महागठबंधन में फंस रहा पेंच!

बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के मुद्दे अब साफ हो गए हैं. महागठबंधन नीतीश राज में अपराध और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का वादा करेगा. वोटर को आकर्षित करने के लिए महागठबंधन के लोकलुभावन वादे भी होंगे. गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) की गड़बड़ियां गिनाने-बताने के लिए राहुल गांधी 17 अगस्त से पखवाड़े भर बिहार में […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 16 अगस्त 2025, 08:44 AM 8 मिनट read
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महागठबंधन में फंस रहा पेंच!
Photo: UB India News Archive
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के मुद्दे अब साफ हो गए हैं. महागठबंधन नीतीश राज में अपराध और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का वादा करेगा. वोटर को आकर्षित करने के लिए महागठबंधन के लोकलुभावन वादे भी होंगे. गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) की गड़बड़ियां गिनाने-बताने के लिए राहुल गांधी 17 अगस्त से पखवाड़े भर बिहार में ही प्रवास करेंगे. इसके जरिए वे महागठबंधन के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने की कोशिश करेंगे. प्रवास के दौरान वे बिहार के ज्यादातर जिलों में पद यात्रा करेंगे. उनकी पदयात्रा सासाराम से सीमांचल तक के 50 महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों से गुजरेगी. महागठबंधन की एकजुटता दिखाने के लिए आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, सीपीआई (एमएल) नेता दीपांकर भट्टाचार्य समेत महागठबंधन के अन्य नेता भी राहुल गांधी की पदयात्रा में शामिल होंगे. इन सबके बावजूद आरजेडी और महागठबंधन के बीच जो पेंच फंसा है, वह कितना ढीला होता है, यह देखना दिलचस्प होगा.

2 मुद्दों पर कांग्रेस ने फंसाया पेंच

महागठबंधन के नेताओं की लगातार बैठकें पिछले 2-3 महीनों से होती रही हैं. अभी तक इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि महागठबंधन का सीएम फेस कौन होगा. हालांकि लालू यादव लगातार यह बात कहते रहे हैं कि तेजस्वी को किसी भी कीमत पर इस बार सीएम बनाना है. तेजस्वी भी अपने को भावी सीएम घोषित करते रहे हैं. पर, कांग्रेस ने इस बारे में यह कह कर पेंच फंसा दिया है कि सीएम फेस पर चुनाव से पहले घोषणा होगी या चुनाव बाद निर्णय होगा, इस बारे में बैठक कर तय किया जाएगा. पर, किस बैठक में और वह बैठक कब होगी, किसी को पता नहीं. कभी कांग्रेस के प्रदेश स्तर के बड़े नेताओं के साथ तो कभी शीर्ष नेतृत्व के साथ तेजस्वी यादव की मुलाकातें-बैठकें होती रही हैं, लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनी कि तेजस्वी यादव ही 2020 की तरह इस बार भी महागठबंधन के सीएम फेस होंगे. हालांकि महागठबंधन की बैठकों के लिए कांग्रेस ने तेजस्वी यादव को संयोजक की भूमिका सौंप दी है. कांग्रेस ने दूसरा पेंच सीटों को लेकर फंसाया है. कांग्रेस का कहना है कि उसकी तैयारी तो सभी सीटों पर है, लेकिन वह महागठबंधन में कम से कम पिछली बार की तरह 70 सीटें चाहती है. वह भी मन पसंद. यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है कि 2020 में कांग्रेस ने 70 पर लड़ कर सिर्फ 19 सीटें ही जीती थी. उसका आरोप है कि उसे वैसी सीटें दी गई थीं, जहां महागठबंधन का प्रत्याशी कभी नहीं जीता. कांग्रेस का परफार्मेंस खराब रहने के कारण ही तेजस्वी यादव सीएम बनने से चूक गए. दर्जन भर सीटें और महागठबंधन को मिली होतीं तो आज सरकार महागठबंधन की होती और सीएम तेजस्वी रहते.
मुकेश सहनी की डिमांड से महागठबंधन में स्थिति असहज हो गई है.

