अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती आते ही नीतीश कुमार की स्मृतियों में वह दौर जीवंत हो उठता है जब राजनीति में संवाद, मर्यादा और विश्वास का महत्व हुआ करता था. नीतीश कुमार अक्सर कहते हैं कि अटल जी उन्हें बहुत स्नेह देते थे और बहुत भरोसा करते थे. नीतीश कुमार स्वयं कई बार कहते हैं […]
By UB India News • Patna, Bihar गुरुवार, 25 दिसंबर 2025, 06:34 AM • 7 मिनट read
अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती आते ही नीतीश कुमार की स्मृतियों में वह दौर जीवंत हो उठता है जब राजनीति में संवाद, मर्यादा और विश्वास का महत्व हुआ करता था. नीतीश कुमार अक्सर कहते हैं कि अटल जी उन्हें बहुत स्नेह देते थे और बहुत भरोसा करते थे. नीतीश कुमार स्वयं कई बार कहते हैं कि केंद्र की राजनीति से लेकर बिहार की सत्ता तक, कई मोड़ों पर अटल जी का मार्गदर्शन नीतीश कुमार के साथ रहा. वह कहते हैं कि अटल जी की उदार सोच, समावेशी नेतृत्व और संवेदनशील व्यवहार ने नीतीश जी की राजनीतिक शैली को गहराई से प्रभावित किया. यही कारण है कि अटल जी की जयंती नीतीश के लिए केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर बन जाती है.
इसको आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि अटल जी की पुण्यतिथि या जयंती पर नीतीश कुमार अक्सर चुपके से यानी बिना प्रचार के दिल्ली जाकर ‘सदैव अटल’ (अटल स्मारक) पर फूल चढ़ाते रहे हैं. वर्ष 2023 में भी जब वे महागठबंधन में थे तब भी उन्होंने अकेले जाकर श्रद्धांजलि दी थी. नीतीश कुमार के लिए यह व्यक्तिगत था. नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा में अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि एक ऐसे मार्गदर्शक थे जिनके साथ रिश्ता सत्ता, पद या मजबूरी से नहीं, बल्कि भरोसे और आत्मीय स्नेह से बना था.
राजनीति से पहले बना भरोसे का रिश्ता
दरअसल, अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार का संबंध केवल सत्ता या गठबंधन तक सीमित नहीं रहा. यह रिश्ता भरोसे, आत्मीय स्नेह और सम्मान पर टिका था. नीतीश कुमार कई मौकों पर भावुक होकर कहते रहे हैं कि अटल जी उन्हें बहुत पसंद करते थे. उनका मानना था कि राजनीति में सब कुछ आंकड़ों और रणनीति से नहीं चलता, कुछ रिश्ते विश्वास से बनते हैं. अटल जी के साथ नीतीश का रिश्ता भी ऐसा ही था जो समय के साथ और गहराता चला गया . बिहार के नीतीश कुमार प्राय: दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी के मार्गदर्शन और स्नेह को याद करते रहेहैं, अटल जी ने नीतीश जी की राजनीति को बहुत प्रभावित किया है.
केंद्र की राजनीति में अटल का संरक्षण
जब नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में सक्रिय हुए, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार प्रशासक के रूप में देखा. अटल सरकार में नीतीश को रेलवे, कृषि और सड़क परिवहन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे गए. तीन बड़े विभाग देना अटल जी के भरोसे का स्पष्ट संकेत था. नीतीश के अनुसार, अटल जी के कार्यकाल में मंत्रियों के साथ संवाद और सम्मान का माहौल रहता था. यही वह दौर था जब नीतीश ने गवर्नेंस की बारीकियां सीखी.
गैसल रेल हादसा और नैतिक निर्णय
वर्ष 1999 का पश्चिम बंगाल में गैसल रेल हादसा नीतीश कुमार के जीवन का सबसे कठिन राजनीतिक क्षणों में से एक था. रेल मंत्री होने के नाते उन्होंने इसकी नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया. अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू में यह इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. यह उनके स्नेह और भरोसे को दर्शाता था. लेकिन नीतीश अपने निर्णय पर अडिग रहे. उन्होंने इस्तीफा मंजूर करवाया. यह घटना बताती है कि दोनों के बीच संबंध सत्ता से आगे बढ़कर मूल्यों पर आधारित था.
