बिहार विधानसभा चुनावों पर कितना असर डालेगा एसआईआर?

बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए चुनाव यूं तो अक्टूबर अथवा नवंबर में होने हैं, लेकिन इसके पहले राज्य में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जमकर सियासी घमासान मचा है। विपक्ष इसे चुनाव आयोग के माध्यम से सत्तारूढ़ भाजपा का ‘खेला’ मान रहा है, जो भाजपा और […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 23 जुलाई 2025, 11:39 AM 10 मिनट read
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बिहार विधानसभा चुनावों पर कितना असर डालेगा एसआईआर?
Photo: UB India News Archive

बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए चुनाव यूं तो अक्टूबर अथवा नवंबर में होने हैं, लेकिन इसके पहले राज्य में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जमकर सियासी घमासान मचा है। विपक्ष इसे चुनाव आयोग के माध्यम से सत्तारूढ़ भाजपा का ‘खेला’ मान रहा है, जो भाजपा और एनडीए का कहना है कि यह एक ‘सामान्य प्रक्रिया’ है।

जबकि, चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर ‘मतदाता सूची शुद्धिकरण प्रक्रिया’ है। क्योंकि राज्य में 2003 के बाद से मतदाता सूची का पुनरीक्षण नहीं हुआ है। लेकिन इस एसआईआर से शंकित राजद नेता और विधानसभा में नेता-प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इसे मोदी सरकार दवारा बिहार में ‘वोटबंदी’ की संज्ञा दी है तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी इसे महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी ‘वोटों की चोरी की साजिश करार दे रहे हैं। एआईएमआईम ने  तो एसआईआर को ‘बैक डोर से एनआरसी की वापसी’ बता दिया है। विपक्ष का सवाल है कि वोटर लिस्ट का ‘शुद्धिकरण’ अभी ही क्यों?

यह काम चुनाव बाद भी किया जा सकता है। विपक्ष को  आशंका है कि एसआईआर के बहाने उसके समर्थक वोटों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है, जिनमें बड़ी संख्या मुसलमानों और दलितों की हो सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि एसआईआर से राज्य में सभी की नागरिकता की  विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गई है।

इस बीच चुनाव आयोग अपना काम किए जा रहा है। उसका दावा है कि राज्य में एसआईआर के 95 फीसदी फार्म जमा हो चुके हैं। राज्य में 43.92 लाख मतदाता या उनके पतों पर नहीं मिले या फिर उनके दस्तावेज अधूरे थे। आयोग ने इन वोटरों को चार अलग-अलग श्रेणी में रखा है। इनकी सूची 12 राजनीतिक पार्टियों को दे दी गई है।

11 हजार 484 वोटर ऐसे भी हैं, जिनका कहीं कोई पता नहीं चला। जिन्हें आयोग संदिग्ध मान रहा है, उन वोटरों की संख्या राज्य के कुल वोटरों का लगभग 5 फीसदी है। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। हालांकि इनके नाम सूची से बीएलअो द्वारा फिर से जांच के बाद ही हटेंगे।

उधरएसआईआर से परेशान ने विपक्ष ने जहां इसके खिलाफ सड़कों पर लड़ाई शुरू कर दी है, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। हालांकि इस मुद्दे पर उसे खास राहत नहीं मिली। सर्वोच्च अदालत ने एसआईआर पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को उसका काम करने नहीं रोकेगा।

हालांकि, कोर्ट ने न्याय हित’में सुझाव दिया कि आयोग मतदाता की पुष्टि के लिए आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों को स्वीकार करने पर भी विचार करे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में कुल 11 याचिकाएं सुनवाई के लिए लगी थीं।

इनमें एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और पीपल्स यूनियन सिविल लिबर्टीज के अलावा आरजेडी, कांग्रेस, टीएमसी जैसी विपक्षी पार्टियों के नेताओं की भी याचिका थी। इसके पूर्व 11 विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से भी मिला था, लेकिन उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा। इस बीच मतदाताओं द्वारा एसआईआर फॉर्म जमा करने के मामले में धांधलियों की शिकायतें भी आईं। और ऐसा एक मामला उजागर करने पर एक पत्रकार के खिलाफ मामला भी कराया गया।

