बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 21 अगस्त को पटना के बापू सभागार में एक बड़ा संवाद कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. इसका नाम रखा गया है “अल्पसंख्यक संवाद”, जिसमें मदरसा बोर्ड के शताब्दी समारोह के मौके पर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों से बातचीत होगी. मदरसा […]
By UB India News • Patna, Bihar मंगलवार, 12 अगस्त 2025, 07:50 AM • 3 मिनट read
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 21 अगस्त को पटना के बापू सभागार में एक बड़ा संवाद कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. इसका नाम रखा गया है “अल्पसंख्यक संवाद”, जिसमें मदरसा बोर्ड के शताब्दी समारोह के मौके पर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों से बातचीत होगी. मदरसा बोर्ड के 100 साल पूरे होने पर ये कार्यक्रम होने जा रहा है. इसे बिहार की राजनीति में बड़ा कदम माना जा रहा है. चुनावी साल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से सीधा संवाद करना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति मानी जा रही है. खासकर तब, जब मुस्लिम मतदाता राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
बिहार में मुसलमानों की आबादी करीब 17.7% है. 2023 की जाति-जनगणना के मुताबिक, राज्य की कुल आबादी लगभग 13 करोड़ है, जिसमें करीब 2 करोड़ 30 लाख मुसलमान हैं. उनका असर करीब 87 विधानसभा सीटों पर साफ दिखाई देता है. सीमांचल के जिलों में तो उनका दबदबा और भी ज्यादा है. जैसे किशनगंज में 68%, कटिहार में 43%, अररिया में 42% और पूर्णिया में 38% आबादी मुस्लिम है.
किंगमेकर की भूमिका
इतनी बड़ी संख्या होने की वजह से हर चुनाव में मुस्लिम वोटर “किंगमेकर” की भूमिका में होते हैं. हालांकि वे हमेशा एक ही पार्टी को वोट नहीं देते, लेकिन पिछले कई चुनावों में उनका बड़ा हिस्सा महागठबंधन (RJD, कांग्रेस आदि) के साथ गया है.
2015 विधानसभा चुनाव: 84% मुस्लिम वोट महागठबंधन को
2019 लोकसभा चुनाव: 89%
2020 विधानसभा चुनाव: 76%
2024 लोकसभा चुनाव: 87%
AIMIM और NDA ने भी खासकर सीमांचल और पसमांदा मुसलमानों के बीच पकड़ बनाने की कोशिश की, जिसकी वजह से कुछ सीटों पर वोट बंटा और RJD को नुकसान हुआ.
नीतीश कुमार की कोशिश क्यों?
2020 के बाद JDU के मुस्लिम वोटरों में समर्थन घटा है, खासकर वक्फ कानून को लेकर नाराज़गी और पार्टी में हुए बदलाव की वजह से. फिर भी, नीतीश कुमार का रिकॉर्ड मुस्लिम समाज से जुड़े फैसलों—जैसे कब्रिस्तान की घेराबंदी, छात्रवृत्ति, आरक्षण और अल्पसंख्यकों के लिए योजनाओं—में मजबूत रहा है. जब JDU का गठबंधन RJD से रहा, तब मुस्लिम वोटर उनके साथ आए, लेकिन NDA के साथ जाने पर दूरी बढ़ी.
फिर लौटेगा भरोसा?
अब नीतीश कुमार मुस्लिम नेताओं को आगे ला रहे हैं और “अल्पसंख्यक संवाद” जैसे कार्यक्रमों से भरोसा बहाल करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मुस्लिम समाज में फिर से अपनी पकड़ बना सकें. बिहार की मौजूदा राजनीति में मुस्लिम वोटरों का रुख कई बातों पर तय होगा—वोट बंटवारा, नेतृत्व पर भरोसा और महागठबंधन की मजबूती. लेकिन एक बात तय है, बिहार में सत्ता तक पहुंचने के लिए मुस्लिम वोटरों का समर्थन बेहद जरूरी है.