2000 में मुख्यमंत्री बनने की अधूरी शुरुआत
मार्च 2000 में जब
बिहार विधानसभा चुनावों के बाद कोई स्पष्ट बहुमत नहीं बना, तब एनडीए ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया. यह फैसला अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास का परिणाम था. 3 मार्च 2000 को नीतीश ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. हालांकि, यह सरकार केवल सात दिन चली. बहुमत साबित न कर पाने के कारण 10 मार्च को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. यह उनके जीवन का सबसे निजी और पीड़ादायक राजनीतिक क्षण था.
सात दिन की सत्ता, जीवन भर की सीख
नीतीश कुमार के लिए यह सात दिन सत्ता से ज्यादा आत्ममंथन के दिन थे. वे जानते थे कि यह पराजय स्थायी नहीं है. उन्होंने कई बार कहा कि उस समय अटल जी का भरोसा ही था, जिसने उन्हें टूटने नहीं दिया. भले ही कोई औपचारिक फोन कॉल या सार्वजनिक बयान के तथ्य सामने नहीं हैं, लेकिन नीतीश कुमार के शब्दों में अटल जी का समर्थन साफ झलकता है. यह असफलता उनके लिए सीख बनी, जिसने भविष्य की राजनीति की दिशा तय की.
अटल बिहारी वाजपेयी के कारण ही नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बन पाए थे. यह बात स्वयं कई बार नीतीश कुमार कह चुक हैं.
अटल जी की राजनीति, नीतीश की शैली
अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति में उदारता, समावेश और मर्यादा का विशेष स्थान था. विरोधियों के प्रति भी सम्मान और सहयोगियों के प्रति विश्वास उनकी पहचान थी. नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति में इसी शैली को अपनाने का प्रयास किया. वे अक्सर कहते हैं कि अटल जी के समय में ‘प्यार का माहौल’ था. यही कारण है कि नीतीश आज भी अटल जी को पिता तुल्य मार्गदर्शक मानते हैं.
2005 में भरोसे की पुनःस्थापना
2000 की असफलता के पांच वर्ष बाद 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली. इस बार परिस्थितियां बदली थीं. कानून-व्यवस्था, विकास और प्रशासन पर फोकस के साथ उन्होंने बिहार को नई दिशा दी. नीतीश कुमार कई बार कहते रहे हैं कि 2005 की सफलता 2000 की असफलता की ही देन थी. वे इसे अटल जी के आशीर्वाद और मार्गदर्शन का परिणाम मानते हैं.
अटल जी की स्मृति और कृतज्ञता
आज भी जब नीतीश कुमार अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लेते हैं तो उनके शब्दों में श्रद्धा साफ झलकती है. वे कहते हैं- अटल जी ने मुझे बहुत दिया, मैं उन्हें कैसे भूल सकता हूं”. दरअसल, नीतीश कुमार का यह वाक्य केवल राजनीतिक कृतज्ञता नहीं, बल्कि एक भावनात्मक स्वीकारोक्ति है. अटल जी उनके लिए केवल नेता नहीं, बल्कि जीवन के कठिन क्षणों में सहारा देने वाले मार्गदर्शक थे.
नीतीश कुमार अटल सरकार के मंत्रिमंडल में रेल मंत्री थे. उनको हमेशा से अटल जी का विशेष स्नेह मिलता रहा है. इस बात को खुद नीतीश कुमार स्वीकारते हैं.
सत्ता से ऊपर एक मानवीय रिश्ता
अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार का रिश्ता बताता है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं होती. उसमें मानवीय संवेदनाएं, नैतिक निर्णय और व्यक्तिगत संबंध भी अहम भूमिका निभाते हैं. अटल जी की उदार राजनीति और नीतीश की अनुशासित शैली ने बिहार और देश की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी. यह रिश्ता आज भी स्मृतियों में जीवित है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदाहरण बना हुआ है.
अटल जयंती पर नीतीश का स्मरण
आज, जब अटल बिहारी वाजपेयी इस दुनिया में नहीं हैं, तब भी नीतीश कुमार के भाषणों में उनका नाम आदर के साथ आता है. 25 दिसंबर को अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती केवल एक तिथि नहीं है. यह उस राजनीति को याद करने का अवसर है, जिसमें सत्ता से पहले संस्कार थे. नीतीश कुमार के जीवन में अटल जी का स्थान आज भी उतना ही सम्मानजनक है, जितना उस दौर में था. यही इस रिश्ते की सबसे बड़ी विरासत है.