बिहार को हैदराबाद से नेताओं की जरूरत नहीं………

बिहार की राजनीति में एक एकाएक ट्विस्ट तब आ गया जब जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद में राजनीति करने की सलाह दी. प्रशांत किशोर ने कहा, ओवैसी की राजनीति का ढर्रा वही है. बिहार को हैदराबाद से नेताओं की जरूरत नहीं. अगर वे इंडिया गठबंधन में शामिल होना चाहते […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 17 जुलाई 2025, 08:27 AM 5 मिनट read
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बिहार को हैदराबाद से नेताओं की जरूरत नहीं………
Photo: UB India News Archive

बिहार की राजनीति में एक एकाएक ट्विस्ट तब आ गया जब जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद में राजनीति करने की सलाह दी. प्रशांत किशोर ने कहा, ओवैसी की राजनीति का ढर्रा वही है. बिहार को हैदराबाद से नेताओं की जरूरत नहीं. अगर वे इंडिया गठबंधन में शामिल होना चाहते हैं तो यह उनकी और गठबंधन की मर्जी पर है, लेकिन हमारे लिए ओवैसी बिहार में कोई फैक्टर नहीं हैं. यह बयान तब आया जब ओवैसी की एआईएमआईएम महागठबंधन में शामिल होने की कोशिश नाकाम रही. राजद ने उनकी पेशकश ठुकराई जिसके बाद ओवैसी 45 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. क्या किशोर का यह बयान ओवैसी को झटका है? क्या यह तीसरे मोर्चे की उम्मीदों पर भी ब्रेक लगाएगा? बिहार के मुस्लिम वोट बैंक और सियासी समीकरणों के बीच ओवैसी का भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है.

जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने असदुद्दीन ओवैसी को हैदराबाद में राजनीति करने की सलाह दी. प्रशांत किशोर ने स्पष्ट कहा, ओवैसी की राजनीति का ढर्रा कई सालों से वही है. वे जहां-जहां चुनाव लड़ते हैं, देश को पता है कि वहां उनकी रणनीति क्या है. बिहार को हैदराबाद से नेताओं की जरूरत नहीं है. अगर वे इंडिया गठबंधन में शामिल होना चाहते हैं तो यह उनकी और गठबंधन की मर्जी पर है, लेकिन हमारे लिए ओवैसी बिहार में कोई फैक्टर नहीं हैं. प्रशांत किशोर का यह बयान तब आया जब ओवैसी की अगुवाई वाली एआईएमआईएम महागठबंधन में शामिल होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन राजद ने उनकी पेशकश को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

राजनीति के जानकारों का मानना है कि प्रशांत किशोर अपना रुख साफ कर न केवल असदुद्दीन ओवैसी की बिहार में बढ़ती महत्वाकांक्षा को ठेस पहुंचाया है, बल्कि तीसरे मोर्चे की उम्मीदों पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. बता दें कि ओवैसी ने हाल ही में लालू यादव को पत्र लिखकर महागठबंधन की पेशकश की थी, लेकिन जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने 45 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई और कहा कि वह बिहार में तीसरे मोर्चा बनाने के लिए प्रयास करेंगे. लेकिन, प्रशांत किशोर के इस बयान के बाद बिहार में थर्ड फ्रंट की संभावना को कमजोर हो गई है. साफ है कि यह असदुद्दीन ओवैसी की तीसरे मोर्चे के लीडर के रूप में उभरने की उम्मीदों को बड़ा झटका है. यह झटका तब और बड़ा हो जाता है जब उनकी पार्टी पर पहले से ही बीजेपी की बी-टीम होने के आरोपों से जूझ रही है.

पीके का झटका, राजनीतिक प्रतिफल क्या होंगे?

प्रशांत किशोर की टिप्पणी से मुस्लिम वोट बैंक में उलझन बढ़ सकती है जो पहले से ही तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार, प्रशांत किशोर और असदुद्दीन ओवैसी के बीच पहले से ही चार खेमों में बंटा हुआ है. यह असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के लिए बड़ा सेटबैक इसलिए भी है क्योंकि वर्ष 2020 में एआईएमआईएम ने सीमांचल में पांच सीटें जीती थीं, लेकिन चार विधायकों के राजद में जाने से उनकी साख कमजोर हुई. अब प्रशांत किशोर के रुख से असदुद्दीन ओवैसी को अलग-थलग कर सकता है जिससे उनकी वोट शेयरिंग रणनीति प्रभावित हो सकती है. अगर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम बिहार में अकेले लड़ती है तो महागठबंधन को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसके विपरीत उनकी सीटें बीजेपी को फायदा पहुंचा सकती हैं, जैसा कि 2020 में हो चुका है. ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी को लेकर मुस्लिम मतदाताओं के बीच दुविधा की स्थिति तो जरूर रहेगी.

क्या ओवैसी बिहार के चक्रव्यूह में फंस जाएंगे?

दरअसल, बिहार की राजनीति में जाति और क्षेत्रीय समीकरण हावी रहते हैं. इसमें कोई दोराय नहीं कि असदुद्दीन ओवैसी की सीमांचल में मजबूत पकड़ है, लेकिन बदली राजनीतिक परिस्थितियों में राज्यव्यापी स्वीकार्यता की कमी उन्हें सीमांचल में भी नुकसान पहुंचा सकती है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और अन्य छोटे दलों की मौजूदगी से वोट बिखराव बढ़ेगा जो ओवैसी की स्थिति को कमजोर कर सकता है. इसके अतिरिक्त, महागठबंधन और एनडीए दोनों असदुद्दीन ओवैसी को अपने खिलाफ एक संभावित खतरे के रूप में देखते हैं, जिससे वे उनकी हरकतों पर नजर रखेंगे.

विपक्ष के लिए दोधारी तलवार, ओवैसी की बाधा

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