उधर राजनीतिक हंगामे के बाद भी चुनाव आयोग अपना काम किए जा रहा है। चुनाव आयोग का कहना है कि बिहार की मतदाता सूची में  नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिकों के नाम पाए गए, जिन्हें 1 अगस्त के बाद नागरिकता जांच के बाद हटाया जाएगा।

दूसरी तरफ विपक्ष की पुरजोर कोशिश है कि इस मुद्दे को किसी तरह विधानसभा चुनाव तक खींचा जाए। संभव है कि यदि एसआईआर में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम कटे तो यह जनाक्रोश का कारण बन सकता है, हालांकि कितना बनेगा, यह अभी कहना कठिन है।

मतदाता सूची अद्यतन हो, उसमे से अपात्रों के नाम हटें, इस पर किसी को शायद ही आपत्ति हो। लेकिन नाम जुड़वाने के लिए आयोग जो दस्तावेज मांग रहा है और इसके लिए जो प्रक्रिया निर्धारित की गई है, उस पर बहुतों को आपत्ति है। कहा जा रहा है कि जो डाक्यूमेंट मांगे जा रहे हैं, वो कई लोगों के पास नहीं है। हालांकि, चुनाव  आयोग ने ऐसे लोगों को अलग श्रेणी में रखकर उनका समाधान करने की बात कही है, लेकिन लोगों को उस पर भरोसा नहीं हो रहा है।

यही कारण  है कि विपक्षी इंडिया गठबंधन ने आरोप लगाया कि एसआईआर ’ के कड़े दस्तावेजीकरण नियम (जैसे 2003 की मतदाता सूची या माता-पिता के जन्म प्रमाण) के चलते गरीब, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और प्रवासी मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। इस अभियान के शुरू होते ही तेजस्वी यादव ने एक्स पर लिखा था, “लोकतंत्र की जननी बिहार में मतदाता अधिकारों का चीरहरण हो रहा है। फर्जी फॉर्म और असंवैधानिक कार्यप्रणाली लोकतंत्र के लिए घातक है।”

इस मुद्दे पर नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पटना रैली में सवाल किया कि क्या चुनाव आयोग अब बीजेपी का ‘चुनाव चोरी’ विंग बन गया है?” विपक्ष का दावा है कि बिहार के 4 करोड़ प्रवासी मजदूरों, ग्रामीण और गरीब आबादी के लिए आयोग द्वारा मांगे गए 11 दस्तावेजों को जुटाना मुश्किल है, जिससे उनका वोटिंग अधिकार छिन सकता है।

उधर टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एसआईआर  को “लोकतंत्र पर हमला” बताते हुए कहा था कि यह प्रक्रिया बीजेपी के इशारे पर शुरू की गई ताकि गरीब और प्रवासी मतदाताओं को वोट से वंचित किया जाए। इसका कारण यह भी है कि एसआईआर पश्चिम बंगाल में भी लागू होने वाला है, जहां टीएमसी की सरकार है।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का कहना था कि वह किसी की धारणाओं का जवाब नहीं दे सकता। वह अपना संवैधानिक दायित्व निभा रहा है। यह आशंका गलत है कि उसका उद्देश्य बड़ी संख्या में मतदाताओं को लिस्ट से बाहर करने का है। आयोग के अनुसार संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट बनाने और उसमें सुधार का ज़िम्मा देता है।

रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट,1950 की धारा 21(3) उसे मतदाता लिस्ट में सुधार के लिए विशेष सघन अभियान चलाने की शक्ति देती है। इस प्रक्रिया से जुड़े नियम बनाने का अधिकार भी कानून आयोग को देता है।

चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि वह मोबाइल फोन के ज़रिए मैसेज भेजने के अलावा घर-घर जाकर मतदाताओं से सम्पर्क कर रहा है। अगर किसी का नाम 1 अगस्त को जारी होने वाली नई ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं आ पाया, तब भी उसे पूरा मौका दिया जाएगा।  साथ ही आयोग ने यह भी कहा कि बिहार के बाद दूसरे राज्यों में भी इस तरह का अभियान चलेगा। आपत्तियों के निराकरण के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 30 सितंबर को होगा।

दरअसल,  चुनाव आयोग हर बड़े चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट करता है ताकि फर्जी वोटरों के नाम हटाए जा सकें और नए, योग्य मतदाताओं को जोड़ा जा सके। बिहार में इस बार विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत  7.89 करोड़ मतदाताओं की सूची की गहन जांच हो रही है।

