चुनाव हारे नीतीश तो नई सरकार के कंधे पर होगा कितने का कर्ज?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनावी साल में योजनाओं और नौकरियों का पिटारा खोल दिया है. इन योजनाओं को पूरा करने के लिए नीतीश RBI की शरण में पहुंचे हैं.सरकार ने रिजर्व बैंक से 16 हजार करोड़ के कर्ज की गुहार लगाई है. नीतीश सरकार ने जुलाई से सितंबर तक यानी ठीक चुनाव के पहले […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 17 जुलाई 2025, 07:58 AM 4 मिनट read
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चुनाव हारे नीतीश तो नई सरकार के कंधे पर होगा कितने का कर्ज?
Photo: UB India News Archive

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनावी साल में योजनाओं और नौकरियों का पिटारा खोल दिया है. इन योजनाओं को पूरा करने के लिए नीतीश RBI की शरण में पहुंचे हैं.सरकार ने रिजर्व बैंक से 16 हजार करोड़ के कर्ज की गुहार लगाई है. नीतीश सरकार ने जुलाई से सितंबर तक यानी ठीक चुनाव के पहले तक कर्ज देने की अपील की है. सरकार के मंत्री कह रहे हैं यह कर्ज बिहार के हित में है तो विपक्ष कह रहा है कि सरकार कर्ज लेकर घी पी रही है और चुनाव बाद इनका हाजमा खराब हो जाएगा. सब योजनाएं बंद हो जाएंगी.

विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नीतीश सरकार ने जिस तरह से पिटारा खोला है उसके लिए सरकार के खजाने में राशि की भी जरूरत होगी. राज्य के सीमित राजस्व स्रोतों से इस अतिरिक्त राशि की व्यवस्था संभव नहीं है. लिहाजा सरकार ने रिजर्व बैंक का दरवाजा खटखटाया है. हालांकि सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि सरकार कानून की तय सीमा में ही कर्ज ले रही है.

नीतीश सरकार के कुछ हालिया फैसले जिनके लिए बड़ी राशि की आवश्यकता होगी…

  • सामाजिक सुरक्षा पेंशन 400 से बढ़ाकर 1100 रूपये किया गया जिसके लिए हर महीने 1200 करोड़ से ज्यादा चाहिए.
  • पंचायत प्रतिनिधियों का वेतन डेढ़ गुना किया गया है.
  • जीविका कर्मियों का वेतन दोगुना हुआ है.
  • 94 लाख गरीब परिवार को दो-दो लाख रुपया देना है.
  • इसके अलावा नौकरियों का भी पिटारा खोला गया है, जिसके लिए बड़ी राशि की आवश्यकता होगी.
  • 1 अगस्त 2025 से 125 यूनिट फ्री बिजली. सरकार पर बोझ बढ़ेगा. राजस्व में कमी आएगी.

‘धरी की धरी रह जाएंगी योजनाएं’

इधर विपक्ष का आरोप है कि सरकार चुनावी वर्ष में कर्ज लेकर वोट के लिए लोकलुभावन योजनाएं लागू कर रही है. जबकि चुनाव बाद राशि के अभाव में सभी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी. इस वित्तीय वर्ष के अंत तक बिहार पर कुल कर्ज 4 लाख 06 हजार 470 करोड़ का हो जाएगा. यानी सत्ता में जो भी पार्टी आती है उसके कंधे पर कुल 4 लाख 06 हजार 470 करोड़ रुपये का कर्ज होगा.

बिहार सरकार को हर दिन 63 करोड़ रुपये सूद के रूप में चुकाने पड़ेंगे. इसी तरह कर्ज के मूलधन का 22,820 करोड़ भी बिहार सरकार को इस वित्तीय वर्ष में चुकाना है. इसका मतलब 45,813 करोड़ रुपए है.

बकाए ऋण पर क्या अनुमान?

बिहार राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम, 2006 राज्य सरकार के बकाया ऋण, राजस्व घाटे और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए वार्षिक लक्ष्य प्रदान करता हैबजट 2025-26 में 8,831 करोड़ रुपये का रेवेन्यू सरप्लस अनुमानित हैसंशोधित अनुमानों के अनुसार, 2024-25 में राज्य का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 9.2% रहने का अनुमान है. यह जीएसडीपी के 3% के बजट अनुमान से अधिक है. वहीं, 2025-26 के अंत में बकाया ऋण GSDP का 37% होने का अनुमान है, जो 2024-25 के संशोधित अनुमान (GSDP का 37.1%) के समान है.

2024 में 48 हजार करोड़ रुपये का कर्ज

पिछले साल नीतीश सरकार ने आधारभूत संरचना का विकास करने के लिए 48 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई थी. इसके लिए पैसा कर्ज के जरिए अलग-अलग वित्तीय संस्थाओं से जुटाने का प्लान था. सरकार का कहना था कि इससे राज्य के आर्थिक विकास को गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.

कर्ज बन जाता है बोझ

जानकारों के अनुसार, अगर कर्ज उन योजनाओं में लगाए जा रहा है, जिससे लाभ मिलेगा तो सही है. लेकिन एक अनुपात के बाद अगर कर्ज बढ़ता है तो बजट पर बोझ पर बन जाता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि बिहार पर कर्ज को लेकर स्ट्रेस है. बिहार सरकार का राजस्व उगाही पर ध्यान देना चाहिए और इसके लिए उन क्षेत्राों का चयन करना चाहिए जहां टैक्स अभी नहीं लिया जा रहा है. स्माल इंडस्ट्रीज क्लस्टर बनाने पर जोर देना चाहिए, जिससे निवेशक आकर्षित हो सके.

नीतीश कुमार ने सत्ता में आने के लिए बड़े-बड़े वादों का ऐलान तो कर दिया और उन वादों को पूरा करने के लिए कर्ज की गुहार भी लगा दी. मान लीजिए कि यही नीतीश सरकार विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में नहीं आती है तो नई सरकार को विरासत के तौर पर 16 हजार करोड़ रुपये मिलेगा.

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