मोदी जैसे चेहरे के बावजूद अधिकतम 303 तक ही पहुंच पाई. सहानुभूति रखने वाले भारतीय वोटर भावनाओं में बह कर अतीत को भूलने में माहिर हैं. यह बात नीतीश कुमार भी कहते रहे हैं कि वोटर किसी बात को अधिक दिनों तक याद नहीं रख पाता. शायद यही वजह है कि उन्होंने एनडीए नेताओं से कहा था कि लालू-राबड़ी के जंगल राज के बारे में नई पीढ़ी को बताने की जरूरत है. 25 साल तक के वोटर को तो लालू-राबड़ी शासन की गड़बड़ियां पता ही नहीं होंगी. नीतीश के राजनीति से संन्यास लेने और निशांत के राजनीति में आने पर सहानुभूति का लाभ उन्हें मिल सकता है. इसलिए निशांत पर दांव लगाने का मौका शायद ही कोई पार्टी छोड़ना चाहे.
निशांत क्या जेडीयू को संभाल पाएंगे!
निशांत को अगर नीतीश कुमार विरासत सौंपते हैं तो यकीनन भाजपा को यह अच्छा नहीं लगेगा. इसलिए कि भाजपा इसी मौके का अभी तक इंतजार करती रही है. अगर अमित शाह या दिलीप तावड़े यह कहते हैं कि अगली बार सीएम कौन बनेगा, इस बारे में अभी तक कोई फैसला नगीं हुआ है तो इसकी यही वजह है. अभी तक भाजपा ने सहयोग देकर नीतीश को सीएम बनाए रखा तो उनकी गैरहाजिरी में भाजपा का अपनी बारी का दावा तो बनता ही है. पर, भाजपा से अधिक संकट जेडीयू के भीतर है, जहां नीतीश कुमार के कमजोर पड़ते ही कई खेमे बन गए हैं. संजय झा, ललन सिंह, विजय चौधरी और अशोक चौधरी जैसे जेडीयू में कई नेता हैं, जिन्हें नीतीश कुमार के बाद अपनी पारी का इंतजार है. समय-समय पर इसकी झलक भी मिलती रही है. ऐसे लोगों की सहमति और सहयोग निशांत के लिए आसान नहीं लगते. भाजपा ने कोई दांव खेल दिया तो स्थिति बनते-बनते बिगड़ सकती है. यानी जेडीयू में ही टूट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
BJP निशांत पर भी हो जाएगी राजी
भाजपा को विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल में नीतीश कुमार के किसी प्रयोग से आपत्ति नहीं हो सकती है. इसलिए कि उसे बिहार में जेडीयू जैसे एक सहयोगी की सख्त जरूरत है. जेडीयू में भी नीतीश कुमार जैसे व्यक्ति की. नीतीश की गैरमौजूदगी में निशांत इसकी भरपाई कर सकते हैं. भाजपा कोई कारनामा करना भी चाहे तो इसके लिए वह विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार करेगी. हां, यह जरूर है कि पिछली बार जैसे नतीजे इस बार भी आएं तो भाजपा सीएम पद पर दावेदारी से पीछे नहीं हटेगी. पर, यह सब तब होगा, जब नीतीश अपने बेटे निशांत की एंट्री राजनीति में कराएं और निशांत इसके लिए राजी हों.








