महागठबंधन ने 2025 चुनाव को ‘करो या मरो’ के तर्ज पर लड़ने का किया फैसला.

नीतीश कुमार नीत सरकार को अपदस्थ करने को महागठबंधन के रणनीतिकार अब एनडीए की हर चाल का जवाब उसी सुर में दे रहे हैं। एनडीए के रणनीतिकार महागठबंधन के जिन कमजोरियों का फायदा उठाते हैं, महागठबंधन ने उन कमजोरियों पर स्वयं नकेल कसने की तैयारी करने में जुट गए हैं। महागठबंधन ने आगामी बिहार विधानसभा […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
सोमवार, 21 अप्रैल 2025, 08:46 AM 4 मिनट read
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महागठबंधन ने 2025 चुनाव को ‘करो या मरो’ के तर्ज पर लड़ने का किया फैसला.
Photo: UB India News Archive

नीतीश कुमार नीत सरकार को अपदस्थ करने को महागठबंधन के रणनीतिकार अब एनडीए की हर चाल का जवाब उसी सुर में दे रहे हैं। एनडीए के रणनीतिकार महागठबंधन के जिन कमजोरियों  का फायदा उठाते हैं, महागठबंधन ने उन कमजोरियों पर स्वयं नकेल कसने की तैयारी करने में जुट गए हैं। महागठबंधन ने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को करो या मरो के तर्ज पर लड़ने का फैसला ले लिया है। आइये जानते हैं कि किन कमजोरियों पर महागठबंधन ने लगाम लगाने की सोची है।

जंगलराज के चेहरे से मुक्ति का अभियान

हालांकि यह राजद के रणनीतिकारों को पता भी था कि एनडीए विकास की चाहे जितनी पैरोकार रहे, पर चुनावी मुद्दा में जंगल राज प्राथमिकता के साथ रहा है। ऐसा कर नीतीश नीत सरकार के रणनीतिकार लगभग 34 प्रतिशत की गोलबंदी कर लेते हैं। ये वैसे लोग है जो राजद के कुशासन से कहीं न कहीं प्रताड़ित मानते हैं। कांग्रेस भी तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनाना चाहती है, पर चुनाव में तेजस्वी के उस आक्रामक तेवर के साथ नहीं है, जिसके कारण जगह-जगह तेजस्वी के समर्थक कानून अपने हाथ में ले लेते हैं। हर चुनाव के पहले राजद के उत्साही समर्थक से ऐसा कुछ हो जाता है जो जंगल राज की वापसी के संकेत दे जाती है। और यही से नीतीश नीत सरकार जीत की नींव रखनी शुरू कर देती है।

कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लाबरू बस राजद के कुशासन वाले चेहरे के साथ चुनाव में नहीं जाना चाहते। हाल ही में एक सर्वे में तेजस्वी को सीएम के रूप में पहली पसंद के आंकड़ों ने भी कांग्रेस के रणनीतिकारों की आंखे खोल दी। यही वजह है कि को-ऑर्डिनेशन कमेटी की अध्यक्ष की बात उठी तो कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लाबरू ने बगैर हिचक के तेजस्वी का नाम लिया। कांग्रेस सिर्फ राजद के लुंपेन संस्कृति से निजात दिला कर चुनावी जंग को जितना चाहती है। हालांकि राजद ने भी नीतीश नीत सरकार के हाल के वर्षों का नियमित रूप से क्राइम बुलेटिन जारी कर जंगलराज की छवि को राज्य की जनता के सामने रखने की कोशिश भी की।

एकता का प्रदर्शन

2020 के विधानसभा से सबक लेते एनडीए ने 2025 विधानसभा चुनाव के पहले अपने सभी घटक दलों के साथ प्रखंड से जिला स्तर तक बैठक कर एकता का प्रदर्शन किया। 2020 में जदयू और भाजपा के नेताओं ने भी आरोप लगाया कि साथी दल का पूरा सहयोग नहीं मिला। इस आरोप को दूर करने के लिए छोटी से छोटी सभा या फिर बड़ी से बड़ी सभा में तमाम घटक दलों के शीर्ष नेताओं के साथ एकजुटता का प्रदर्शन किया।

इधर एनडीए की इस कदम को साधते महागठबंधन ने भी साथी दलों के साथ बैठक या सभा करने पर सहमति दे दी है। एनडीए की इस चाल को साधते महागठबंधन ने भी एक सूत्र में दिखने हेतु कवायद शुरू कर दी है। गत चुनाव में महागठबंधन के साथी दल भी पंचायत और प्रखंड स्तर पर समन्वय नहीं दिखा पाने का दंश झेल चुकी थी। इस बार कांग्रेस ने यह प्रस्ताव रखा कि सभी छह दलों के जिला और प्रखंड के अध्यक्ष एक साथ बैठ कर चुनावी रणनीति बनाए। और इस पर महागठबंधन के सभी दल ने स्वीकृति भी दे दी है।

चाल बदली है चरित्र देखना है: अश्क

महागठबंधन की राजनीति में कांग्रेस की सक्रियता का एक फायदा हुआ है कि वे एनडीए के अनुकूल रणनीति बनाने में लगी है। यानी एनडीए की रणनीति का जवाब उसी तेवर में। महागठबंधन अब क्राइम पर बैकफुट पर नहीं है। क्राइम बुलेटिन लगातार जारी हो रहा है। नौकरी, रोजगार और पलायन के मुद्दे को साधते महागठबंधन के रणनीतिकार लगातार हमला कर रहे हैं। अब रही बात आपसी समन्वय का तो एनडीए को देखते महागठबंधन ने भी प्रखंड और जिला स्तर पर आयोजित बैठक में सभी दल के शीर्ष नेताओं के साथ बैठक करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। पर सवाल यह है कि महागठबंधन चाल तो बदल रही है। क्या चरित्र भी बदलते दिखेगी? यह एक यक्ष प्रश्न है। ऐसा इसलिए कि अतिउत्साहित राजद के सक्रिय नेता ऐसा कुछ कर जाते हैं या बोल जाते हैं कि सब गुड़ गोबर हो जाता है।

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