इसके लिए हर वोटर से पहचान और पते के दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जैसे आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के जन्म से जुड़े कागजात, या 1987 से पहले के राशन कार्ड और जमीन के दस्तावेज।

जबकि विपक्ष का तर्क है कि चूंकि बिहार में  कुछ ही महीनों में चुनाव होने हैं। इतने कम वक्त में 8 करोड़ लोगों के दस्तावेज जमा करवाना और उनकी जांच करना मुश्किल लगता है। ये पूरी प्रक्रिया बीजेपी और एनडीए को फायदा पहुंचाने के लिए है। विरोधी पार्टियों को डर है कि इस प्रक्रिया से राज्य में 2 से 4 करोड़ वोटरों के नाम हट सकते हैं, खासकर दलित, ओबीसी, और अल्पसंख्यक समुदायों के।

एनडीए नेता इस प्रक्रिया को सही ठहरा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि फर्जी वोटरों को हटाने से डर केवल ‘गलत’ लोगों को है। उनका दावा है कि कुछ इलाकों में 25-30 हजार फर्जी वोटर हैं। जबकि बीजेपी  का कहना है कि विपक्ष को साफ-सुथरी मतदाता सूची से परेशानी है, क्योंकि उनके ‘फर्जी वोटर’ हट जाएंगे। बहरहाल, इस घमासान का पार्ट टू तब शुरू होगा, जब पुनरीक्षित मतदाता सूची जारी होगी।

अगर इसमें बड़ी संख्या में किसी खास वर्ग या समुदाय के नाम कटे तो नया राजनीतिक घमासान शुरू होगा। उस स्थिति में राज्य में सत्तारूढ़ एनडीए और खासकर भाजपा को भी परेशानी हो सकती है,  लेकिन बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा तो विपक्षी का एसआईआर वार खाली जाएगा। विपक्ष के इस वार को बेअसर करने के लिए एनडीए और नीतीश सरकार ने रेवड़ी कल्चर का दांव खेलना शुरू  कर दिया है। इसमें सबसे बड़ा दांव तो प्रदेश में अगले पांच वर्षों में 1 करोड़ नौकरियां व रोजगार देने का है।

बिहार में कुल सरकारी कर्मचारियों की संख्या साढ़ चार लाख बताई जाती है। राज्य में 4 लाख 72 हजार 976 पद खाली बताए जाते हैं। नीतीश कुमार का दावा है कि सरकार ने 10 लाख लोगों को नौकरी दे दी है। यानी सभी पद भर चुके हैं। ऐसे में नए लोगों को सरकारी नौकरी कैसे मिलेगी, यह सोचने की बात है। इसके अलावा सरकार ने चुनाव से ठीक पहले राज्य के लोगों को बड़ी सौगात देते हुए सीएम ने 1 अगस्त से 125 यूनिट बिजली मुफ्त देने का ऐलान किया।

इससे राज्य के कुल 1 करोड़ 67 लाख परिवारों को लाभ होगा। साथ ही कुटीर योजना के तहत निर्धन परिवारों के लिए सौर ऊर्जा संयत्र सरकार अपने खर्च पर लगाएगी। सरकार ने वृद्धा, विकलांग, विधवा पेंशन की राशि 400 से बढ़ाकर 1100 रुपये कर दी है। सरकार और सत्तारूढ़ दल का मानना है कि विपक्ष द्वारा राज्य में सुशासन और वोटबंदी के आरोप पर ये रेवडि़यां भारी पड़ेंगी। कितनी पड़ेंगीं, मतदाता किस बात को तवज्जो देगा, यह अभी कहना मुश्किल है।

विपक्ष राज्य में सत्ता  परिवर्तन के अंडरकरंट की बात कर रहा है। लेकिन नीतीश फैक्टर का तोड़ उसके पास भी नहीं है। वैसे भी बिहार की राजनीति में जाति सर्वोपरि है। बाकी सब बाद में है। जाति का गणित में बिहार में इस बार नया जोड़ बाकी होगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। अलबत्ता यह जरूर हुआ है कि राज्य में  विपक्ष बाकी जमीनी मुद्दों को दरकिनार कर एसआईआर पर सत्तापक्ष और नीतीश कुमार को घेरने में जुटा है।

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