जल्दी सीट बंटवारा सभी चाहते हैं

कांग्रेस भले हड़बड़ी में नहीं दिखती है, लेकिन सीटों का जल्द से जल्द बंटवारा सभी चाहते हैं. जल्दी बंटवारा होने से कैंडिडेट्स को अपने क्षेत्र में प्रचार का प्रचुर समय मिल जाता. चूंकि इस बार महागठबंधन में 2 नए पार्टनर आ गए हैं, इसलिए उनके लिए सीटों का बंदोबस्त महागठबंधन के लिए मुश्किल हो रहा है. यह तभी संभव है, जब पहले की 5 पार्टियों को पिछली बार मिली सीटों में कटौती की जाए. घटक दलों को संदेह है कि उनकी सीटें कट सकती हैं. इसलिए सभी संख्या का दबाव बनाए हुए हैं. सच यह है कि कोई भी पार्टी अपनी पिछली संख्या घटाने को तैयार नहीं है. सीपीआई (एमएल) को तो इस बार पिछले मुकाबले अधिक सीटें चाहिए. वीआईपी के मुकेश सहनी 60 सीटों के साथ डेप्युटी सीएम पद की रट लगाए हुए हैं. आरएलजेपी के पशुपति कुमार पारस भी इसीलिए महागठबंधन में आए हैं कि उन्हें भी कुछ सीटें जरूर मिलेंगी. सीटों की दावेदारी करीब-करीब सभी दलों ने कर दी है. कांग्रेस ने खुल कर अभी तक कुछ नहीं कहा है, लेकिन उसके नेताओं के जिस तरह के बयान आते रहे है, उससे यही लगता है कि वह पिछली बार की 70 सीटों में 10-15 घटाने को तैयार हो सकती है, लेकिन सीटें उसे मनमाफिक चाहिए. SIR पर कांग्रेस विपक्ष की आवाज को बुलंद कर रही है. राहुल गांधी बिहार में इसी मुद्दे पर पदयात्रा कर रहे हैं. जाहिर है कि तब कांग्रेस की अपेक्षाएं भी बढ़ सकती हैं. यह भी संभव है कि कांग्रेस अपनी सीटें अब कम ही न करे.
महागठबंधन में सीट शेयरिंग सबसे बड़ी चुनौती होगी. इसके 2 कारण हैं. अव्वल यह कि 2 नए पार्टनर- मुकेश की सहनी की वीआईपी और पशुपति कुमार पारस की आरएलजेपी इस बार महागठबंधन के साथ हैं. पहले से ही 5 पार्टियां- आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई (एमएल), सीपीएम और सीपीआई महागठबंधन मे हैं. 2020 के चुनाव में आरजेडी 144 पर लड़ा था. कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी. सीपीआई (एमएल) ने 19 सीटों पर भाग्य आजमाया और सीपीएम-सीपीआई ने 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. इनमें सबसे बढ़िया रिजल्ट सीपीआई (एमएल) का रहा, जिसने 19 में 12 सीटें जीत लीं. सबसे खराब प्रदर्शन कांग्रेस का था, जिसने 70 पर लड़ कर सिर्फ 19 सीटें जीतीं. नए पार्टनर को एडस्ट करने में अब आरजेडी के पसीने छूट रहे हैं. पहले आरजेडी की योजना थी कि कांग्रेस को 20-30 सीटों पर निपटा कर वह नए पार्टनर के लिए सीटों का बंदोबस्त कर लेगा. पर, कांग्रेस के अड़ जाने के कारण अब आरजेडी की हिम्मत नहीं हो रही.

महागठबंधन में मुकेश हैं सिर दर्द

महागठबंधन में कांग्रेस और आरजेडी तो पुराने साथी रहे हैं. नए साथियों में वीआईपी के मुकेश सहनी को समझ पाना लोगों को मुश्किल हो रहा है. वे जिस तरह 60 सीटों और डेप्युटी सीएम पद के लिए अड़ गए हैं और उनकी पार्टी सभी 243 सीटों पर तैयारी की बात करने लगी है, उससे तो यही लगता है कि सहनी के मन में कोई खोट है. उन्हें भी यह पता है कि किसी की सीट काट कर ही उन्हें सीटें मिलनी हैं. ऐसे में जिद पर अड़ जाना उनकी नीयत पर संदेह का कारण बनता है. पिछला चुनाव सहनी ने एनडीए में रह कर लड़ा था. भाजपा ने अपने कोटे से 11 सीटें उन्हें दी थीं. उनके 4 विधायक भी जीते, जो बाद में भाजपा का हिस्सा बन गए थे. एनडीए में रहने के कारण उन्हें एमएलसी और मंत्री बनने का मौका भी मिल गया था. एनडीए में आने से पहले वे तब भी महागठबंधन के ही साथ थे. टिकट बंटवारे से नाखुश होकर वे एनडीए की ओर भागे थे. मुकेश के बारे में चर्चा है कि उन्होंने एनडीए से फिर अपना संपर्क बढ़ा लिया है. उन्हें एनडीए ने आकर्षक आफर भी दिए हैं, जिसमें उन्हें राज्यसभा के रास्ते केंद्र में मंत्री बनाने तक की बात है. उन्हें यह भी मालूम है कि वे कुछ भी कह लें, महागठबंधन में उन्हें 10-15 से अधिक सीटें नहीं मिलेंगी. कांग्रेस ने काफी पहले दलित और अल्पसंख्यक को डेप्युटी सीएम बनाने की घोषणा कर रखी है. ऐसे में सहनी की संभावना ही खत्म हो जाती है. अब तो आरजेडी ने भी कह दिया है कि उन्हें डेप्युटी सीएम बनाने जैसी कोई बात ही नहीं हुई है.

 

कांग्रेस को मनाना भी चैलेंजिंग टास्क
लोकसभा चुनाव के वक्त से ही राहुल गांधी काफी मेहनत कर रहे हैं. अब तो उन्हें SIR का बड़ा मुद्दा भी मिल गया है. इसी मुद्दे पर वे बिहार में पदयात्रा करने वाले हैं. हालांकि उनकी पदयात्रा दूसरों से थोड़ी अलग है. वे कुछ दूर कार से चलेंगे तो ककुछ दूर पैदल. कांग्रेस ने बिहार में अपनी छवि दुरुस्त करने के लिए साल भर में काफी काम किए हैं. पहले प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी बदले. फिर नई कमेटियां बनीं. एनएसयूआई के राष्ट्रीय प्रमुख कन्हैया कुमार ने पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा निकाली. राहुल गांधी खुद बिहार की कई यात्राएं कर चुके हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी बिहार में कुछ महीने पहले सभा की थी. कांग्रेस की इन कोशिशों को देख कर यही लगता है कि उसकी अपेक्षाएं अब बढ़ जाएंगी. ऐसे में कांग्रेस को मनाना तेजस्वी के लिए बड़ी चुनौती होगी.
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